एकलपीठ द्वारा दिए गए भुगतान स्वीकार करने का आदेश बरकरार, केंद्र सरकार की अपील खारिज
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने सबका विश्वास (Legacy Dispute Resolution) योजना से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में केंद्र सरकार को बड़ा झटका देते हुए विभाग की विशेष अपील खारिज कर दी है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने केन्द्र सरकार की सबका विश्वास योजना के एक्सटेंशन के दौरान किए गए आवेदन को लेकर महत्वपूर्ण फैसला दिया हैं.
अदालत ने स्पष्ट किया कि जब केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचना के माध्यम से योजना की समय सीमा 30 जून 2020 से बढ़ाकर 30 सितंबर 2020 तक कर दी गई थी, तो विभाग को करदाता द्वारा जमा कराए जाने वाले भुगतान को स्वीकार करना ही होगा।
जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चन्द्रशेखर शर्मा की खंडपीठ ने केंद्र सरकार की विशेष अपील को खारिज करते हुए भीलवाड़ा स्थित एग्रोहा इलेक्ट्रॉनिक्स के प्रोप्राइटर प्रवीण गर्ग के पक्ष में एकलपीठ के आदेश को बरकरार रखा है।
इनकार करना उचित नहीं
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार की 29 सितंबर 2020 की अधिसूचना के माध्यम से सबका विश्वास योजना की अंतिम तिथि बढ़ाकर 30 सितंबर 2020 कर दी गई थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि संबंधित करदाता ने इसी बढ़ी हुई अवधि के भीतर विभाग से संपर्क किया था, इसलिए विभाग द्वारा भुगतान स्वीकार करने से इनकार करना उचित नहीं था।
हाईकोर्ट ने कहा कि विभाग द्वारा भुगतान स्वीकार न करना उचित नहीं था और सिंगल बेंच द्वारा दिए गए आदेश में किसी प्रकार का हस्तक्षेप आवश्यक नहीं है।
क्या था पूरा मामला
मामला भीलवाड़ा स्थित एक इलेक्ट्रॉनिक्स कारोबारी से जुड़ा था, जिसने केंद्र सरकार की सबका विश्वास योजना, 2019 के तहत अपने पुराने कर विवादों के निपटारे के लिए तीन स्वैच्छिक घोषणाएं की थीं।
विभाग ने इन घोषणाओं के आधार पर जमा की जाने वाली राशि के संबंध में तीन अलग-अलग फॉर्म जारी किए थे।
करदाता ने दो फॉर्म के अनुसार देय राशि समय पर जमा कर दी, लेकिन तीसरे फॉर्म के तहत राशि पारिवारिक परिस्थितियों और कोविड-19 महामारी के कारण समय पर जमा नहीं कर पाया।
बाद में उसने विभाग से समय सीमा के भीतर राशि स्वीकार करने का अनुरोध किया, लेकिन विभाग ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि योजना की अंतिम तिथि समाप्त हो चुकी है।
विभाग की दलील
केंद्र सरकार की ओर से अदालत में कहा गया कि सबका विश्वास योजना की अंतिम तिथि 30 जून 2020 थी और उसके बाद भुगतान स्वीकार नहीं किया जा सकता।
विभाग का यह भी तर्क था कि करदाता ने निर्धारित समय के भीतर भुगतान नहीं किया, इसलिए उसे योजना का लाभ नहीं दिया जा सकता।
विभाग ने यह भी कहा कि अन्य मामलों में भी अदालतों ने योजना की समाप्ति के बाद भुगतान स्वीकार करने से इनकार किया है, इसलिए सिंगल बेंच द्वारा दिया गया आदेश कानून के अनुरूप नहीं है और इसे रद्द किया जाना चाहिए।
करदाता की दलील
करदाता की ओर से कहा गया कि केंद्र सरकार ने अधिसूचना जारी कर कई अप्रत्यक्ष कर कानूनों से जुड़े मामलों में समय सीमा को बढ़ाकर 30 सितंबर 2020 तक कर दिया था, जिसमें यह योजना भी शामिल थी।
इसलिए विभाग का यह कहना गलत है कि योजना 30 जून 2020 को ही समाप्त हो गई थी।
यह भी तर्क दिया गया कि करदाता ने योजना की विस्तारित अवधि के दौरान ही विभाग से संपर्क किया और भुगतान करने की इच्छा जताई थी, लेकिन विभाग ने तकनीकी आधार पर भुगतान लेने से इनकार कर दिया, जिससे उसे अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
हाईकोर्ट का फैसला
राजस्थान हाईकोर्ट ने दोनो पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपने फैसले में कहा कि योजना की समय सीमा अधिसूचना के माध्यम से 30 सितंबर 2020 तक बढ़ाई गई थी।
इसलिए जब करदाता ने इस अवधि के भीतर भुगतान करने की पेशकश की, तब विभाग को वह राशि स्वीकार करनी चाहिए थी।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन फैसलों का हवाला विभाग ने दिया, वे उन मामलों से संबंधित थे जहां योजना की अवधि समाप्त होने के बाद भुगतान की मांग की गई थी, जबकि वर्तमान मामले में योजना की अवधि पहले ही बढ़ाई जा चुकी थी। इसलिए वे फैसले इस मामले पर लागू नहीं होते।
अपील खारिज, एकलपीठ का आदेश बरकरार
सभी पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद अदालत ने कहा कि विभाग की अपील में कोई दम नहीं है और सिंगल बेंच का आदेश सही है।
इसके साथ ही अदालत ने विभाग की विशेष अपील को खारिज कर दिया तथा लंबित सभी आवेदन भी समाप्त कर दिए।