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रींगस-खाटूश्यामजी रेल प्रोजेक्ट में बड़ा खुलासा: भूमि अधिग्रहण पर हाईकोर्ट की रोक, डीपीआर का रिकॉर्ड तलब

Rajasthan High Court Stays Land Acquisition Award in Ringas–Khatu Shyamji Rail Line Project, Seeks DPR Records

अधिकारियों पर रेलवे का अलाइनमेंट बदलने के आरोप, डीपीआर और अधिसूचना में अलग भूमि का अधिग्रहण

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने रींगस–खाटूश्यामजी नई ब्रॉडगेज रेल लाइन परियोजना से जुड़े भूमि अधिग्रहण विवाद में स्थानीय भूमि मालिकों द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों को चलते हुए भूमि अधिग्रहण का अवार्ड पारित करने पर रोक लगा दी है

इसके साथ ही राजस्थान हाईकोर्ट ने परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) की तकनीकी जानकारी और भूमि अधिग्रहण से जुड़ी आपत्तियों का मूल रिकॉर्ड कोर्ट में पेश करने के आदेश दिए हैं।

जस्टिस अनुरूप सिंघी की एकलपीठ ने यह आदेश गुलाबदान बारेठ व अन्य की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया है

याचिकाओं में प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाया गया कि रेलवे लाइन के लिए मूल डीपीआर में जो भूमि दर्शायी गयी है, अधिसूचनाओं में उस भूमि के खसरा नंबर बदल दिए गए हैं। साथ ही यह भी कहा गया कि इस पूरे खेल को छुपाने के लिए निजी खातेदारों की आपत्तियों का निस्तारण किए बगैर ही उनकी जमीनों का अधिग्रहण किया जा रहा है

याचिका में न केवल भूमि अधिग्रहण के लिए जारी अधिसूचनाओं को रद्द करने की मांग की गयी है बल्कि इस मामले में की गयी अनियमितताओं के लिए अधिकारियों के खिलाफ जांच शुरू करने की मांग भी की गयी है

ये है मामला

राजस्थान में बहुप्रतीक्षित रींगस से खाटूश्यामजी तक प्रस्तावित 17.49 किलोमीटर लंबी नई रेलवे लाइन के लिए रेल मंत्रालय के उत्तर पश्चिम रेलवे निर्माण संगठन ने इस रेल प्रोजेक्ट के लिए भूमि अधिग्रहण की अधिसूचना जारी की

अधिसूचना के अनुसार रींगस, कोटड़ी धायलान, चारणवास, पीरावली, देवीपुरा, लांपुवा, तपीपल्या, आभावास, कैरपुरा और खाटूश्यामजी गांवों में मंत्रालय को 24.2811 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण करना था।

परियोजना के लिए मार्च 2024 में केंद्र सरकार ने इस प्रोजेक्ट के लिए ₹254.06 करोड़ का बजट मंजूर करते हुए रेलवे ने स्टेशन की जगह भी तय कर दी है

इस रेलवे लाइन के भूमि अधिग्रहण को लेकर 8 अगस्त 2024 और 16 जुलाई 2025 की अधिसूचना जारी की गयी।

याचिकाकर्ताओं ने इन्हीं अधिसूचनाओं को चुनौती देते हुए राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर की

याचिकाकर्ताओं की दलील

याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता रमित पारीक ने अदालत को बताया कि रेलवे परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण केवल उसी डीपीआर के अनुसार किया जाना चाहिए था जिसे तकनीकी विशेषज्ञों ने तैयार किया था, लेकिन सरकार ने अधिसूचना जारी करते समय डीपीआर से अलग जमीन का चयन किया, जो कानून के विपरीत है।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उन्होंने रेल अधिनियम 1989 की धारा 20D के तहत अपनी आपत्तियां भी दर्ज कराई थीं, लेकिन आपत्तियों को पूरी तरह से घायब कर दिया गया और कहा गया कि कोई आपत्ति प्राप्त नही होने का आधार बनाया गया.

बाद में जारी अधिसूचना में यह तक दर्ज कर दिया गया कि कोई आपत्ति प्राप्त नहीं हुई, जबकि रिकॉर्ड में उनकी आपत्तियां मौजूद हैं।

अधिवक्ता रमित पारीक ने यह भी तर्क दिया कि विभागीय आंतरिक पत्राचार में स्वयं अधिकारियों ने माना था कि परियोजना का अलाइनमेंट डीपीआर से अलग है और इसके गंभीर प्रभाव हो सकते हैं।

इसके बावजूद बाद में संशोधित अधिसूचना को निरस्त कर पुरानी अधिसूचना को पुनः लागू कर दिया गया।

सरकार का पक्ष

केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि यह परियोजना अत्यंत महत्वपूर्ण है और भूमि अधिग्रहण पूरी तरह डीपीआर के अनुसार ही किया गया है।

केंद्र सरकार के अनुसार याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाई गई आपत्तियां तकनीकी आधार पर निराधार हैं और बड़े सार्वजनिक हित को देखते हुए परियोजना को रोका नहीं जाना चाहिए।

सरकार ने यह भी कहा कि बाद में जारी संशोधित अधिसूचना को नियमों के अनुसार निरस्त किया गया था और वर्तमान अधिसूचना ही वास्तविक डीपीआर के अनुरूप है।

राज्य सरकार का रुख

राज्य सरकार की ओर से पेश किए गए जवाब में कहा गया कि याचिकाकर्ताओं की आपत्तियां वास्तव में प्राप्त हुई थीं और उन्हें संबंधित विभागों को टिप्पणियों के लिए भेजा गया था।

इससे यह स्पष्ट हो गया कि अधिसूचना में “कोई आपत्ति प्राप्त नहीं हुई” दर्ज किया जाना विवाद का विषय है।

हाईकोर्ट का आदेश

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि मामले के सही निस्तारण के लिए डीपीआर की तकनीकी विशिष्टताओं और भूमि अधिग्रहण से संबंधित मूल रिकॉर्ड का परीक्षण आवश्यक है।

हाईकोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को आदेश दिया कि वे डीपीआर की तकनीकी जानकारी और याचिकाकर्ताओं द्वारा दाखिल सभी आपत्तियों का मूल रिकॉर्ड पेश करें।

साथ ही हाईकोर्ट ने अगली सुनवाई तक रेलवे अधिनियम की धारा 20F के तहत अवार्ड पारित करने पर रोक लगा दी है

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