हाईकोर्ट ने कहा-पदोन्नति पाना मौलिक अधिकार नहीं, कर्मचारी को केवल पदोन्नति के लिए “विचार किए जाने” का ही अधिकार,
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने पदोन्नति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि किसी कर्मचारी को केवल पदोन्नति के लिए “विचार किए जाने” का अधिकार होता है, पदोन्नति पाने का स्वतः कोई मौलिक अधिकार नहीं होता।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि उच्च पदों पर रिक्तियां कर्मचारी के सेवानिवृत्त होने के बाद उत्पन्न होती हैं, तो सेवानिवृत्त कर्मचारी उन पदों पर पदोन्नति का दावा नहीं कर सकता।
जस्टिस प्रवीर भटनागर की एकलपीठ ने यह महत्वपूर्ण फैसला जयपुर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (JVVNL) के इंजीनियरिंग कैडर से जुड़े अर्जुन राज मोहनोत की याचिका पर दिया है।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि पदोन्नति के मामलों में “विचार किए जाने का अधिकार” ही मौलिक अधिकार है, पदोन्नति मिलना नहीं। पदोन्नति सामान्यतः उसी दिन से प्रभावी मानी जाती है, जिस दिन वह प्रदान की जाती है, न कि उस दिन से जब पद रिक्त हुआ था।
ये है मामला
यह पूरा मामला जयपुर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (JVVNL) के इंजीनियरिंग कैडर से जुड़े पदोन्नति विवाद से जुड़ा है।
याचिकाकर्ता अर्जुन राज मोहनोत, जो निगम में अधीक्षण अभियंता के पद पर कार्यरत रहे थे और 30 सितंबर 2011 को अपने पद से सेवानिवृत्त हो गए।
मोहनोत ने याचिका में आरोप लगाया कि वर्ष 2011–2012 की रिक्तियों के लिए विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) की प्रक्रिया में उन्हें पदोन्नति का लाभ नहीं दिया गया, जबकि वे पदोन्नति के लिए पात्रता क्षेत्र (Zone of Consideration) में शामिल थे।
याचिकाकर्ता की दलीलें
याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की थी कि प्रतिवादी अधिकारियों द्वारा दो अधिकारियों को पहले उप मुख्य अभियंता (Deputy Chief Engineer) और उसी दिन मुख्य अभियंता (Chief Engineer) पद पर पदोन्नत किए जाने की कार्रवाई को अवैध घोषित किया जाए और पुनः समीक्षा डीपीसी आयोजित कर उन्हें पदोन्नति का लाभ दिया जाए।
याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि जब दो अधिकारियों को एक ही दिन पहले उप मुख्य अभियंता और फिर मुख्य अभियंता पद पर पदोन्नत किया गया, तो स्वाभाविक रूप से उप मुख्य अभियंता के पद रिक्त हो गए थे।
ऐसे में विभाग को उन रिक्त पदों पर अन्य पात्र अधिकारियों, विशेषकर याचिकाकर्ता, पर विचार करना चाहिए था।
याचिकाकर्ता का यह भी कहना था कि वह संबंधित वर्ष की पात्रता सूची में शामिल था, इसलिए उसे पदोन्नति से वंचित करना नियमों के विपरीत है और यह उसके साथ अन्याय है।
विभाग की दलीलें
जयपुर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड की ओर से याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि पदोन्नति की प्रक्रिया नियमों के अनुसार की गई थी और जिन अधिकारियों को पदोन्नत किया गया, वे मेरिट-कम-सीनियरिटी के आधार पर चयनित हुए थे।
विभाग का यह भी कहना था कि मुख्य अभियंता के पदों पर रिक्तियां याचिकाकर्ता की सेवानिवृत्ति (30 सितंबर 2011) के बाद उत्पन्न हुई थीं, इसलिए उन रिक्तियों के आधार पर याचिकाकर्ता को पदोन्नति का दावा करने का अधिकार नहीं है।
विभाग की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता 30 सितंबर 2011 को सेवा से सेवानिवृत्त हो चुका था, जबकि जिन पदोन्नतियों को लेकर विवाद था, वे 18 अक्टूबर 2012 को प्रभावी हुईं। इसलिए, भले ही बाद में रिक्तियां उत्पन्न हुई हों, वे याचिकाकर्ता के लिए पदोन्नति का वैध आधार नहीं बन सकतीं।
हाईकोर्ट का फैसला
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में पदोन्नति संबंधी स्थापित कानूनी सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि—
पदोन्नति का मौलिक अधिकार नहीं होता, बल्कि कर्मचारी को केवल पदोन्नति के लिए विचार किए जाने का अधिकार प्राप्त होता है।
पदोन्नति सामान्यतः उसी दिन से प्रभावी मानी जाती है, जिस दिन वह प्रदान की जाती है, न कि उस दिन से जब पद रिक्त हुआ था।
यदि कोई कर्मचारी सेवानिवृत्ति के बाद उत्पन्न हुई रिक्तियों के आधार पर पदोन्नति की मांग करता है, तो उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि पदोन्नति के मामलों में “विचार किए जाने का अधिकार” ही मौलिक अधिकार है, पदोन्नति मिलना नहीं।
अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता 30 सितंबर 2011 को सेवा से सेवानिवृत्त हो चुका था, जबकि जिन पदोन्नतियों को लेकर विवाद था, वे 18 अक्टूबर 2012 को प्रभावी हुईं। इसलिए, भले ही बाद में रिक्तियां उत्पन्न हुई हों, वे याचिकाकर्ता के लिए पदोन्नति का वैध आधार नहीं बन सकतीं।