हाईकोर्ट ने कहा ठोस कारण और वास्तविक आशंका के बिना लंबे समय तक निलंबन रखना कानून के खिलाफ
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने सरकारी कर्मचारियों के निलंबन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कथित घटना के कई वर्षों बाद और कर्मचारी के ट्रांसफर के बाद निलंबन किया जाता है, तो ऐसे निलंबन का औचित्य साबित करना प्रशासन के लिए आवश्यक है।
हाईकोर्ट ने कहा कि बिना ठोस कारण और बिना किसी वास्तविक आशंका के कर्मचारियों को लंबे समय तक निलंबित रखना कानून की दृष्टि में उचित नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर अदालत ने दोनों याचिकाकर्ताओं के निलंबन आदेश को रद्द करते हुए उन्हें तत्काल प्रभाव से सेवा में बहाल करने के निर्देश दिए।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि
निलंबन का उद्देश्य केवल जांच को प्रभावित होने से बचाना होता है, न कि इसे दंडात्मक कार्रवाई के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने यह आदेश महेंद्र कुमार और रामलाल मीणा की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया है।
हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाकर्ताओं को बड़ी राहत देते हुए उनके निलंबन आदेश को रद्द करते हुए तत्काल प्रभाव से बहाल करने का आदेश दिया है।
लेकिन साथ ही हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को यह स्वतंत्रता भी दी कि वह विभागीय जांच को कानून के अनुसार जारी रख सकती है।
मामला कैसे शुरू हुआ
मामले की शुरुआत उस समय हुई जब राज्य सरकार ने वर्ष 2025 में महेंद्र कुमार और रामलाल मीणा नामक दो सरकारी कर्मचारियों को विभागीय जांच के दौरान निलंबित कर दिया।
आरोप था कि वर्ष 2022 में पाली जिले में एक परियोजना के दौरान कार्यों के निष्पादन में वित्तीय अनियमितताएं हुई थीं।
हालांकि, जब निलंबन आदेश जारी किया गया, उस समय दोनों कर्मचारी पाली जिले में पदस्थापित नहीं थे बल्कि अलग-अलग जिलों—झुंझुनूं और सांचौर—में कार्यरत थे।
ट्रिब्यूनल में चुनौती
निलंबन आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता कर्मचारियों ने पहले राजस्थान सिविल सेवा अपीलीय अधिकरण (ट्रिब्यूनल) का दरवाजा खटखटाया, लेकिन वहां बहुमत से उनकी अपील खारिज कर दी गई।
इसके बाद उन्होंने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर कर निलंबन आदेश और ट्रिब्यूनल के निर्णय दोनों को चुनौती दी।
याचिका में दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उनके खिलाफ जारी निलंबन आदेश पूरी तरह से अवैध, मनमाना और तथ्यों के सही मूल्यांकन के बिना पारित किया गया है।
अधिवक्ता ने कहा कि कथित अनियमितताओं की घटनाएं वर्ष 2022 की हैं, जबकि निलंबन आदेश मार्च 2025 में जारी किया गया। इतने लंबे अंतराल के बाद अचानक निलंबन करना यह दर्शाता है कि प्रशासन ने बिना पर्याप्त कारण के कठोर कदम उठाया।
अधिवक्ता ने कहा कि जब निलंबन आदेश जारी हुआ, उस समय वे पाली जिले में पदस्थापित नहीं थे बल्कि अलग-अलग जिलों में स्थानांतरित होकर कार्यरत थे। इसलिए उनके द्वारा साक्ष्यों से छेड़छाड़ करने या गवाहों को प्रभावित करने की कोई वास्तविक संभावना नहीं थी।
इस परिस्थिति में निलंबन आदेश का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है, क्योंकि निलंबन केवल जांच की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए किया जाता है, न कि कर्मचारी को दंडित करने के लिए।
अधिवक्ता ने दलील दी कि विभाग ने पहले ही आरोपपत्र जारी कर दिया था और उन्होंने उसका विस्तृत जवाब भी प्रस्तुत कर दिया था। इसका अर्थ है कि जांच की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी और सभी आवश्यक दस्तावेज प्रशासन के पास उपलब्ध थे। ऐसे में निलंबन जारी रखने का कोई तर्कसंगत आधार नहीं बचता।
अधिवक्ताओं ने कहा कि
सरकार निलंबन अवधि के दौरान कर्मचारियों को 75 प्रतिशत तक निर्वाह भत्ता दे रही थी, जबकि उनसे कोई कार्य नहीं लिया जा रहा था। इससे न केवल सरकारी धन का अनावश्यक खर्च हो रहा था बल्कि कर्मचारियों को भी मानसिक और आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा था। इसलिए प्रशासन को ऐसे मामलों में संतुलित निर्णय लेना चाहिए।
अधिवक्ता ने हाईकोर्ट के अन्य फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि निलंबन को नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया के रूप में लागू नहीं किया जा सकता और इसे केवल विशेष परिस्थितियों में ही लागू किया जाना चाहिए।
राज्य सरकार का पक्ष
राज्य सरकार की ओर से अदालत में यह कहा गया कि आरोप गंभीर वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े हैं और जांच की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए कर्मचारियों को निलंबित करना आवश्यक था।
सरकार ने यह भी तर्क दिया कि यदि कर्मचारियों को सेवा में बने रहने दिया जाता, तो वे अपने प्रभाव का उपयोग कर साक्ष्यों को प्रभावित कर सकते थे।
हालांकि अदालत ने रिकॉर्ड का अध्ययन करने के बाद पाया कि सरकार द्वारा प्रस्तुत तर्कों को समर्थन देने के लिए कोई ठोस सामग्री उपलब्ध नहीं थी, जिससे यह साबित हो सके कि कर्मचारियों की सेवा में मौजूदगी से जांच प्रभावित हो सकती थी।
हाईकोर्ट का फैसला
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद अपने आदेश में कहा कि किसी कर्मचारी को निलंबित करना एक गंभीर प्रशासनिक निर्णय है और इसे केवल आवश्यक परिस्थितियों में ही लिया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि निलंबन का उद्देश्य दंड देना नहीं बल्कि जांच को प्रभावित होने से बचाना है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि यदि कर्मचारी उस स्थान से स्थानांतरित हो चुका है जहां कथित घटना हुई थी और उसके पास संबंधित रिकॉर्ड या गवाहों तक पहुंच नहीं है, तो निलंबन का औचित्य स्वतः कम हो जाता है। ऐसे मामलों में निलंबन को जारी रखना एक प्रकार से दंडात्मक कार्रवाई जैसा प्रतीत होता है, जो कानून के सिद्धांतों के विपरीत है।
तीन साल की देरी पर सवाल
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में इस बात को भी विशेष रूप से चिन्हित किया कि कथित अनियमितताएं वर्ष 2022 की थीं, जबकि निलंबन आदेश वर्ष 2025 में जारी किया गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि आरोप गंभीर थे तो कार्रवाई समय पर की जानी चाहिए थी।
तीन वर्ष बाद अचानक निलंबन आदेश जारी करना यह दर्शाता है कि प्रशासन ने पर्याप्त विचार-विमर्श किए बिना निर्णय लिया।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि निलंबन आदेश का कोई ठोस आधार नहीं है और इसका उद्देश्य भी स्पष्ट नहीं है।
हाईकोर्ट ने विभाग द्वारा दोनों याचिकाकर्ताओं का निलंबन आदेश और ट्रिब्यूनल द्वारा पारित आदेशों को रद्द करते हुए दोनों कर्मचारियों को तत्काल प्रभाव से बहाल करने का आदेश दिया।
लेकिन जांच रहेगी जारी
साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि विभागीय जांच जारी रहेगी और कर्मचारी जांच में पूरा सहयोग करेंगे।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस आदेश का अर्थ यह नहीं है कि आरोप समाप्त हो गए हैं, बल्कि केवल यह सुनिश्चित किया गया है कि कर्मचारियों को अनावश्यक रूप से निलंबित न रखा जाए।