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जोधपुर में 13 साल पुराने हाई-प्रोफाइल किडनैपिंग केस में तीन दोषियों को सजा, मासूम की सूझबूझ से नाकाम हुआ था अपहरण

Jodhpur Consumer Commission Delivers 18 Key Judgments in a Single Day, Orders Compensation in Insurance, Banking and Finance Cases

जोधपुर। जोधपुर के सरदारपुरा थाना क्षेत्र में वर्ष 2013 में हुई एक सनसनीखेज अपहरण के प्रयास की घटना में अदालत ने 13 वर्ष बाद महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए तीन आरोपियों को दोषी ठहराया है।

अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट संख्या-2 प्रवीण चौधरी की अदालत ने मंगलवार को करण चौधरी, विनोद कुमार और बक्ताराम को अपहरण के प्रयास का दोषी मानते हुए प्रत्येक को तीन-तीन वर्ष के साधारण कारावास और 20-20 हजार रुपए के जुर्माने की सजा सुनाई।

जुर्माना अदा नहीं करने पर एक-एक माह का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा। फैसले के बाद तीनों दोषियों को तुरंत हिरासत में लेकर जेल भेज दिया गया।

2013 में किया था अपहरण का प्रयास

मामला 20 अक्टूबर 2013 का है, जब शास्त्री नगर निवासी एक व्यापारी राहुल सिंघवी के 7 वर्षीय पुत्र का नेहरू पार्क स्थित शतरंत कोच के घर के बाहर से अपहरण की कोशिश कि गयी थी.

7 वर्षिय मासूम अपने कोच मोहम्मद आरिफ से शतरंज की कोचिंग लेने गया था। दोपहर करीब 1:15 बजे एक व्यक्ति कोचिंग सेंटर पहुंचा और कोच से कहा कि बच्चे की मां उसे बाहर बुला रही हैं। कोच ने बच्चे की क्लास पूरी होने तक उसे बाहर इंतजार करने को कहा।

मासूम की सूझ बूझ

क्लास समाप्त होने के बाद जैसे ही बच्चा बाहर निकला, वहां पहले से मौजूद अन्य आरोपियों ने उसे बातचीत में उलझाकर जबरन एक सफेद रंग की बिना नंबर प्लेट की कार में बैठाने का प्रयास किया।

इसी दौरान बच्चे ने सूझबूझ दिखाते हुए जोर-जोर से “भैया-भैया” चिल्लाना शुरू कर दिया। बच्चे की आवाज सुनकर कोच और आसपास मौजूद लोग बाहर दौड़े, जिसे देखकर आरोपी घबरा गए और मौके से फरार हो गए।

घटना के बाद सरदारपुरा पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की और तीनों आरोपियों को गिरफ्तार किया। पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से घटना में उपयोग किए गए मोबाइल फोन और सिम कार्ड बरामद किए, जो बाद में अदालत में महत्वपूर्ण साक्ष्य साबित हुए।

बचाव पक्ष और अभियोजन की दलीलें

मुकदमे की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने दलील दी कि आरोपियों को झूठा फंसाया गया है तथा घटना का कोई स्वतंत्र गवाह नहीं है।

वहीं अभियोजन पक्ष ने बालक और उसके शिक्षक मोहम्मद आरिफ की गवाही पेश की, जिन्होंने घटना का क्रमवार विवरण देते हुए आरोपियों की पहचान की पुष्टि की।

कोर्ट का आदेश

अदालत ने पाया कि दोनों चश्मदीद गवाहों के बयानों में कोई महत्वपूर्ण विरोधाभास नहीं है और उपलब्ध साक्ष्य आरोपियों के अपराध को साबित करते हैं।

सजा सुनाते समय अदालत ने कहा कि यह अपराध पूर्व नियोजित षड्यंत्र के तहत किया गया था और यदि बालक सतर्कता नहीं दिखाता तो परिणाम बेहद गंभीर हो सकते थे।

अदालत ने दोषियों द्वारा कम उम्र और लंबे समय से चल रही न्यायिक प्रक्रिया का हवाला देते हुए परिवीक्षा का लाभ देने की मांग भी खारिज कर दी।

अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में नरमी बरतने से समाज में गलत संदेश जाता है और अपराधों की पुनरावृत्ति की संभावना बढ़ती है।

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