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वरिष्ठता और पदोन्नति कोई अर्जित अधिकार नहीं, नियमों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने के लिए ठोस आधार आवश्यक

Rajasthan High Court: Employees Cannot Accept Benefits of Service Rules and Later Challenge Their Validity

राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: जेल विभाग की पदोन्नति नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाएँ खारिज

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने जेल विभाग के कर्मचारियों की पदोन्नति और वरिष्ठता से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में विस्तृत फैसला सुनाते स्पष्ट किया हैं कि प्रमोशन और वरिष्ठता के संबंध में बनाए गए सेवा नियमों को केवल इस आधार पर असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता कि उनसे कुछ कर्मचारियों को प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

हाईकोर्ट ने कहा कि वरिष्ठता और पदोन्नति कोई अर्जित अधिकार नहीं हैं, और उनके लिए बनाए नियमों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने के लिए ठोस आधार आवश्यक हैं.

हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक नियम संविधान के किसी प्रावधान का स्पष्ट उल्लंघन नहीं करते, तब तक अदालत उनके नीति-निर्माण में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।

जस्टिस इन्द्रजीत सिंह और जस्टिस रवि चिरानिया की खंडपीठ ने मोतीलाल मीणा सहित 40 से अधिक याचिकाओं को खारिज करते हुए रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए यह फैसला दिया हैं.

“‘एप्रोबेट और रिप्रोबेट’ का सिद्धांत

राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में “‘एप्रोबेट और रिप्रोबेट’ का सिद्धांत को लेकर कहा कि इस मामले पर यह सिद्धांत पूर्ण रूप से लागू होता है।

कोर्ट ने कहा कि किसी पक्षकार को यह अनुमति नहीं दी जा सकती कि वह पहले नए नियमों के अंतर्गत मिलने वाले लाभों को स्वीकार करे और बाद में जब वही नियम उसके लिए लाभकारी न रहें, तो उन्हें चुनौती दे।

हाईकोर्ट ने कहा कि किसी पक्षकार को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि वह किसी वैधानिक व्यवस्था से प्राप्त लाभों को स्वीकार करने के बाद केवल इस कारण उसकी वैधता पर प्रश्न उठाए कि बाद के चरण में वह उसके लिए असुविधाजनक हो गई है।”

जेल वार्डरों और हेड वार्डरों का प्रमोशन

यह मामला मुख्य रूप से जेल विभाग में कार्यरत वार्डरों और हेड वार्डरों की पदोन्नति प्रक्रिया से जुड़ा था।

कई कर्मचारियों ने राजस्थान जेल अधीनस्थ सेवा नियम 1998 की कुछ धाराओं को चुनौती देते हुए यह दावा किया था कि नए नियमों के कारण उनकी वरिष्ठता प्रभावित हुई और उनसे कनिष्ठ कर्मचारियों को पदोन्नति का लाभ मिल गया।

मामले की शुरुआत उन कर्मचारियों द्वारा दायर याचिकाओं से हुई, जो पहले राजस्थान जेल अधीनस्थ सेवा नियम 1976 के तहत वार्डर पद पर नियुक्त हुए थे और बाद में हेड वार्डर पद पर पदोन्नत किए गए।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वर्ष 1998 में लागू नए सेवा नियमों के कारण वरिष्ठता निर्धारित करने और पदोन्नति देने की प्रक्रिया बदल गई, जिससे उनकी सेवा अवधि का सही लाभ उन्हें नहीं मिला।

याचिकाकर्ताओं ने नियम 35, 36 और 39 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए कहा कि इन नियमों के कारण पदोन्नति “सर्किल आधारित” प्रणाली से की जा रही है, जबकि पहले राज्य-स्तरीय वरिष्ठता सूची के आधार पर पदोन्नति दी जाती थी।

याचिका में आरोप लगाया गया कि इससे ऐसे कर्मचारी, जो बाद में नियुक्त हुए थे, उनसे पहले पदोन्नत हो गए और यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी बताया कि वर्ष 2011 में जारी एक परिपत्र के तहत कर्मचारियों से सर्किल-वार विकल्प भरवाए गए थे। उस समय उन्हें भविष्य में होने वाले प्रभावों की जानकारी नहीं दी गई, जिसके कारण बाद में वरिष्ठता और पदोन्नति में असंतुलन उत्पन्न हुआ।

याचिकाकर्ता की दलीलें

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ताओं ने दलील दी कि कर्मचारियों की नियुक्ति 1976 नियमों के तहत हुई थी, इसलिए उनकी पदोन्नति और वरिष्ठता का निर्धारण भी उन्हीं नियमों के अनुसार होना चाहिए था।

अधिवक्ता ने कहा कि 1998 के नियम लागू होने के बाद बिना पर्याप्त स्पष्टता के वरिष्ठता निर्धारण की प्रणाली बदल दी गई, जिससे कर्मचारियों के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

अधिवक्ताओं ने यह भी कहा कि वरिष्ठता सूची राज्य स्तर पर तैयार की जानी चाहिए थी, जबकि विभाग ने सर्किल-वार वरिष्ठता सूची तैयार कर दी, जिससे कई कर्मचारियों की स्थिति कमजोर हो गई।

कर्मचारियों की ओर से अनुरोध किया गया कि 1998 के नियमों की संबंधित धाराओं को असंवैधानिक घोषित कर राज्य-स्तरीय वरिष्ठता सूची के आधार पर पदोन्नति का आदेश दिया जाए।

राज्य सरकार का पक्ष

राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता Vigyan Shah ने याचिकाओं का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि सेवा नियम बनाना और उनमें संशोधन करना सरकार का नीति-निर्माण संबंधी अधिकार है।

सरकार ने कहा कि 1998 के नियम विधिसम्मत तरीके से बनाए गए हैं और उनका उद्देश्य प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित बनाना था।

सरकार ने यह भी कहा कि पदोन्नति और वरिष्ठता किसी कर्मचारी का “स्थायी या अर्जित अधिकार” नहीं होते, बल्कि यह प्रशासनिक नीतियों और नियमों के अधीन रहते हैं। यदि किसी नियम के कारण कुछ कर्मचारियों को नुकसान हुआ है, तो मात्र इसी आधार पर नियमों को असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता।

सरकार ने यह भी कहा कि याचिकाएँ वर्ष 2020 में अत्यधिक विलंब से दायर की गईं और यदि राहत दी जाती है तो अन्य कर्मचारियों की स्थापित पदोन्नतियाँ प्रभावित होंगी, जिन्हें पक्षकार भी नहीं बनाया गया है।

हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ

दोनो पक्षों की बहस सुनने बाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि किसी सेवा नियम को असंवैधानिक घोषित करने के लिए यह सिद्ध करना आवश्यक है कि वह संविधान के किसी स्पष्ट प्रावधान का उल्लंघन करता है या समान परिस्थितियों वाले कर्मचारियों के साथ भेदभाव करता है।

हाईकोर्ट ने कहा कि केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि नियम से कुछ कर्मचारियों को नुकसान हुआ।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि वरिष्ठता या पदोन्नति का कोई भी कर्मचारी “अर्जित अधिकार” होने का दावा नहीं कर सकता।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कर्मचारियों को केवल पदोन्नति के लिए “विचार किए जाने का अधिकार” होता है, न कि पदोन्नति प्राप्त करने का स्वतः अधिकार।

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि सरकार को प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुसार सेवा नियमों में बदलाव करने का अधिकार है, बशर्ते वे बदलाव संविधान के अनुरूप हों।

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश

सभी पक्षों की बहस सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में असफल रहे कि 1998 के नियम संविधान के किसी प्रावधान का उल्लंघन करते हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि इसलिए नियम 35, 36 और 39 को अवैध घोषित करने का कोई आधार नहीं है।

अदालत ने याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि वरिष्ठता सूची और पदोन्नति प्रक्रिया नियमों के अनुसार ही तैयार की गई है और उसमें अदालत के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सेवा नियमों में बदलाव से उत्पन्न असंतोष को संवैधानिक चुनौती का आधार नहीं बनाया जा सकता।

खंडपीठ ने सभी याचिकाओं को खारिज करते हुए राजस्थान जेल अधीनस्थ सेवा नियम, 1998 के नियम 35, 36 और 39 की वैधता को बरकरार रखा तथा वर्ष 2011 के परिपत्र और सर्किल-वार वरिष्ठता सूची को भी वैध माना।

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