अदालत सख्त- विभाग अनिश्चितकाल तक कारण बताओ नोटिस लंबित रखकर अचानक कार्रवाई नहीं कर सकता, 81 लाख की सर्विस टैक्स मांग रद्द
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने उदयपुर में सर्विस टैक्स से जुड़े एक बहुचर्चित मामले में बड़ा और सख्त फैसला सुनाते हुए केंद्रीय उत्पाद एवं जीएसटी विभाग द्वारा नौ साल बाद पारित आकलन आदेश को रद्द कर दिया।
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि विभाग अनिश्चितकाल तक कारण बताओ नोटिस लंबित रखकर बाद में अचानक कार्रवाई नहीं कर सकता। ऐसा करना कानून की मंशा, निष्पक्षता और न्यायसंगत प्रशासनिक आचरण के विपरीत है।
जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने उदयपुर की मैसर्स Hazi A.P. Bava and Company की याचिकाओं को स्वीकार करते हुए यह फैसला दिया है।
हाईकोर्ट ने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए स्पष्ट शब्दों में कहा कि CGST विभाग अपनी निष्क्रियता और देरी का लाभ उठाकर करदाता पर भारी टैक्स और पेनल्टी नहीं थोप सकता।
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने 24 अक्टूबर 2019 को पारित उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें 2007-08 से 2010-11 के तीन वित्तीय वर्षों के लिए करोड़ों रुपये की अतिरिक्त सर्विस टैक्स मांग और दंड लगाया गया था।
राजस्थान हाईकोर्ट के इस फैसले से प्रदेशभर के हजारों मामलों को राहत मिलेगी, जहां कारण बताओ नोटिस लंबे समय से लंबित पड़े हैं और विभाग ने समयसीमा का पालन नहीं किया है।
ये है मामला
याचिकाकर्ता एक प्रोप्राइटरशिप फर्म है, जो सीमेंट कंपनियों के साइट पर स्ट्रक्चर की फैब्रिकेशन और एरेक्शन (स्थापना) का कार्य करती थी।
वर्ष 2007-08, 2009-10 और 2010-11 के लिए विभाग ने यह आरोप लगाते हुए कारण बताओ नोटिस जारी किए कि फैब्रिकेशन कार्य “Erection, Commissioning or Installation Service” के अंतर्गत करयोग्य सेवा है।
विभाग ने इन तीन वित्तीय वर्षों के लिए क्रमशः ₹81,46,056, ₹1,04,97,017 और ₹1,03,44,427 की अतिरिक्त टैक्स मांग का नोटिस भेजा।
हालांकि, इसी प्रकार के एक पूर्व मामले में सीईएसटीएटी (CESTAT) ने 27 दिसंबर 2011 को याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला देते हुए स्पष्ट किया था कि मात्र फैब्रिकेशन को “Erection, Commissioning or Installation” सेवा की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
“कॉल बुक” में डालकर ठंडी कर दी फाइल
CESTAT के फैसले के बाद भी विभाग ने अन्य पेंडिंग मामलों का निस्तारण नहीं किया। 7 मार्च 2012 को फाइलों को “कॉल बुक” में डाल दिया गया-यानी मामला अनिश्चितकाल के लिए रोक दिया गया।
बाद में विभाग ने हाईकोर्ट में अपील दायर की, जिसे 6 सितंबर 2018 को मौद्रिक सीमा नीति के तहत वापस ले लिया गया।
इसके बावजूद विभाग ने अचानक 24 अक्टूबर 2019 को नौ साल पुराने नोटिसों पर एक साथ आकलन आदेश पारित कर दिया।
याचिकाकर्ता की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता Lokesh Mathur और Prakash Kumar ने दलीलें दीं कि CESTAT का आदेश अंतिम और बाध्यकारी था, क्योंकि उसे निरस्त नहीं किया गया।
हाईकोर्ट से अपील वापसी के बाद उस निर्णय को अंतिमता प्राप्त हो चुकी थी, लेकिन 9 साल बाद कार्यवाही पुनर्जीवित करना मनमाना और कानून के विपरीत है।
अधिवक्ताओं ने कहा कि ऐसे मामलों में अधिकतम वित्त अधिनियम, 1994 की धारा 73(4B) के तहत 6 माह या 1 वर्ष में फैसला करना जरूरी है।
अधिवक्ताओं ने कहा कि इतनी लंबी देरी न्यायिक अनुशासन और वैध अपेक्षा (Legitimate Expectation) के सिद्धांत के विरुद्ध है।
विभाग का पक्ष
विभाग की ओर से याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि अपील मौद्रिक सीमा के कारण वापस ली गई थी, इसलिए CESTAT का आदेश नजीर (precedent) नहीं माना जा सकता।
अधिवक्ताओं ने कहा कि कॉल बुक में रखने का कारण हाईकोर्ट में लंबित अपील थी।
अधिवक्ताओं ने यह भी कहा कि फैब्रिकेशन और एरेक्शन संयुक्त गतिविधि है, जो करयोग्य सेवा के अंतर्गत आती है।
हाईकोर्ट का सख्त रुख: “9 साल की देरी अस्वीकार्य”
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने धारा 73(4B) का हवाला देते हुए कहा कि कारण बताओ नोटिस जारी होने के बाद छह माह या अधिकतम एक वर्ष के भीतर निर्णय अपेक्षित है।
भले ही यह समयसीमा निर्देशात्मक हो, लेकिन 9 साल की देरी को किसी भी हालत में उचित नहीं ठहराया जा सकता।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि विभाग “कॉल बुक” में फाइल डालकर समयसीमा को अनिश्चितकाल तक नहीं बढ़ा सकता। यदि अपील लंबित थी तो भी विभाग आदेश पारित कर सकता था और आगे अपील कर सकता था।
“विभाग अपनी गलती का फायदा नहीं उठा सकता”
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि
विभाग ने स्वयं फाइल को वर्षों तक लंबित रखा और फिर अचानक कार्यवाही शुरू कर दी। यह न केवल मनमाना है बल्कि करदाता के “वैध अपेक्षा” के सिद्धांत के भी विरुद्ध है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि हर कारण बताओ नोटिस स्वतंत्र कार्यवाही है। लंबित अपील का बहाना बनाकर अन्य मामलों को रोका नहीं जा सकता।
हाईकोर्ट ने बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा कि विभाग की निष्क्रियता का दंड करदाता को नहीं दिया जा सकता।
आदेश रद्द, लेकिन…
राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में याचिकाकर्ता के खिलाफ CGST विभाग, उदयपुर द्वारा जारी किए गए 24 अक्टूबर 2019 के 81 लाख से अधिक के टैक्स के आकलन आदेश को रद्द कर दिया है।
हालांकि अदालत ने यह स्पष्ट किया कि “फैब्रिकेशन” सेवा कर के अंतर्गत आता है या नहीं-यह प्रश्न भविष्य में किसी उपयुक्त मामले में गुण-दोष के आधार पर तय किया जा सकता है।