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हिरासत में ‘दरिंदगी’ – 18 साल के युवक को पेशाब पिलाने तक का आरोप, हाईकोर्ट ने एसपी को जांच सौंपी, मेडिकल बोर्ड गठित

Rajasthan High Court Cracks Down on Alleged Custodial Torture of 18-Year-Old, Orders Independent Probe and Medical Board

उदयपुर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को 12 घण्टे में पीड़ित युवक के बयान दर्ज करने के निर्देश

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने उदयपुर में पुलिस हिरासत में एक युवक के सााि कथित बर्बरता के मामले में बेहद सख्त रुख अपनाया है।

हाईकोर्ट ने 18 वर्षीय युवक के साथ कथित रूप से अमानवीय मारपीट और पेशाब पिलाने जैसे गंभीर आरोपों को प्रथम दृष्टया अत्यंत चिंताजनक बताते हुए निष्पक्ष जांच के लिए सलूंबर पुलिस अधीक्षक को आदेश दिया हैं कि वे स्वयं मामले की निगरानी करें और जांच किसी आरपीएस रैंक से कम अधिकारी को न सौंपी जाए.

हाईकोर्ट ने इसके साथ ही उदयपुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को आदेश दिया है। कि 12 घंटे के भीतर युवक का बयान रिकॉर्ड किया जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि वह किसी दबाव या भय में न हो

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने मामले में आरोपी पुलिस अधिकारी हेमंत चौहान को लेकर को मामले की आगे की कार्यवाही से दूर रखने के आदेश दिए हैं.

मेडिकल बोर्ड का गठन

राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में आर.एन.टी. मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, उदयपुर को तीन वरिष्ठ चिकित्सकों का मेडिकल बोर्ड गठित करने का आदेश दिया हैं.

यह बोड को पीड़ित के चोटों का आकार, प्रकार, दिशा, अवधि और संभावित हथियार का उल्लेख करते हुए विस्तृत रिपोर्ट तीन दिन में अदालत में प्रस्तुत करनी होगी

सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने के निर्देश

हाईकोर्ट ने इस मामले में संबंधित पुलिस थाने और आसपास की सीसीटीवी फुटेज को तत्काल सुरक्षित रखने और जांच हेतु विश्लेषण करने का आदेश दिया हैं.

हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यदि आरोप सत्य पाए जाते हैं तो यह संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों और मानवीय गरिमा पर सीधा प्रहार है।

यह आदेश जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने पीड़ित की बहन नूरीन बानो की ओर से दायर याचिका पर दिया हैं.

पुलिस, डॉक्टर और न्यायिक मजिस्ट्रेट भी…

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता हर्षित यादव और कुशा शर्मा ने पुलिस अधिकारी द्वारा की गयी ज्यादती के बारे में बताते हुए कहा कि याचिकाकर्ता के भाई को पुलिस थाना सलूंबर के निरीक्षक हेमंत चौहान द्वारा “जानवरों जैसी यातना” दी गई और युवक के साथ बेरहमी से मारपीट की गई।

याचिका में निरीक्षक हेमंत चौहान पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं कि उन्होंने युवक को बुरी तरह पीटा और यहां तक कि उसे पेशाब पीने के लिए मजबूर किया

इतना ही नहीं, आरोप यह भी है कि स्थानीय मेडिकल अधिकारी ने पुलिस अधिकारी के प्रभाव में आकर चोटों के बावजूद “Nil Injury” की मेडिकल रिपोर्ट तैयार कर दी, जबकि युवक के शरीर पर स्पष्ट चोटों के निशान मौजूद थे

जब आरोपी को न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया तो उसने अपने शरीर पर ताजा चोटें दिखाईं। इसके बावजूद पुनः उसी मेडिकल अधिकारी से परीक्षण कराने का निर्देश दिए जाने पर अदालत ने चिंता व्यक्त की

याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि युवक को जबरन पेशाब पिलाने जैसी अमानवीय हरकत की गई, जो संविधान प्रदत्त गरिमा और मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन है।

याचिकाकर्ता ने न्यायालय से स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच, मेडिकल बोर्ड द्वारा परीक्षण तथा दोषी अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की।

मिलीभगत के आरोप पर चिंता

दलीलें सुनने के बाद जस्टिस फरंजद अली की एकलपीठ ने कहा कि निरीक्षक हेमंत चौहान के विरुद्ध हिरासत में क्रूर यातना (custodial torture) के गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में याचिकाकर्ता के भाई के साथ बर्बर मारपीट करने से इतर कई आरोप लगाए गए हैं.

एकलपीठ ने यह भी कहा कि स्थानीय मेडिकल अधिकारी पर झूठी रिपोर्ट तैयार करने और न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वार पुन: उसी मेडीकल अधिकारी से मेडीकल जांच कराये जाने के आरोप लगाए गए हैं.

हाईकेार्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि जब जांच अधिकारी और मेडिकल अधिकारी दोनों के विरुद्ध मिलीभगत (collusion and connivance) के आरोप लगाए जाएं, तो न्यायिक शुचिता (judicial propriety) और विवेक की दृष्टि से यह अपेक्षित है कि आगे की जांच और मेडिकल परीक्षण स्वतंत्र प्राधिकारियों को सौंपा जाए, ताकि किसी प्रकार के पक्षपात की आशंका समाप्त हो सके।

न्यायिक आदेश की पवित्रता

हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायिक आदेश की पवित्रता केवल उसके उच्चारण में नहीं निहित है; वह तभी पवित्र मानी जाएगी जब अपनाई गई प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और न्याय प्रशासन में विश्वास उत्पन्न करने वाली हो।

हाईकोर्ट ने आरोपी को जबरन पेशाब पिलाने जैसे अमानवीय कृत्य के आरोप पर चिंता जताते हुए कहा कि यदि ऐसे आरोप सत्य सिद्ध होते हैं, तो वे संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों और हिरासत में व्यक्ति की गरिमा पर सीधा आघात हैं। विशेष रूप से यह भी दर्ज किया गया कि बंदी मात्र 18 वर्ष का युवक है।

आदेश की त्वरित सूचना

राजस्थान हाईकोर्ट ने महाधिवक्ता कार्यालय के माध्यम से एसपी और आईजी, उदयपुर रेंज को आदेश की तत्काल टेलीफोनिक सूचना देने का निर्देश देते हुए संबंधित जेल अधीक्षक/जेलर को भी निर्देश हैं कि मेडिकल परीक्षण और अन्य निर्देशों के पालन में पूर्ण सहयोग करें।

हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 24 फरवरी तय करते हुए अनुपालना रिपोर्ट और प्रगति रिपोर्ट पेश करने को कहा हैं.

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