हाईकोर्ट ने कहा कार्यपालक मजिस्ट्रेट का दायित्व स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्णय देना है। वह पुलिस के निर्देशों पर चलने वाला अधिकारी नहीं, बल्कि एक अर्ध-न्यायिक प्राधिकारी है।
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने जमानत बांड पेश करने के बावजूद दो नागरिकों को 5 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेजने के मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट कहा है कि “व्यक्तिगत स्वतंत्रता कोई कार्यपालिका की कृपा नहीं, बल्कि संवैधानिक गारंटी है।”
राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में दो व्यक्तियों को कथित रूप से अवैध रूप से हिरासत में भेजने वाले बाड़मेर के गुड़ामालानी एसडीएम को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश होने का आदेश दिया है।
हाईकोर्ट ने एसडीएम से यह भी पूछा है कि मामले में अवैध हिरासत में रखने के चलते क्यों न याचिकाकर्ताओं को मुआवजा दिया जाए।
यह आदेश जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने ऊदा राम और मोती राम की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया है।
ये है मामला
याचिकाकर्ता ऊदा राम और मोती राम को 25 नवंबर 2025 को एक कथित झगड़े के बाद पुलिस थाना गुडामालानी द्वारा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धाराओं 126 और 170 के तहत गिरफ्तार किया गया था।
जमानत के बावजूद जेल
26 नवंबर 2025 को पुलिस ने दोनों को एसडीएम गुड़ामालानी के समक्ष पेश किया।
दोनों याचिकाकर्ताओं ने नियमानुसार जमानत बांड पेश किए, लेकिन सत्यापन के नाम पर एसडीएम ने दोनों याचिकाकर्ताओं को न्यायिक हिरासत में भेज दिया।
सत्यापन रिपोर्ट आने के बाद ही 29 नवंबर 2025 को उनकी रिहाई हुई। इस तरह दोनों को 5 दिनों तक हिरासत में रहना पड़ा।
याचिकाकर्ताओं ने इसे मनमाना और अवैध बताते हुए राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ताओं के गंभीर आरोप:
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता संजय बिश्नोई ने हाईकोर्ट में दलील देते हुए एसडीएम पर गंभीर आरोप लगाए।
अधिवक्ता ने कहा कि 26 नवंबर 2025 को अदालत के निर्देशानुसार याचिकाकर्ताओं के जमानत बांड पेश कर दिए गए, लेकिन एसडीएम ने जमानत स्वीकार करने के बजाय सत्यापन के नाम पर बांड रोक लिए और उन्हें न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया।
अधिवक्ता ने कहा कि एसडीएम ने उन्हें आरोप स्वीकार करने के लिए दबाव बनाने की मंशा से हिरासत में रखा। यह निवारक कार्रवाई नहीं, बल्कि दंडात्मक कदम था।
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि उनकी हिरासत संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।
हाईकोर्ट की टिप्पणी
जस्टिस फरजंद अली ने अपने आदेश में साफ कहा कि निवारक धाराओं का उद्देश्य शांति बनाए रखना है, न कि किसी व्यक्ति को दंडित करना या जेल में रखना।
अदालत ने कहा कि यदि पहले से कोई आपराधिक मामला दर्ज है, तो उसी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए। समानांतर रूप से निवारक प्रावधानों का उपयोग कर हिरासत बढ़ाना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।
कोर्ट ने यह भी दोहराया कि गिरफ्तारी कोई औपचारिकता नहीं है। पुलिस और मजिस्ट्रेट को यह सुनिश्चित करना होगा कि हिरासत की वास्तविक और कानूनी आवश्यकता हो। केवल आशंका या औपचारिक रिपोर्ट के आधार पर किसी नागरिक की स्वतंत्रता नहीं छीनी जा सकती।
“कानून का आवरण, अधिकारों का हनन”
हाईकोर्ट ने एसडीएम के आदेश की शैली और तरीके पर भी सवाल उठाए।
कोर्ट ने एसडीएम के आदेश की शैली और तरीके पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह ऐसा प्रतीत होता है जैसे कानून का रूप तो कायम रखा गया, पर उसकी आत्मा का उल्लंघन किया गया।
कोर्ट ने कहा कि कार्यपालक मजिस्ट्रेट का दायित्व स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्णय देना है। वह पुलिस के निर्देशों पर चलने वाला अधिकारी नहीं, बल्कि एक अर्ध-न्यायिक प्राधिकारी है।
हाईकोर्ट ने जोगिंदर कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि गिरफ्तारी शक्ति का प्रयोग यांत्रिक ढंग से नहीं किया जा सकता। गिरफ्तारी तभी हो सकती है जब वास्तविक और तात्कालिक आवश्यकता हो।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने एसडीएम गुड़ामालानी के 26 नवंबर 2025 के आदेश को रद्द करते हुए संबंधित एसडीएम को अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर यह स्पष्ट करने को कहा है कि उन्होंने किस वैधानिक प्रावधान के तहत ऐसा आदेश पारित किया।
साथ ही यह भी पूछा गया है कि अवैध हिरासत के कारण हुए स्वतंत्रता हनन पर मुआवजे का आदेश क्यों न दिया जाए।
हाईकोर्ट ने मामले को 25 फरवरी 2026 को सूचीबद्ध करने का आदेश दिया है।