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पति का आरोप पत्नी ने एडल्टरी में रहते हुए अपनी पहचान छुपाकर दूसरे नाम से बच्चा पैदा किया, हाईकोर्ट ने जैविक पिता नहीं होने के आधार पर ​पति की हैबस कापर्स याचिका को किया खारिज

Rajasthan High Court Dismisses Habeas Corpus Plea Filed by Husband Claiming Wife Gave Birth in Adultery

हाईकोर्ट ने कहा- “जब जैविक पिता नहीं तो अवैध हिरासत कैसी?” याचिका पर लगाई 50 हजार की कोस्ट भी, नवजात को मां और जैविक पिता के साथ होना बताया वैध

जयपुर, 24 फरवरी। राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ में एक बेहद ही चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसमें पति की ओर से दावा किया गया है कि उससे अलग होने के कुछ माह बाद पत्नी ने एक नवजात को जन्म दिया, लेकिन पत्नी ने न केवल अस्पताल में अपना नाम छुपाया बल्कि पैदा होने के बाद नवजात को कहीं छुपा दिया है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने इस चौंकाने वाले मामले में पति की ओर से दायर की गई हैबियस कॉर्पस याचिका को खारिज कर दिया है।

हाईकोर्ट ने पति की याचिका को खारिज करने का आधार वह तर्क दिया है, जो पति की ओर से निचली अदालत में दिया गया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता पति स्वयं मानता है कि उसकी पत्नी एडल्टरी में किसी के साथ है और वह नवजात का जैविक पिता नहीं है, ऐसे में अवैध हिरासत का मामला नहीं बनता।

हाईकोर्ट ने पति की ओर से दायर की गई हैबियस कॉर्पस याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पति पर 50,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया है।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह याचिका अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग (abuse of process of Court) प्रतीत होती है और इसमें अवैध हिरासत (illegal detention) का कोई मामला प्रथम दृष्टया नहीं बनता।

जस्टिस महेंद्र कुमार गोयल और जस्टिस समीर जैन की खंडपीठ ने यह फैसला अलवर निवासी याचिकाकर्ता की याचिका पर दिया है।

क्या है मामला

अलवर निवासी याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता प्रकाश ठाकुरिया ने राजस्थान हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका यानी हैबियस कॉर्पस दायर कर आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी ने एक बच्चे को जन्म दिया है, जिसकी पहचान छिपाई गई है, और बच्चे को दो अन्य लोगों के साथ अवैध रूप से अपने पास रखा है।

याचिकाकर्ता पति ने राज्य सरकार, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट), जयपुर, पुलिस अधीक्षक, अलवर, थाना प्रभारी, अरावली विहार के साथ अपनी पत्नी व दो अन्य को पक्षकार बनाते हुए हाईकोर्ट से गुहार लगाई कि सरकार और पुलिस को आदेश दिया जाए कि वे उसके बच्चे की सुरक्षा सुनिश्चित करें और उसे कोर्ट के समक्ष पेश किया जाए।

बच्चा कहां है ?

अधिवक्ता प्रकाश ठाकुरिया ने दलील दी कि मजिस्ट्रेट कोर्ट में पेश कि गयी पुलिस की जांच रिपोर्ट में पत्नी की ओर से किसी बच्चे को जन्म देने से इनकार किया गया हैं.

वही पुलिस की दूसरी जांच में यह सामने आया कि पत्नी ने किसी ओर महिला की पहचान का प्रयोग करके अलवर के ही एक निजी अस्पताल में बच्चे को जन्म दिया था.

याचिकाकर्ता पति की ओर हैबस कॉपर्स याचिका दायर करने का कारण हैं कि जब पुलिस कह रही है बच्चा पैदा हुआ हैं और पत्नी कह रही हैं बच्चा पैदा नहीं किया.

जबकि अस्पताल के रिकॉर्ड से यह सामने आया कि बच्चा पैदा हुआ है तो आखिर बच्चा कहा हैं.

अधिवक्ता ने कहा कि इसलिए उसकी सुरक्षा के लिए उसे बरामद किया जाये और उसकी सुरक्षा सुनिश्चित कि जाए.

याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस रिपोर्ट में यह आया हैं कि पत्नी ने बच्चा पैदा किया है ऐसे में बच्चे की सुरक्षा बेहद जरूरी हैं.

याचिका की मेंटेबेलिटी पर अधिवक्ता ने कहा कि चुकि रिकॉर्ड में बच्चा पत्नी का नहीं है और किसी अन्य महिला का हैं. और पुलिस का कहना है कि बच्चा पैदा हुआ है ऐसे में बच्चे की वास्तविक स्थिती के लिए याचिका को जारी रखना जरूरी हैं.

मजिस्ट्रेट कोर्ट में पेंडिंग है मामला

हाईकोर्ट में याचिका दायर करने से पूर्व पति ने पहले अलवर स्थित अतिरिक्त वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश एवं अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट संख्या-3 के समक्ष आपराधिक परिवाद दायर किया था।

उस परिवाद में आरोप लगाया गया था कि साजिशपूर्वक उसकी पत्नी ने एक अन्य प्रतिवादी के साथ अवैध शारीरिक संबंध स्थापित किए, जिसके परिणामस्वरूप एक बच्चे का जन्म हुआ।

यह भी आरोप लगाया गया कि उसकी पत्नी ने अलवर के अस्पताल में अपना नाम बदलकर अन्य नाम से बच्चे को जन्म दिया और बाद में उस नवजात को छिपा दिया।

परिवाद पर मजिस्ट्रेट कोर्ट ने पुलिस को सही तथ्यों की जांच के लिए आदेश दिया।

पुलिस रिपोर्ट में भी आया

पहली जांच में पुलिस ने कहा कि याचिकाकर्ता की पत्नी ने किसी भी बच्चे को जन्म देने से इनकार किया, लेकिन पड़ोसियों द्वारा बच्चा पैदा करने की बात कही गई।

मजिस्ट्रेट कोर्ट ने मामले में पुलिस को साक्ष्य पेश करने के आदेश दिए। दूसरी बार अपनी रिपोर्ट में पुलिस ने माना कि याचिकाकर्ता की पत्नी ने नाम बदलकर अलवर के एक अस्पताल में बच्चे को जन्म दिया है।

इस मामले में मजिस्ट्रेट कोर्ट के आदेश से पुलिस द्वारा पेश की गई रिपोर्ट में यह संदेह व्यक्त किया गया कि 13 सितंबर 2024 को याचिकाकर्ता की पत्नी ने अपनी पहचान छिपाकर बच्चे को जन्म दिया।

याचिकाकर्ता ने मजिस्ट्रेट के समक्ष बच्चे की बरामदगी के लिए आवेदन किया था, लेकिन 11 दिसंबर 2025 को कोर्ट ने वह आवेदन खारिज कर दिया, क्योंकि याचिकाकर्ता ने यह भी कहा था कि उसकी पत्नी ने एक अन्य प्रतिवादी से संबंध बनाकर यह बच्चा पैदा किया है।

मजिस्ट्रेट कोर्ट के आदेश को पति याचिकाकर्ता ने राजस्थान हाईकोर्ट में हैबियस कॉर्पस याचिका दायर कर चुनौती दी।

“याचिकाकर्ता स्वयं जैविक पिता नहीं”

राजस्थान हाईकोर्ट ने मामले में सभी पक्षों की बहस सुनने के बाद कहा कि

याचिकाकर्ता स्वयं स्वीकार करता है कि वह बच्चे का जैविक पिता नहीं है; बल्कि प्रतिवादी संख्या 5 जैविक पिता है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि बच्चा अपनी मां और अपने जैविक पिता के साथ है, तो इसे अवैध हिरासत नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई कारण नहीं है, जिससे यह साबित हो कि बच्चे को अवैध रूप से हिरासत में रखा गया है।

याचिकाकर्ता ने यह भी स्पष्ट नहीं किया कि किस आधार पर यह कहा जा रहा है कि बच्चा “illegal detention” में है।

हैबियस कॉर्पस की maintainability पर सवाल

सुनवाई के दौरान जब याचिका की ग्राह्यता (maintainability) पर प्रश्न उठाया गया, तब याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि पत्नी ने पहचान छिपाकर बच्चे को जन्म दिया है, इसलिए हैबियस कॉर्पस याचिका बनाए रखने योग्य है।

हाईकोर्ट ने हैबियस कॉर्पस याचिका को अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग मानते हुए 50 हजार रुपये की कॉस्ट के साथ खारिज कर दिया है।

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