जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा -प्रभावशाली शिकायतकर्ता होने के कारण दर्ज हुई FIR; आरोपों में नहीं थे ठोस तथ्य, न किसी पीड़ित का नाम।
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को राजस्थान पुलिस की कार्यप्रणाली पर तीखी टिप्पणी करते हुए ज़ी राजस्थान के पूर्व चैनल हेड Ashish Dave के खिलाफ दर्ज उगाही (एक्सटॉर्शन) की एफआईआर को रद्दते हुए कई गंभीर टिप्पणियां की हैं.
Supreme Court of India की खंडपीठ, जिसमें जस्टिस Vikram Nath और जस्टिस Sandeep Mehta शामिल थे, ने एफआईआर को “कल्पनात्मक कहानी” बताते हुए इसे कानून की बुनियादी कसौटी पर खरा नहीं माना।
सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि
“सिर्फ इसलिए कि शिकायतकर्ता एक प्रभावशाली मीडिया कंपनी है, पुलिस ने बिना ठोस तथ्यों के एफआईआर दर्ज कर ली। ऐसी एफआईआर को जारी नहीं रखा जा सकता।”
सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान पीठ ने राजस्थान पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए।
जस्टिस संदीप मेहता ने टिप्पणी की:
“हम यह देखकर स्तब्ध हैं कि किस तरह यह एफआईआर दर्ज की गई। जांच अधिकारी को पहले प्राथमिक जांच करनी चाहिए थी। आरोपों की पुष्टि करनी चाहिए थी, उसके बाद एफआईआर दर्ज करनी चाहिए थी।”
अदालत ने कहा कि Lalita Kumari v. Government of Uttar Pradesh के फैसले के अनुसार भी पुलिस को कुछ मामलों में प्राथमिक जांच करनी होती है, विशेषकर जब आरोप अस्पष्ट हों।
पीठ ने कहा:
“एफआईआर में कौन-सा विशिष्ट आरोप है? किस व्यक्ति से उगाही की गई? किस पद का दुरुपयोग हुआ? कुछ भी स्पष्ट नहीं है। यह सब एक कहानी जैसा है — एक काल्पनिक कहानी।”
जस्टिस विक्रम नाथ ने भी टिप्पणी की:
“यह एफआईआर जितनी अस्पष्ट हो सकती है, उतनी है — सिर्फ सामान्य आरोप, बिना किसी ठोस विवरण के।”
उन्होने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि “इंस्टाग्राम स्टोरी इससे बेहतर है”
सुनवाई के दौरान अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा:
“Even Instagram stories are better than this FIR.”
कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि “क्या यह जेम्स बॉन्ड फिल्म है? पहले गोली चलाओ, बाद में सोचो?”
अदालत ने यह भी कहा कि यदि कोई सामान्य नागरिक ऐसी शिकायत लेकर थाने जाता, तो संभवतः उसे बाहर कर दिया जाता।
“सिर्फ इसलिए कि शिकायतकर्ता एक प्रभावशाली एजेंसी है, पुलिस ने रेड कार्पेट बिछा दिया? बिना ठोस आरोप के एफआईआर दर्ज कर ली?”
राज्य सरकार की दलील और कोर्ट की प्रतिक्रिया
राज्य की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.डी. संजय ने दलील दी कि जांच के दौरान सामग्री एकत्र की गई है और कई व्यक्तियों की शिकायतें सामने आई हैं।
जिस पर कोर्ट ने पूछा कि “एक भी नाम बताइए — कौन है वह व्यक्ति जिसे उगाही का शिकार बताया जा रहा है?”
जब एएसजी ने कहा कि केस डायरी सीलबंद लिफाफे में है, तो अदालत ने उसे देखने से इनकार कर दिया और कहा कि एफआईआर स्वयं में ठोस और स्पष्ट होनी चाहिए।
क्या था मामला?
मामला ज़ी मीडिया की ओर से दर्ज कराई गई उस शिकायत से जुड़ा था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि आशीष दवे ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए बिल्डर्स, डॉक्टरों और अन्य कारोबारियों से नकारात्मक खबरें प्रसारित करने की धमकी देकर धन उगाही की।
जी मीडिया का कहना था कि उसे कई शिकायतें प्राप्त हुईं, जिनके आधार पर जयपुर में एफआईआर दर्ज कराई गई।
हालांकि, आशीष दवे की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ अग्रवाल ने अदालत में दलील दी कि न तो एफआईआर में किसी कथित पीड़ित का नाम है, न ही किसी विशेष घटना का स्पष्ट विवरण, न ही यह बताया गया कि किस तारीख को, किससे, कितनी राशि की मांग की गई।
हाईकोर्ट का पूर्व निर्णय
इससे पहले नवंबर 2025 में Rajasthan High Court की जयपुर पीठ ने एफआईआर रद्द करने से इनकार कर दिया था।
हाईकोर्ट ने कहा था कि मीडिया पेशेवरों से अपेक्षा की जाती है कि वे किसी को धमकी देकर या दबाव बनाकर अनुचित लाभ न लें। अदालत ने माना था कि आरोप प्रथमदृष्टया संज्ञेय अपराध का संकेत देते हैं और जांच की आवश्यकता है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अब उस आदेश को पलटते हुए एफआईआर को रद्द कर दिया है।
आपराधिक विश्वासघात का आरोप क्यों नहीं बना?
आशीष दवे की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि आपराधिक विश्वासघात (Criminal Breach of Trust) का अपराध तभी बनता है जब संपत्ति का “सौंपा जाना” (Entrustment) सिद्ध हो।
अदालत ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए माना कि शिकायत में ऐसी कोई विशिष्ट बात नहीं कही गई, जिससे यह स्पष्ट हो कि दवे को कोई संपत्ति सौंपी गई थी और उसका दुरुपयोग किया गया।
पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल
सुनवाई के दौरान जब राज्य ने कहा कि पीड़ित व्यक्ति डर के कारण थाने नहीं आ सके, तो जस्टिस संदीप मेहता ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि
“यह तो आपकी पुलिस पर ही टिप्पणी है कि लोग डर के कारण थाने नहीं आ सकते।”
अदालत ने स्पष्ट कहा कि यदि कोई वास्तविक पीड़ित है, तो वह स्वयं आकर शिकायत दर्ज करा सकता है।
जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा:
“ऐसी एफआईआर को रद्द किया जाना चाहिए था। यदि कोई वास्तविक पीड़ित है, तो वह स्वयं एफआईआर दर्ज करे।”
अंतिम आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में एफआईआर को रद्द किया और हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया.
राज्य को स्वतंत्रता दी कि यदि ठोस तथ्यों के साथ कोई नई शिकायत आती है, तो विधि अनुसार कार्रवाई की जा सकती है
ASHISH DAVE Versus THE STATE OF RAJASTHAN AND ANR., SLP (Crl) No. 19369/2025