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दो नावों पर सवार होकर” न्याय नहीं पाया जा सकता, एक ही आदेश के खिलाफ दो समानांतर कानूनी उपाय अपनाना न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग, रिवीजन याचिका खारिज

Rajasthan High Court: No Parallel Legal Remedies Against Same Decree, Revision Petition Dismissed

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने एक रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी पक्षकार को एक ही आदेश के खिलाफ दो समानांतर कानूनी उपाय अपनाने की इजाजत नहीं दी जा सकती।

राजस्थान हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि “दो नावों पर सवार होकर” न्याय नहीं पाया जा सकता।

जस्टिस अनूप कुमार ढंड की एकलपीठ ने चारण सिंह खंगारोत की ओर से दायर रिवीजन याचिका को खारिज करते हुए यह आदेश दिया है।

मामला क्या था?

विवाद 4 करोड़ 54 लाख 12 हजार रुपये की वसूली से जुड़ा है। प्रतिवादी ने ऑर्डर 37 सीपीसी के तहत समरी सूट दायर किया था, जिसमें 8 जनवरी 2025 को डिक्री पारित हुई।

26 अगस्त 2022 को एक विक्रय विलेख (Sale Deed) निष्पादित हुई, जो एफ.एस. टाउनशिप एलएलपी से संबंधित थी। सेल डीड के आधार पर लगभग ₹4,54,12,000/- की राशि देय बताई गई।

वादी रघुनाथ सिंह ने ऑर्डर 37 सीपीसी के तहत समरी सूट दायर कर उक्त राशि की वसूली की मांग की। इस वाद में एलएलपी फर्म तथा उसके साझेदारों—जिनमें चारण सिंह खंगारोत भी शामिल थे—को प्रतिवादी बनाया गया।

निचली अदालत ने 8 जनवरी 2025 को समरी सूट में डिक्री पारित कर दी। डिक्री के बाद निष्पादन आवेदन (Execution Application) दायर हुआ।

चारण सिंह खंगारोत ने निष्पादन कोर्ट के समक्ष धारा 47 सीपीसी के तहत आपत्तियां दाखिल कीं, जिन्हें 16 दिसंबर 2025 को अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, जयपुर मेट्रोपोलिटन-प्रथम ने खारिज कर दिया।

उक्त आदेश के खिलाफ चारण सिंह ने राजस्थान हाईकोर्ट में रिवीजन पिटीशन दायर की।

रिकॉर्ड के अनुसार, इसी दौरान याचिकाकर्ता पहले ही 8 जनवरी 2025 की डिक्री के खिलाफ वैधानिक अपील हाईकोर्ट में दायर कर चुके थे, जो लंबित है।

याचिकाकर्ता की दलील

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ने दलील दी कि वे 26 अगस्त 2022 की विक्रय विलेख के हस्ताक्षरकर्ता नहीं हैं। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि वे 9 नवंबर 2022 को एलएलपी फर्म से सेवानिवृत्त हो चुके थे।

याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि संबंधित चेक उनकी सेवानिवृत्ति के बाद जारी हुए और धारा 27 के अनुसार, साझेदार की व्यक्तिगत देनदारी सीमित होती है तथा केवल वही साझेदार उत्तरदायी होता है जो प्रत्यक्ष रूप से संबंधित कार्य में संलग्न हो।

अधिवक्ता ने दलील दी कि निष्पादन न्यायालय के समक्ष उनकी आपत्तियां विधिसम्मत थीं और उन्हें बिना उचित सुनवाई के खारिज किया गया।

याचिकाकर्ता ने अपने समर्थन में सुप्रीम कोर्ट और उड़ीसा हाईकोर्ट के कुछ फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि उनकी आपत्तियां सुनवाई योग्य थीं।

प्रतिवादी का पक्ष

प्रतिवादी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलीलें पेश करते हुए कहा कि 26 अगस्त 2022 की विक्रय विलेख पर याचिकाकर्ता के हस्ताक्षर हैं और सेल डीड में जिन चेकों का उल्लेख है, उनमें से एक ₹4,54,12,000/- का चेक अनादृत हुआ।

अधिवक्ता ने यह भी कहा कि उक्त चेक याचिकाकर्ता की पत्नी द्वारा जारी किया गया था। साथ ही यह तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता एलएलपी फर्म के कार्यों के लिए उत्तरदायी हैं और धारा 27 का लाभ नहीं ले सकते।

अधिवक्ता ने सबसे महत्वपूर्ण तर्क यह दिया कि याचिकाकर्ता पहले ही डिक्री के खिलाफ अपील दायर कर चुके हैं। ऐसे में धारा 47 सीपीसी के तहत आपत्ति दाखिल करना दो समानांतर उपाय अपनाना है, जो कानूनन स्वीकार्य नहीं है।

अधिवक्ता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार भी निष्पादन न्यायालय डिक्री से आगे नहीं जा सकता था, इसलिए उसके आदेश में कोई गलती नहीं है।

हाईकोर्ट का फैसला

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता ने स्वयं स्वीकार किया है कि उन्होंने डिक्री के खिलाफ अपील दायर कर रखी है।

कोर्ट ने कहा कि एक ही आदेश के खिलाफ दो समानांतर उपाय अपनाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

इस मामले में “Nemo debet bis vexari pro una et eadem causa” सिद्धांत लागू होता है—अर्थात, एक ही कारण से दो बार कार्यवाही नहीं हो सकती।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट करते हुए कहा कि

“यदि कोई पक्षकार अपील का मार्ग चुन चुका है, तो वह निष्पादन में धारा 47 के तहत समानांतर आपत्तियां नहीं उठा सकता।”

अंतिम आदेश

हाईकोर्ट ने इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से दायर रिवीजन पिटीशन को खारिज करने का आदेश देते हुए कहा कि निष्पादन न्यायालय द्वारा आपत्तियां खारिज करना सही था।

साथ ही याचिकाकर्ता को यह छूट दी कि लंबित अपील में सभी दलीलें उठाने की स्वतंत्रता है।

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