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आदेश उल्लंघन पर सीधे मुकदमा खारिज नहीं किया जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Rajasthan High Court Sets Aside Dismissal of Suit Under Order 11 Rule 21 CPC, Clarifies Scope of Discovery and Production of Documents

जोधपुर। Rajasthan High Court जोधपुर मुख्यपीठ ने एक महत्वपूर्ण और रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए यह स्पष्ट किया है कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 11 नियम 21(1) के तहत किसी वाद को खारिज करना या प्रतिरक्षा को समाप्त करना अत्यंत कठोर कदम है, जिसे केवल असाधारण परिस्थितियों में ही अपनाया जा सकता है।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि आदेश दस्तावेजों के ‘प्रोडक्शन’ (Rule 14) से संबंधित हो, तो उसके कथित उल्लंघन पर सीधे नियम 21 के तहत कार्यवाही नहीं की जा सकती।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया हैं कि CPC के प्रावधानों की व्याख्या तकनीकी आधार पर नहीं, बल्कि वास्तविक आशय के आधार पर होगी.

कोर्ट ने कहा कि कठोर दंडात्मक शक्तियों का प्रयोग अंतिम उपाय (Last Resort) के रूप में ही किया जाएगा और न्यायालयों को अधिकार-क्षेत्र (Jurisdiction) की सीमाओं का विशेष ध्यान रखना होगा. केवल प्रक्रिया संबंधी विवाद के आधार पर वाद को समाप्त नहीं किया जा सकता।

जस्टिस संदीप शाह की एकलपीठ ने दिवंगत याचिकाकर्ता ओमप्रकाश के Legal Representatives की ओर से दायर अपील पर यह फैसला ​सुनाया हैं.

यह अपील एडीजे कोर्ट, भादरा द्वारा 3 सितंबर 2008 को पारित उस आदेश के विरुद्ध दायर की गई थी, जिसमें वादियों का मुकदमा आदेश 11 नियम 21(1) CPC के तहत कथित अवमानना के आधार पर खारिज कर दिया गया था।

क्या था पूरा विवाद?

मामला एक भूमि के बेचान एग्रीमेंट से जुड़ा है। वादियों का दावा था कि प्रतिवादी संख्या 1 और 2 ने 9 अप्रैल 2001 को 6,30,000 रुपये में भूमि बेचने का लिखित अनुबंध किया। कुल 5,57,000 रुपये चेक द्वारा दिए गए और शेष राशि रजिस्ट्री के समय देनी थी। वादियों के अनुसार, प्रतिवादी रजिस्ट्री के लिए उपस्थित नहीं हुए।

बाद में वादियों को पता चला कि संबंधित भूमि प्रतिवादियों ने अपने परिजनों के नाम हस्तांतरित कर दी। इसके बाद 3 जुलाई 2003 को वादियों ने विशिष्ट प्रतिपादन (Specific Performance) का वाद दायर किया।

प्रतिवादियों ने लिखित बयान में दावा किया कि उन्होंने केवल 1,10,000 रुपये उधार लिए थे और आयकर दस्तावेज़ के बहाने उनके हस्ताक्षर लेकर अनुबंध तैयार कर लिया गया। उन्होंने संपूर्ण राशि चुकाने का दावा भी किया।

दस्तावेज़ प्रस्तुत करने को लेकर विवाद

24 अगस्त 2005 को प्रतिवादियों ने आवेदन दायर कर वादी ओमप्रकाश की लेखा-बही (23.05.1999 से 05.05.2001) की मूल प्रतियां प्रस्तुत करने की मांग की। 23 मार्च 2006 को ट्रायल कोर्ट ने आदेश पारित कर दस्तावेज़ प्रस्तुत करने को कहा।

वादियों का कहना था कि संबंधित लेखा-बही उनके पिता रंगलाल की थी और उनके कब्जे में नहीं थी। उन्होंने यह भी कहा कि उपलब्ध दस्तावेज़ पहले ही प्रस्तुत किए जा चुके हैं।

इसके बावजूद प्रतिवादियों ने आदेश 11 नियम 21(1) CPC के तहत आवेदन देकर कहा कि आदेश का पालन नहीं हुआ, इसलिए वाद खारिज किया जाए। ट्रायल कोर्ट ने इसे स्वीकार करते हुए 3 सितंबर 2008 को मुकदमा खारिज कर दिया।

हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने सबसे पहले यह स्पष्ट किया कि आदेश 11 CPC के विभिन्न प्रावधान अलग-अलग परिस्थितियों में लागू होते हैं.

हाईकोर्ट ने कहा कि नियम 11 – पूछताछ (Interrogatories) का उत्तर, नियम 12 – दस्तावेजों की खोज (Discovery), नियम 14 – दस्तावेजों का उत्पादन (Production) और नियम 15 – निरीक्षण (Inspection) में लागू होते है.

कोर्ट ने कहा कि नियम 21(1) केवल नियम 11, 12 और 15 के उल्लंघन की स्थिति में लागू होता है। नियम 14 (दस्तावेज़ उत्पादन) के उल्लंघन पर नियम 21 के तहत वाद खारिज नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने पाया कि 23 मार्च 2006 का आदेश वस्तुतः नियम 14 के अंतर्गत था, भले ही उसमें नियम 12 का उल्लेख किया गया हो।

कोर्ट ने कहा कि कानून में यह स्थापित सिद्धांत है कि किसी आदेश में गलत प्रावधान का उल्लेख होने से उसकी प्रकृति नहीं बदल जाती; आदेश की वास्तविक भाषा और आशय देखा जाता है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला

हाईकोर्ट ने Babbar Sewing Machine Co. v. Trilok Nath Mahajan के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि आदेश 11 नियम 21 एक कठोर दंडात्मक प्रावधान है। इसे तभी लागू किया जा सकता है जब आदेश का जानबूझकर उल्लंघन (Wilful Default) हो, या पक्षकार की हठधर्मिता (Contumacy) सिद्ध हो या फिर कोर्ट के आदेश की अवमानना स्पष्ट हो।

कोर्ट ने कहा कि सिर्फ दस्तावेज़ प्रस्तुत न कर पाने को ‘जानबूझकर अवमानना’ नहीं माना जा सकता, विशेषकर तब जब पक्षकार यह कह रहा हो कि दस्तावेज़ उसके कब्जे में ही नहीं हैं।

हाईकोर्ट का फैसला

दलीले सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि मूल आदेश नियम 14 के अंतर्गत था और नियम 21(1) का प्रयोग उस स्थिति में नहीं हो सकता.

हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर आदेश पारित किया हैं क्योकि इस मामले में जानबूझकर अवमानना सिद्ध नहीं हुई।

अतः हाईकोर्ट ने 3 सितंबर 2008 का आदेश निरस्त कर दिया और ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वाद की सुनवाई विधि अनुसार जारी रखी जाए।

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