जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने एनडीपीएस (NDPS) मामलों में जब्ती और सैंपलिंग की प्रक्रिया को लेकर रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए एक महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि यदि 2022 के नए नियमों के तहत निर्धारित अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया जाता है, विशेषकर मजिस्ट्रेट की उपस्थिति में सैंपलिंग और प्रमाणन नहीं होता है, तो ऐसे मामलों में आरोपी की निरंतर हिरासत संविधान के अनुच्छेद 21 के विरुद्ध मानी जा सकती है।
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने यह फैसला पप्पूलाल उर्फ बर्दू गुर्जर की दूसरी जमानत याचिका स्वीकार करते हुए दिया है।
ये है मामला
17 जनवरी 2023 को चित्तौड़गढ़ के पुलिस थाना राशमी की नियमित गश्त के दौरान एक स्कॉर्पियो और एक पिकअप वाहन को रोका गया।
पुलिस को देखकर दोनों वाहनों में सवार व्यक्ति मौके से फरार हो गए। पुलिस के अनुसार पिकअप वाहन से 248 किलोग्राम डोडा पोस्त बरामद हुआ।
पुलिस ने 248 किलोग्राम डोडा पोस्त (पॉपी हस्क) बरामद करने का आरोप लगाते हुए याचिकाकर्ता आरोपी के विरुद्ध एनडीपीएस एक्ट की धारा 8/15 व 8/29 के तहत मामला दर्ज किया था।
बाद में आरोपी पप्पूलाल को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
विशेष न्यायाधीश, एनडीपीएस मामलों ने 20 अगस्त 2024 को उसकी नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी।
जिसके खिलाफ याचिकाकर्ता आरोपी ने हाईकोर्ट में पहली जमानत याचिका दायर की।
लेकिन हाईकोर्ट ने गवाहों के बयान बाकी होने के चलते जमानत देने से इनकार किया, लेकिन गवाही के बाद पुनः याचिका दाखिल करने की छूट दी।
मामले के प्रमुख गवाहों के बयान दर्ज हो जाने के बाद आरोपी याचिकाकर्ता ने दूसरी जमानत याचिका दायर की।
याचिका में दलीलें
याचिकाकर्ता पप्पूलाल उर्फ बर्दू गुर्जर की ओर से अधिवक्ता ने दलील पेश की कि उसे केवल अनुमान और संदेह के आधार पर आरोपी बनाया गया है। बरामदगी की घटना के समय वह मौके पर नहीं पकड़ा गया और न ही कोई स्वतंत्र साक्ष्य उसे सीधे तौर पर जब्ती से जोड़ता है।
आरोपी पक्ष का सबसे महत्वपूर्ण तर्क यह था कि Narcotic Drugs and Psychotropic Substances (Seizure, Storage, Sampling and Disposal) Rules, 2022 का गंभीर उल्लंघन हुआ है।
जिसमें जब्त सामग्री को समरूप (homogeneous) नहीं किया गया और न ही प्रत्येक बैग को अलग-अलग खोलकर मिलाया गया।
अधिवक्ता ने कहा कि इस मामले में मजिस्ट्रेट की उपस्थिति में सैंपल नहीं लिए गए और न ही मजिस्ट्रेट द्वारा प्रमाणित सैंपल फॉरेंसिक लैब को भेजे गए।
अधिवक्ता ने कहा कि जब्ती प्रक्रिया का विधिवत दस्तावेजीकरण नहीं किया गया।
आरोपी पक्ष ने कहा कि यदि सैंपल मजिस्ट्रेट की उपस्थिति में नहीं लिया गया और प्रमाणित नहीं हुआ, तो फॉरेंसिक रिपोर्ट की साक्ष्यात्मक वैधता संदिग्ध हो जाती है।
याचिकाकर्ता ने यह भी दलील दी कि पुलिस अधिकारी द्वारा प्राप्त सूचना को लिखित रूप में दर्ज नहीं किया गया, जो धारा 42 के तहत अनिवार्य है। यह चूक अभियोजन की वैधता पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
यह भी कहा गया कि मामले में जब्ती गवाह जगदीश और पुलिस अधिकारी मनोज के बयानों से स्पष्ट हुआ कि मौके पर वीडियोग्राफी/फोटोग्राफी नहीं की गई और बैगों पर पहचान चिह्न नहीं थे।
यह भी कहा गया कि सैंपलिंग मजिस्ट्रेट की उपस्थिति में नहीं हुई। इन बयानों से अभियोजन की प्रक्रिया संदिग्ध प्रतीत होती है।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि लंबे समय से न्यायिक हिरासत में रहना और ट्रायल में देरी, व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Article 21) का हनन है। “कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया” का अर्थ केवल कानून होना नहीं, बल्कि उसका सख्त पालन भी है।
यह भी दलील दी गई कि ट्रायल अभी प्रारंभिक अवस्था में है। अभियोजन गवाहों के बयान दर्ज होने के बाद भी सुनवाई में समय लगेगा। ऐसे में अनिश्चितकालीन हिरासत उचित नहीं है।
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के Mohd. Muslim @ Hussain बनाम State (NCT of Delhi) फैसले का हवाला देते हुए कहा कि धारा 37 की शर्तों की ऐसी व्याख्या नहीं की जानी चाहिए, जिससे जमानत असंभव हो जाए। प्रथम दृष्टया मूल्यांकन पर्याप्त है, अंतिम निष्कर्ष आवश्यक नहीं।
राज्य सरकार का विरोध
जमानत याचिका का विरोध करते हुए राज्य सरकार ने जोर देकर कहा कि 248 किलोग्राम डोडा पोस्त की बरामदगी हुई है, जो वाणिज्यिक मात्रा (commercial quantity) है। ऐसे मामलों में एनडीपीएस एक्ट के तहत न्यूनतम 10 वर्ष की सजा का प्रावधान है।
सरकार ने तर्क दिया कि धारा 37 NDPS Act के तहत जमानत देना अत्यंत कठिन है। जब तक अदालत प्रथम दृष्टया यह संतुष्ट न हो जाए कि आरोपी दोषी नहीं है और जमानत पर रहते हुए अपराध नहीं करेगा, तब तक जमानत नहीं दी जानी चाहिए।
सरकार ने आशंका जताते हुए दलील दी कि आरोपी पहले भी मौके से फरार हुआ था। यदि उसे जमानत दी जाती है तो वह गवाहों को प्रभावित कर सकता है या साक्ष्य से छेड़छाड़ कर सकता है।
राज्य सरकार ने कहा कि बरामदगी विधिसम्मत तरीके से की गई। मौके पर सैंपल लिया गया और फॉरेंसिक जांच से प्रतिबंधित पदार्थ की पुष्टि हुई।
राज्य ने यह भी कहा कि एनडीपीएस अपराध समाज के लिए अत्यंत हानिकारक हैं। ड्रग तस्करी संगठित अपराध से जुड़ी होती है, इसलिए ऐसे मामलों में कठोर दृष्टिकोण आवश्यक है।
राज्य सरकार ने दलील दी कि एनडीपीएस मामलों में सामान्य आपराधिक मामलों की तरह “जमानत नियम है” का सिद्धांत लागू नहीं होता। यहां विधायिका ने विशेष रूप से कठोर प्रतिबंध लगाए हैं।
हाईकोर्ट का फैसला
दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंसेज (Seizure, Storage, Sampling and Disposal) Rules, 2022 का विस्तार से वर्णन करते हुए कहा कि ये नियम 23 दिसंबर 2022 से प्रभावी हो चुके थे, इसलिए 17 जनवरी 2023 की कथित बरामदगी के समय इनका पालन अनिवार्य था।
हाईकोर्ट ने कहा कि इन नियमों के अनुसार जब्त सामग्री का वर्गीकरण, अलग-अलग वजन और पैकेजिंग अनिवार्य है और सैंपलिंग मजिस्ट्रेट की उपस्थिति में की जानी चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि यह भी तय है कि मजिस्ट्रेट द्वारा प्रमाणित सैंपल ही फॉरेंसिक जांच के लिए भेजे जाने चाहिए और 48 घंटे के भीतर जब्त सामग्री को नामित गोदाम में जमा करना आवश्यक है।
हाईकोर्ट ने कहा कि नियमों के ये प्रावधान केवल औपचारिकता नहीं हैं, बल्कि इनका उद्देश्य साक्ष्य की शुद्धता और पारदर्शिता सुनिश्चित करना है।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब्ती गवाह जगदीश और पुलिस अधिकारी मनोज के बयानों में कई महत्वपूर्ण त्रुटियां सामने आईं, जिनमें जब्त सामग्री को तिरपाल पर खाली कर समरूप (homogeneous) नहीं बनाया गया।
खासतौर से मजिस्ट्रेट की उपस्थिति में सैंपल नहीं लिए गए, मजिस्ट्रेट प्रमाणित सैंपल फॉरेंसिक लैब को नहीं भेजे गए, मौके पर फोटोग्राफी या वीडियोग्राफी नहीं की गई, बैगों पर कोई पहचान चिह्न नहीं थे और धारा 42 एनडीपीएस एक्ट के तहत सूचना को लिखित रूप में दर्ज नहीं किया गया।
अदालत ने कहा कि यदि फॉरेंसिक जांच ऐसे सैंपल पर आधारित है जो मजिस्ट्रेट द्वारा प्रमाणित नहीं है, तो उसकी साक्ष्यात्मक पवित्रता संदिग्ध हो जाती है।
अनुच्छेद 21 और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर जोर
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि “कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया” का अर्थ केवल वैधानिक प्रावधानों का अस्तित्व नहीं, बल्कि उनका सख्त और निष्पक्ष पालन भी है। यदि अनिवार्य प्रक्रिया का उल्लंघन होता है, तो आरोपी की निरंतर हिरासत संवैधानिक दृष्टि से उचित नहीं ठहराई जा सकती।
हाईकोर्ट ने कहा कि एनडीपीएस एक्ट में कठोर दंड का प्रावधान है — वाणिज्यिक मात्रा के मामलों में न्यूनतम 10 वर्ष की सजा — इसलिए साक्ष्य का स्तर भी उतना ही उच्च और निष्कलंक होना चाहिए।
धारा 37 की बाध्यता
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि धारा 37 की शर्तों की ऐसी व्याख्या नहीं की जा सकती, जिससे जमानत असंभव हो जाए। अदालत को प्रथम दृष्टया यह संतुष्ट होना होता है कि आरोपी दोषी नहीं हो सकता और वह जमानत पर रहते हुए अपराध नहीं करेगा।
हाईकोर्ट ने कहा कि जमानत के चरण पर अंतिम निष्कर्ष निकालना आवश्यक नहीं है, बल्कि प्रथम दृष्टया मूल्यांकन पर्याप्त है।
कोर्ट ने यह भी माना कि मुकदमे की सुनवाई प्रारंभिक चरण में है और निकट भविष्य में उसके पूर्ण होने की संभावना नहीं है। आरोपी लंबे समय से न्यायिक हिरासत में है। ऐसे में अनिश्चितकालीन कारावास का कोई औचित्य नहीं है।
जमानत की शर्तें
अदालत ने आरोपी को 50,000 रुपये के निजी मुचलके और 25,000 रुपये के दो जमानती प्रस्तुत करने की शर्त पर रिहा करने का आदेश दिया।