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दहेज हत्या केस में सामान्य आरोपों के आधार पर रिश्तेदारों को आरोपी नहीं बनाया जा सकता, जेठानी-जेठ और सास को कार्यवाही से राहत-राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Rajasthan High Court: Husband’s Relatives Cannot Be Made Accused on General Allegations in Dowry Harassment Case

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने दहेज प्रताड़ना (धारा 498A IPC) से जुड़े एक मामले में रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा है कि केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर पति के सभी रिश्तेदारों को आपराधिक मुकदमे में आरोपी नहीं बनाया जा सकता।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को मुकदमे में अतिरिक्त आरोपी के रूप में शामिल करने के लिए उसके खिलाफ मजबूत और ठोस साक्ष्य होना जरूरी है।

हाईकोर्ट ने इसी आधार पर दहेज हत्या के मामले में आरोपी बनाए गए जेठ, जेठानी और सास को बड़ी राहत देते हुए 498A के मामले में चल रही कार्यवाही से राहत दी है।

जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने बीकानेर निवासी रजनी सोनी, राजेश सोनी और मोहिनी देवी की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया है।

हाईकोर्ट ने कहा कि उनके खिलाफ केवल सामान्य आरोप लगाए गए हैं, जिनमें कोई ठोस और विशिष्ट भूमिका सामने नहीं आती।

क्या है पूरा मामला

यह मामला बीकानेर जिले के नोखा थाना क्षेत्र के हिम्मतसर गांव से जुड़ा है।

शिकायतकर्ता भगवान राम ने 2 जुलाई 2014 को पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि उनकी बेटी संतोष की शादी लगभग दस वर्ष पहले दीपक नामक युवक से हुई थी।

शिकायत के अनुसार संतोष अपने ससुराल में संयुक्त परिवार में रहती थी, जिसमें उसका पति दीपक, ससुर भगीरथ, सास मोहिनी, जेठ राजेश और जेठानी रजनी शामिल थे।

शिकायतकर्ता का आरोप था कि संतोष के पति और ससुर जुए की आदत के कारण आर्थिक नुकसान झेल रहे थे और इसी वजह से वे संतोष पर मायके से 5 लाख रुपये लाने का दबाव बना रहे थे।

रिपोर्ट में कहा गया कि पिछले दो-तीन महीनों से संतोष को लगातार मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा था।

2 जुलाई 2014 को शिकायतकर्ता को सूचना मिली कि संतोष ने फांसी लगा ली है। जब वह अस्पताल पहुंचे तो उन्हें मृतका का शव मोर्चरी में मिला।

शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि पहले संतोष के साथ मारपीट की गई और फिर हत्या को आत्महत्या का रूप देने के लिए उसे फांसी पर लटका दिया गया।

पुलिस जांच और चार्जशीट

इस रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने धारा 302, 498A और 143 IPC के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की।

जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने पाया कि मामले में मुख्य आरोप पति दीपक के खिलाफ बनते हैं।

इसलिए पुलिस ने केवल दीपक के खिलाफ चार्जशीट पेश की और परिवार के अन्य सदस्यों के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य नहीं पाए।

मामला बाद में बीकानेर की महिला अत्याचार मामलों की अदालत में चला गया, जहां ट्रायल शुरू हुआ।

धारा 319 CrPC के तहत आवेदन

ट्रायल के दौरान शिकायतकर्ता की ओर से अदालत में धारा 319 CrPC के तहत आवेदन पेश किया गया।

इस आवेदन में कहा गया कि मुकदमे के दौरान गवाहों के बयान से यह सामने आता है कि मृतका के ससुराल के अन्य सदस्य भी प्रताड़ना में शामिल थे। इसलिए उन्हें भी आरोपी बनाकर मुकदमे में शामिल किया जाए।

अदालत ने इस आवेदन पर विचार करते हुए 13 अप्रैल 2017 को आदेश पारित किया और कुछ हद तक आवेदन स्वीकार करते हुए राजेश, रजनी, मोहिनी और भगीरथ के खिलाफ धारा 498A IPC के तहत संज्ञान ले लिया।

इसी आदेश को चुनौती देते हुए इन चारों ने राजस्थान हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की।

आरोपी याचिकाकर्ताओं की दलीलें

याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में कहा गया कि ट्रायल कोर्ट द्वारा धारा 319 CrPC के तहत उन्हें आरोपी बनाना कानून और स्थापित न्यायिक सिद्धांतों के विपरीत है। उनके अनुसार पुलिस ने विस्तृत जांच के बाद यह पाया था कि उनके खिलाफ कोई ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, इसलिए जांच एजेंसी ने चार्जशीट केवल मृतका के पति दीपक के खिलाफ ही पेश की थी।

याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि जब जांच एजेंसी ने कई चरणों में जांच करने के बाद उनके खिलाफ कोई आपराधिक भूमिका नहीं पाई, तो केवल ट्रायल के दौरान दिए गए सामान्य बयानों के आधार पर उन्हें आरोपी बनाना उचित नहीं है।

उन्होंने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता और अन्य गवाहों के बयानों में उनके खिलाफ किसी भी प्रकार की विशिष्ट घटना, तारीख, बातचीत या प्रताड़ना का उल्लेख नहीं किया गया है। केवल यह कहा गया है कि “सभी ससुराल वाले प्रताड़ित करते थे”, जो कि एक सामान्य और अस्पष्ट आरोप है।

शिकायतकर्ता पिता की दलीलें

दूसरी ओर राज्य सरकार और शिकायतकर्ता पिता की ओर से याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयानों के आधार पर ही याचिकाकर्ताओं को आरोपी बनाने का आदेश दिया था।

अधिवक्ता ने कहा कि पिता और अन्य गवाहों ने अपने बयानों में स्पष्ट रूप से कहा है कि मृतका को उसके ससुराल में लगातार प्रताड़ित किया जाता था और उससे मायके से पांच लाख रुपये लाने के लिए दबाव बनाया जा रहा था।

उन्होंने अदालत को बताया कि ट्रायल के दौरान जब गवाहों के बयान दर्ज किए गए तो यह सामने आया कि मृतका को केवल उसके पति ही नहीं बल्कि परिवार के अन्य सदस्य भी मानसिक रूप से प्रताड़ित करते थे।

हाईकोर्ट का फैसला

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 319 CrPC अदालत को यह शक्ति देती है कि यदि ट्रायल के दौरान यह प्रतीत हो कि कोई अन्य व्यक्ति भी अपराध में शामिल है, तो उसे आरोपी के रूप में बुलाया जा सकता है।

लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह शक्ति सामान्य नहीं बल्कि असाधारण और विवेकाधीन है, जिसका प्रयोग बहुत सावधानी से किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Hardeep Singh बनाम पंजाब राज्य (2014) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को अतिरिक्त आरोपी के रूप में शामिल करने के लिए केवल प्रथम दृष्टया मामला पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उसके खिलाफ मजबूत और ठोस साक्ष्य होना चाहिए।

हाईकोर्ट का अंतिम फैसला

सभी दलीलों, तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने कहा कि राजेश, रजनी और मोहिनी के खिलाफ उपलब्ध सामग्री उन्हें आरोपी बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है।

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए इन तीनों को मामले की कार्यवाही से मुक्त कर दिया।

हालांकि भगीरथ सोनी के मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से रिवीजन याचिका पर जोर नहीं दिया गया, इसलिए उनके खिलाफ कार्यवाही जारी रखने का आदेश दिया गया।

जमानत पर आदेश

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि भगीरथ के खिलाफ केवल धारा 498A IPC के तहत संज्ञान लिया गया है, जिसमें अधिकतम सजा तीन वर्ष है।

इसलिए सुप्रीम कोर्ट के Arnesh Kumar बनाम बिहार राज्य फैसले में दिए गए दिशा-निर्देश इस मामले में लागू होंगे।

कोर्ट ने आदेश दिया कि आरोपी भगीरथ 30 मार्च तक ट्रायल कोर्ट में उपस्थित हों और यदि वे नियमित जमानत के लिए आवेदन करते हैं, तो अदालत उसी दिन उस पर विचार कर कानून के अनुसार निर्णय ले।

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