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केवल सह-आरोपी के बयान के आधार पर NDPS केस में किसी को आरोपी नहीं बनाया जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट

Rajasthan High Court Sets Aside Charges in NDPS Case, Says Co-Accused Statement Alone Insufficient

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने एनडीपीएस एक्ट से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ी व्यवस्था देते हुए कहा हैं कि केवल सह-आरोपी के बदलते हुए बयानों या पुलिस हिरासत में दिए गए कथित खुलासे के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप तय नहीं किए जा सकते।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक ऐसे बयानों के समर्थन में कोई स्वतंत्र साक्ष्य, बरामदगी या ठोस सामग्री उपलब्ध न हो, तब तक उन्हें अभियोजन का आधार नहीं बनाया जा सकता।

हाईकोर्ट ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए सिरोही पिंडवाड़ा की एनडीपीएस अदालत द्वारा आरोपी कमला शंकर नागदा के खिलाफ तय किए गए आरोपों को रद्द कर दिया।

जस्टिस जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया है।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आपराधिक न्याय प्रणाली का मूल सिद्धांत यह है कि किसी व्यक्ति को केवल संदेह या दूसरे आरोपी के आरोपों के आधार पर अपराधी नहीं ठहराया जा सकता। विशेष रूप से एनडीपीएस जैसे कठोर कानूनों में जहां न्यूनतम सजा भी बहुत अधिक है, वहां जांच और साक्ष्य के मानकों का और भी सख्ती से पालन करना आवश्यक है।

क्या है पूरा मामला

मामले के अनुसार 1 दिसंबर 2023 को पुलिस थाना पिंडवाड़ा के एसएचओ ने नियमित वाहन जांच के दौरान एक मारुति सुजुकी रिट्ज कार को रोका। कार में सवार व्यक्ति मन्नालाल के पास से तीन प्लास्टिक बैग में भरी हुई लगभग 4 किलो 760 ग्राम अफीम का लेटेक्स बरामद किया गया।

पुलिस ने अफीम को जब्त कर मन्नालाल को गिरफ्तार कर लिया।

पूछताछ के दौरान मन्नालाल ने दावा किया कि उसने यह अफीम भीलवाड़ा जिले के पुखराज नामक व्यक्ति से खरीदी थी और इसे बाड़मेर के मदन देवासी को पहुंचाने वाला था।

जांच के दौरान उसके कई अलग-अलग बयान दर्ज किए गए, जिनमें उसने समय-समय पर अलग-अलग व्यक्तियों के नाम लिए। बाद में 5 दिसंबर 2023 को उसने यह भी कहा कि उसने यह अफीम कमला शंकर नागदा से खरीदी थी।

इसी कथित खुलासे के आधार पर पुलिस ने 6 दिसंबर 2023 को कमला शंकर नागदा को गिरफ्तार कर लिया और उनके खिलाफ एनडीपीएस एक्ट की धारा 8/29 के तहत आरोप पत्र पेश किया।

इसके बाद विशेष एनडीपीएस अदालत ने 3 सितंबर 2024 को नागदा के खिलाफ आरोप तय कर दिए। इसी आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की।

याचिकाकर्ता की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में कहा गया कि उनके खिलाफ आरोप तय करने का एकमात्र आधार सह-आरोपी मन्नालाल का बयान है, जो कानून की दृष्टि में स्वतंत्र और ठोस साक्ष्य नहीं माना जा सकता।

अधिवक्ता ने तर्क दिया कि मन्नालाल ने पुलिस हिरासत में अलग-अलग समय पर कई बार अपने बयान बदले। पहले उसने पुखराज का नाम लिया, बाद में अन्य व्यक्तियों का और अंत में याचिकाकर्ता का नाम बताया।

याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि उनके खिलाफ कोई बरामदगी नहीं हुई, न ही कोई कॉल डिटेल, वित्तीय लेन-देन या अन्य स्वतंत्र साक्ष्य सामने आया है जो उन्हें अपराध से जोड़ता हो।

याचिकाकर्ता का यह भी कहना था कि यदि सह-अभियुक्त के बयान के आधार पर ही किसी को आरोपी बनाया जाए तो यह आपराधिक न्याय व्यवस्था के मूल सिद्धांतों के खिलाफ होगा।

हाईकोर्ट का फैसला और महत्वपूर्ण टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने मामले में बहस सुनने के बाद कहा कि सह-अभियुक्त मन्नालाल ने 2 दिसंबर 2023 को कुछ ही घंटों के भीतर अपने बयान कई बार बदले।

पहले उसने कहा कि अफीम पुखराज से मिली थी, फिर उसने कहा कि उसे अलग-अलग लोगों को देना था और बाद में उसने याचिकाकर्ता का नाम लिया।

अदालत ने कहा कि पुलिस हिरासत में दिए गए ऐसे बदलते हुए बयान अत्यंत संदिग्ध होते हैं और उनके आधार पर किसी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती।

कोर्ट ने यह भी कहा कि सह-अभियुक्त का बयान अपने आप में बहुत कमजोर साक्ष्य होता है और बिना स्वतंत्र पुष्टिकरण के उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

बरामदगी न होना भी महत्वपूर्ण

अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता के कथित खुलासे के आधार पर कोई नई बरामदगी नहीं हुई।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के अनुसार पुलिस हिरासत में आरोपी द्वारा दी गई सूचना तभी स्वीकार्य होती है जब उसके आधार पर कोई तथ्य या वस्तु बरामद हो।

लेकिन इस मामले में कथित बयान के बाद कोई भी नई बरामदगी नहीं हुई। इसलिए वह बयान कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य नहीं माना जा सकता।

एनडीपीएस मामलों में सख्त मानक जरूरी

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि एनडीपीएस एक्ट एक कठोर कानून है, जिसमें वाणिज्यिक मात्रा के मामलों में न्यूनतम 10 वर्ष की सजा का प्रावधान है।

ऐसे मामलों में जांच एजेंसियों और अदालतों को अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने और उसके खिलाफ मुकदमा चलाने से पहले यह सुनिश्चित होना चाहिए कि उसके खिलाफ पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य मौजूद हों।

धारा 29 के तहत साजिश के आरोप पर भी टिप्पणी

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि एनडीपीएस एक्ट की धारा 29 के तहत साजिश या उकसावे का आरोप लगाने के लिए यह दिखाना जरूरी है कि आरोपियों के बीच अपराध करने की पूर्व सहमति या साझा योजना थी।

लेकिन इस मामले में ऐसा कोई भी साक्ष्य रिकॉर्ड पर नहीं है जो यह दिखाता हो कि याचिकाकर्ता और मुख्य आरोपी के बीच किसी प्रकार की साजिश या आपराधिक समझौता हुआ था।

कोर्ट ने कहा कि केवल संदेह या अनुमान के आधार पर किसी को साजिश का आरोपी नहीं बनाया जा सकता।

ट्रायल कोर्ट के आदेश को बताया त्रुटिपूर्ण

हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने आरोप तय करते समय यह नहीं बताया कि कौन-सा साक्ष्य याचिकाकर्ता को अपराध से जोड़ता है।

अदालत के अनुसार आदेश में न तो आरोपों के तत्वों का विश्लेषण किया गया और न ही उपलब्ध साक्ष्यों का उल्लेख किया गया।

इस कारण अदालत ने इसे संक्षिप्त और बिना कारण वाला आदेश बताते हुए इसे कानून के अनुरूप नहीं माना।

हाईकोर्ट का अंतिम फैसला

सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ ऐसा कोई ठोस और स्वतंत्र साक्ष्य नहीं है जो यह दर्शाए कि उन्होंने एनडीपीएस अपराध में कोई भूमिका निभाई।

इसलिए अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा 3 सितंबर 2024 को पारित आदेश को रद्द करते हुए याचिकाकर्ता के खिलाफ तय किए गए आरोपों को निरस्त कर दिया।

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