ऑडियो रिकॉर्डिंग और ट्रैप सबूतों के आधार पर कोटा डिस्कॉम एईएन की सजा कायम, दोनों आरोपियों की अपील खारिज-मुकर गया था शिकायतकर्ता
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) के एक ट्रैप मामले में महत्वपूर्ण फैसला देते हुए जयपुर डिस्कॉम के तत्कालीन सहायक अभियंता (AEN) पृथ्वीलाल मीणा और उसके सहयोगी हेमराज उर्फ फोरू की सजा को बरकरार रखा है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए फैसला देते हुए कहा है कि यदि रिश्वत मांगने और लेने का सबूत इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्डिंग तथा अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से साबित हो जाता है, तो केवल शिकायतकर्ता के मुकर जाने से पूरा मामला कमजोर नहीं हो जाता।
जस्टिस प्रमिल कुमार माथुर की एकलपीठ ने दोनों आरोपियों की याचिका को खारिज करते हुए कोटा एसीबी कोर्ट के 6 जुलाई 2019 को दिए गए फैसले पर मुहर लगा दी है।
मामला क्या था
शिकायतकर्ता कैलाश मीणा और रामफूल मीणा ने 1 फरवरी 2016 को एसीबी बूंदी में शिकायत दी थी कि जयपुर डिस्कॉम के सहायक अभियंता पृथ्वीलाल मीणा ने उनके बिजली कनेक्शन की जांच के बाद 80 हजार रुपये का वीसीआर (VCR) जुर्माना बताकर मामला निपटाने के लिए रिश्वत मांगी।
शिकायत में कहा गया कि अधिकारी ने अपने ड्राइवर और सहयोगियों के माध्यम से 20 हजार रुपये की रिश्वत की मांग की।
शिकायतकर्ताओं ने पहले 14,500 रुपये दे दिए और बाकी 5,500 रुपये बाद में देने की बात तय हुई।
इसके बाद एसीबी ने शिकायत की पुष्टि की और 2 फरवरी 2016 को ट्रैप कार्रवाई की योजना बनाई।
एसीबी का ट्रैप और गिरफ्तारी
एसीबी ने रिश्वत के 5,500 रुपये के नोटों पर फिनॉलफ्थेलीन पाउडर लगाया और शिकायतकर्ता को निर्देश दिया कि वह पैसे आरोपी को दे।
ट्रैप के दौरान आरोपी अधिकारी के कार्यालय में बातचीत हुई और उसके इशारे पर यह रकम उसके सहयोगी हेमराज को दी गई।
एसीबी टीम ने तुरंत छापा मारकर हेमराज को रंगे हाथों पकड़ लिया और उसके पास से वही 5,500 रुपये बरामद किए।
जांच के दौरान दोनों आरोपी उसी कमरे में मौजूद पाए गए।
तलाशी के दौरान एक लाल डायरी और अन्य दस्तावेज भी बरामद किए गए, जिनमें मीटर जांच और वीसीआर से जुड़े विवरण दर्ज थे।
ट्रायल कोर्ट का फैसला
एसीबी की विशेष अदालत ने 2019 में दोनों आरोपियों को दोषी ठहराया था।
सहायक अभियंता पृथ्वीलाल मीणा को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत 3 साल का कठोर कारावास और धारा 13(1)(d) और 13(2) के तहत 5 साल का कठोर कारावास तथा धारा 120-B आईपीसी के तहत 6 महीने की सजा सुनाई।
वहीं सहयोगी हेमराज उर्फ फोरू को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 8 के तहत 4 साल का कठोर कारावास और धारा 120-B आईपीसी के तहत 6 महीने की सजा सुनाई गई।
सभी सजाएं साथ-साथ चलने के आदेश दिए गए थे।
दोनों आरोपियों ने ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दायर कर चुनौती दी।
हाईकोर्ट में आरोपियों की दलील
आरोपी पृथ्वीलाल मीणा और हेमराज उर्फ फोरू की ओर से अदालत में दायर अपील में ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई।
उनके वकीलों ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने कानून और तथ्यों का सही तरीके से मूल्यांकन नहीं किया और केवल अनुमान के आधार पर दोषसिद्धि कर दी।
1. शिकायतकर्ता के मुकर जाने से मामला कमजोर
अपीलकर्ताओं की ओर से सबसे महत्वपूर्ण तर्क यह दिया गया कि इस मामले के मुख्य शिकायतकर्ता और महत्वपूर्ण गवाह अदालत में अपने बयान से मुकर गए थे।
जब मुख्य गवाह ही अभियोजन का समर्थन नहीं करते, तो केवल अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती।
2. रिश्वत की मांग और स्वीकार करने का प्रमाण नहीं
अपीलकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए रिश्वत की स्पष्ट मांग (Demand) और रिश्वत की स्वीकृति (Acceptance) दोनों तत्वों का स्पष्ट और विश्वसनीय प्रमाण इस मामले में उपलब्ध नहीं है।
3. इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य अविश्वसनीय
अपीलकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया कि अभियोजन ने जिस वॉइस रिकॉर्डिंग को मुख्य साक्ष्य के रूप में पेश किया है, वह विश्वसनीय नहीं है।
रिकॉर्डिंग की प्रमाणिकता संदिग्ध है और बातचीत का पूरा संदर्भ स्पष्ट नहीं है।
4. अभियोजन की कहानी में विरोधाभास
अपीलकर्ताओं ने यह भी कहा कि कई स्वतंत्र गवाह अदालत में hostile हो गए और जांच तथा ट्रैप की प्रक्रिया में कई खामियां हैं।
5. अभियोजन स्वीकृति (Sanction) पर आपत्ति
अपीलकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि अभियोजन की अनुमति (Sanction for prosecution) सही तरीके से नहीं दी गई।
उनका कहना था कि संबंधित प्राधिकारी ने बिना उचित विचार किए अभियोजन की अनुमति दे दी, जो कानूनन त्रुटिपूर्ण है।
6. कानूनी फैसलों का हवाला
अपीलकर्ताओं ने अपने पक्ष को मजबूत करने के लिए कई न्यायिक फैसलों का हवाला दिया, जिनमें मुख्य रूप से Sarwan Singh vs State of Punjab, S.K. Saini vs CBI, Kumar Sanjay vs CBI, Madan Lal vs State of Rajasthan और Rattaram vs State of Rajasthan शामिल हैं।
इन फैसलों के आधार पर उन्होंने कहा कि केवल संदेह या परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती।
राज्य सरकार की मजबूत दलीलें
राज्य सरकार की ओर से लोक अभियोजक (Public Prosecutor) Manvendra Singh Shekhawat ने अपील का विरोध करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही बताया और कहा कि अभियोजन ने आरोपियों के खिलाफ अपराध को पूरी तरह साबित कर दिया है।
1. ट्रैप कार्रवाई और बरामदगी मजबूत साक्ष्य
राज्य की ओर से कहा गया कि एसीबी ने पूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए ट्रैप कार्रवाई की। रिश्वत की रकम फिनॉलफ्थेलीन पाउडर से तैयार की गई और आरोपी के सहयोगी से वही रकम बरामद हुई।
बरामदगी के दौरान दोनों आरोपी एक ही कमरे में मौजूद थे और यह तथ्य अपने आप में आरोपियों की संलिप्तता को साबित करता है।
2. इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य से रिश्वत की मांग साबित
अभियोजन ने कहा कि इस मामले में डिजिटल वॉइस रिकॉर्डिंग महत्वपूर्ण साक्ष्य है।
रिकॉर्डिंग में रिश्वत की मांग और भुगतान की बातचीत दर्ज है और रिकॉर्डिंग की ट्रांसक्रिप्ट अदालत में पेश की गई, जिसके साथ भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B का प्रमाणपत्र भी दिया गया।
सरकार ने कहा कि इससे यह इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य पूरी तरह वैध और स्वीकार्य हो जाता है।
3. शिकायतकर्ता के मुकरने से केस खत्म नहीं
अभियोजन ने कहा कि कई भ्रष्टाचार मामलों में शिकायतकर्ता बाद में मुकर जाते हैं। लेकिन यदि अन्य साक्ष्य मौजूद हों, जैसे ट्रैप टीम के बयान, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्डिंग, बरामदगी और दस्तावेजी साक्ष्य, तो केवल शिकायतकर्ता के मुकरने से अभियोजन का पूरा मामला कमजोर नहीं होता।
4. धारा 20 के तहत कानूनी अनुमान
अभियोजन ने कहा कि जब आरोपी के पास से रिश्वत की रकम बरामद हो जाती है, तो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 20 के तहत यह माना जाता है कि वह रिश्वत ही थी।
इसके बाद यह जिम्मेदारी आरोपी पर होती है कि वह साबित करे कि वह रकम रिश्वत नहीं थी।
5. सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
राज्य ने सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले Neeraj Dutta vs State of NCT of Delhi (2023) का हवाला दिया।
इस फैसले में कहा गया है कि रिश्वत की मांग को परिस्थितिजन्य साक्ष्य और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के माध्यम से भी सिद्ध किया जा सकता है, भले ही शिकायतकर्ता बाद में hostile हो जाए।
हाईकोर्ट का फैसला
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों में सबसे महत्वपूर्ण तत्व रिश्वत की मांग (Demand) है।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि रिश्वत मांगने का सबूत केवल शिकायतकर्ता के बयान से ही नहीं, बल्कि परिस्थितिजन्य या इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य से भी साबित किया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने इस मामले में पाया कि वॉइस रिकॉर्डिंग में स्पष्ट रूप से पैसे की मांग और भुगतान की बात सामने आई है और ट्रैप तुरंत उसी बातचीत के बाद किया गया।
कोर्ट ने कहा कि आरोपी के सहयोगी से वही रकम बरामद हुई और दोनों आरोपी मौके पर मौजूद थे।
इन सभी तथ्यों से साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला बनती है जो आरोपियों के खिलाफ जाती है।
शिकायतकर्ता के मुकरने पर कोर्ट का रुख
हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि ट्रैप मामलों में अक्सर शिकायतकर्ता मुकर जाते हैं, लेकिन इससे अभियोजन का पूरा मामला खत्म नहीं हो जाता।
यदि ट्रैप कार्रवाई सही तरीके से हुई हो, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्डिंग प्रमाणित हो, बरामदगी और परिस्थितिजन्य साक्ष्य मौजूद हों तो अदालत दोषसिद्धि बरकरार रख सकती है।
अंतिम फैसला
सभी साक्ष्यों और दलीलों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष ने रिश्वत मांगने और स्वीकार करने के आरोप को पर्याप्त रूप से साबित किया है।
अदालत ने कहा कि आरोपियों ने अपने बचाव में ऐसा कोई विश्वसनीय स्पष्टीकरण नहीं दिया जिससे उनके खिलाफ बने कानूनी अनुमान को खंडित किया जा सके।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने दोनों आरोपियों की अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट की सजा को बरकरार रखा।