NDPS केस में आरोपी पुलिस अधिकारी को बड़ी राहत: विभागीय जांच के दस्तावेज—गवाहों के बयान तलब करने का आदेश, राजस्थान हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश किया रद्द
जयपुर/जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने NDPS एक्ट से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में आरोपी को राहत देते हुए कहा है कि निष्पक्ष और न्यायसंगत ट्रायल के लिए आरोपी को ऐसे सभी दस्तावेजों तक पहुंच मिलनी चाहिए जो उसके बचाव के लिए जरूरी हों।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी मामले से संबंधित विभागीय जांच में दर्ज गवाहों के बयान या अन्य रिकॉर्ड उपलब्ध हैं, तो उन्हें ट्रायल के दौरान मंगाया जा सकता है ताकि आरोपी प्रभावी ढंग से जिरह कर सके।
जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू की एकलपीठ ने यह रिपोर्टेबल जजमेंट यशवंत सोलंकी की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।
अपने फैसले में एकलपीठ ने NDPS कोर्ट द्वारा पारित उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी की ओर से दायर आवेदन को खारिज कर दिया गया था।
क्या है पूरा मामला
चित्तौड़गढ़ जिले के मंडफिया थाने में वर्ष 2023 में NDPS से जुड़े एक मामले से यह विवाद शुरू हुआ था, जिसके जब्ती अधिकारी (Seizure Officer) याचिकाकर्ता यशवंत सोलंकी थे।
इस मामले में NDPS एक्ट की धारा 8/22 और 8/29 के तहत कार्रवाई की गई थी।
पुलिस जांच के बाद उनके खिलाफ चालान पेश किया गया और मामला ट्रायल कोर्ट में विचाराधीन है।
इस बीच, घटना को लेकर रेखा खटीक और नरेश खटीक ने उदयपुर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक को शिकायत दी।
शिकायत में मंडफिया थाने की टीम द्वारा की गई कार्रवाई में अनियमितताओं, रिकॉर्ड में हेरफेर और प्रक्रिया संबंधी त्रुटियों के आरोप लगाए गए।
शिकायत में जब्ती अधिकारी (Seizure Officer) याचिकाकर्ता यशवंत सोलंकी के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए गए।
इस शिकायत के आधार पर पुलिस विभाग ने राजस्थान सिविल सेवा (CCA) नियम 1958 के नियम 16 के तहत विभागीय जांच शुरू कर दी। विभागीय जांच में जब्ती टीम, पेट्रोलिंग टीम और अन्य गवाहों के बयान भी दर्ज किए गए।
जिसमें एक मामले के जब्ती अधिकारी (Seizure Officer) याचिकाकर्ता यशवंत सोलंकी पर यह आरोप लगाया गया कि उन्होंने मिलीभगत करते हुए NDPS के आरोपी को बचाने में भूमिका निभाई।
ट्रायल कोर्ट ने क्यों खारिज किया आवेदन
आरोपी यशवंत सोलंकी ने ट्रायल कोर्ट में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) 2023 की धारा 94 के तहत आवेदन दायर किया।
इसमें उन्होंने मांग की कि विभागीय जांच से जुड़े दस्तावेज और गवाहों के बयान अदालत में मंगवाए जाएं ताकि ट्रायल के दौरान गवाहों से जिरह में उनका उपयोग किया जा सके।
हालांकि, NDPS कोर्ट ने यह आवेदन खारिज कर दिया।
अदालत का कहना था कि यदि विभागीय जांच के रिकॉर्ड तलब किए गए तो इससे विभागीय कार्यवाही प्रभावित हो सकती है।
इस आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ता की दलील
याचिकाकर्ता ने अपने पक्ष में दलील दी कि जिन बयानों और नोटशीट के आधार पर NDPS का आपराधिक मुकदमा चल रहा है, उन दस्तावेजों का ट्रायल में महत्वपूर्ण महत्व है।
इसलिए ट्रायल के दौरान जब अभियोजन पक्ष के गवाह अदालत में बयान दें, तो उनसे जिरह करते समय उनके पूर्व बयानों से तुलना की जा सके और सत्यता की जांच के लिए वे दस्तावेज याचिकाकर्ता के पास होना जरूरी हैं।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने दलील दी कि पहले सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत भी इन दस्तावेजों की प्रतियां मांगी थीं, लेकिन विभाग ने गोपनीयता का हवाला देकर उन्हें देने से इनकार कर दिया।
ऐसी स्थिति में मजबूर होकर याचिकाकर्ता ने ट्रायल कोर्ट में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 94 के तहत आवेदन दायर कर विभागीय जांच का रिकॉर्ड तलब करने का अनुरोध किया था।
अधिवक्ता ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने इस आवेदन को बिना ठोस कारण बताए खारिज कर दिया। अदालत ने केवल यह कहा कि विभागीय रिकॉर्ड मंगाने से विभागीय जांच प्रभावित हो सकती है।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि यह कारण कानूनन टिकाऊ नहीं है क्योंकि किसी आरोपी के बचाव के अधिकार को केवल इस आधार पर नहीं रोका जा सकता कि इससे विभागीय कार्यवाही प्रभावित हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों—P. Ponnusamy बनाम तमिलनाडु राज्य तथा State of Orissa बनाम Debendra Nath Padhi—का हवाला देते हुए अधिवक्ता ने दलील दी कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष और न्यायसंगत ट्रायल हर आरोपी का मौलिक अधिकार है।
सरकार और प्रतिवादी का पक्ष
याचिका का विरोध करते हुए राज्य सरकार ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने अपने विवेक का उपयोग करते हुए याचिकाकर्ता का आवेदन खारिज किया है और इसमें किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि नहीं है।
राज्य सरकार की दलील थी कि विभागीय जांच एक अलग प्रशासनिक प्रक्रिया है और उसका रिकॉर्ड सीधे तौर पर आपराधिक मुकदमे का हिस्सा नहीं है।
यदि विभागीय जांच के सभी दस्तावेज अदालत में मंगाए जाते हैं तो इससे विभागीय कार्यवाही प्रभावित हो सकती है और उसकी निष्पक्षता पर भी असर पड़ सकता है।
राज्य ने यह भी कहा कि यह अभियोजन पक्ष का अधिकार है कि वह किन दस्तावेजों पर भरोसा करना चाहता है और किन्हें रिकॉर्ड पर लाना चाहता है।
ऐसे में आरोपी को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि वह विभागीय जांच के पूरे रिकॉर्ड को तलब करवा ले।
हाईकोर्ट का फैसला
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि निष्पक्ष ट्रायल संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आरोपी का मौलिक अधिकार है।
यदि कोई दस्तावेज आरोपी के बचाव के लिए महत्वपूर्ण है, तो केवल इस आधार पर उसे रोका नहीं जा सकता कि उससे विभागीय जांच प्रभावित हो सकती है।
कोर्ट ने कहा कि विभागीय जांच में दर्ज गवाहों के बयान और दस्तावेज उसी घटना से जुड़े हैं जिस पर आपराधिक मुकदमा चल रहा है।
ऐसे में यह सामग्री ट्रायल के दौरान गवाहों की विश्वसनीयता परखने और प्रभावी जिरह के लिए जरूरी हो सकती है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि BNSS की धारा 94 अदालत को यह अधिकार देती है कि वह ऐसे दस्तावेज या वस्तुएं तलब कर सकती है जो किसी जांच, पूछताछ या ट्रायल के लिए आवश्यक हों।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने आवेदन खारिज करते समय उचित कारण नहीं दिया।
हाईकोर्ट ने NDPS कोर्ट के 4 अक्टूबर 2025 के आदेश को रद्द करते हुए आरोपी द्वारा दायर धारा 94 BNSS का आवेदन स्वीकार कर लिया।
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को आदेश दिया कि विभागीय जांच के रिकॉर्ड और गवाहों के बयान संबंधित विभाग से तलब किए जाएं।
साथ ही अदालत ने यह भी आदेश दिया कि ट्रायल कोर्ट इन दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां अपने रिकॉर्ड में रखे और मूल दस्तावेज विभाग को वापस लौटा दे, ताकि विभागीय जांच प्रभावित न हो।