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60 दिन में ट्रायल पूरा करना अनिवार्य नहीं, समय सीमा पार होने से आरोपी को स्वतः जमानत का अधिकार नहीं मिलता-राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Trial Not Mandatory Within 60 Days: Rajasthan High Court Says Accused Does Not Automatically Get Bail After Deadline

BNSS की धारा 480(6) पर अहम व्याख्या, साइबर फ्रॉड के 82 लाख रुपये के मामले में आरोपी की जमानत याचिका खारिज; राज्यभर की अदालतों को ट्रायल तेजी से पूरा करने के निर्देश

जयपुर। 60 दिन में ट्रायल पूरा नहीं होने पर आरोपी को स्वतः जमानत का अधिकार मिलने की दलील को खारिज करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने साइबर फ्रॉड से जुड़े एक आरोपी की जमानत याचिका को खारिज करते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने इस कानूनी बिंदु को स्पष्ट करते हुए कहा है कि यदि मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय किसी गैर-जमानती मामले में 60 दिनों के भीतर ट्रायल पूरा नहीं होता, तो केवल इसी आधार पर आरोपी को स्वतः जमानत का अधिकार नहीं मिल जाता।

जस्टिस चंद्र प्रकाश श्रीमाली ने स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 480(6) मुकदमे की प्रक्रिया को तेज करने के उद्देश्य से बनाई गई है, लेकिन इसे ऐसा प्रावधान नहीं माना जा सकता जो आरोपी को स्वचालित रूप से जमानत का अधिकार प्रदान कर दे।

जस्टिस चंद्र प्रकाश श्रीमाली ने साइबर फ्रॉड के गंभीर मामले में आरोपी अजीत कुमार शुक्ला की जमानत याचिका खारिज करते हुए यह महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या दी।

60 दिन की समयसीमा पर हाईकोर्ट की स्पष्ट टिप्पणी

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने मुख्य कानूनी प्रश्न यह था कि क्या मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय गैर-जमानती मामले में यदि आरोप तय होने के बाद 60 दिनों के भीतर ट्रायल पूरा नहीं होता तो आरोपी को स्वतः जमानत मिल जाती है।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि BNSS की धारा 480(6) का उद्देश्य मुकदमे की प्रक्रिया को तेज करना है ताकि आरोपी को अनावश्यक रूप से लंबे समय तक न्यायिक हिरासत में न रहना पड़े।

लेकिन अदालत ने कहा कि इस प्रावधान को अनिवार्य (mandatory) नहीं माना जा सकता। यदि अदालत उचित कारण दर्ज कर दे, तो वह 60 दिन की अवधि पार होने के बावजूद भी आरोपी को जमानत देने से इनकार कर सकती है।

कोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान आरोपी को स्वतः जमानत देने का पूर्ण और अविच्छिन्न अधिकार प्रदान नहीं करता।

क्या है पूरा मामला

जयपुर शहर (दक्षिण) के श्याम नगर थाना क्षेत्र में वर्ष 2024 में साइबर फ्रॉड को लेकर एक एफआईआर दर्ज की गई।

जिसके आधार पर आरोपी याचिकाकर्ता के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 406 और 120-बी के साथ-साथ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66C और 66D के तहत मामला दर्ज किया गया था।

आरोप है कि आरोपी ने शिकायतकर्ता को एक “प्रॉफिट ट्रेडिंग प्लान” का लालच दिया और उसे एक वेब एप्लिकेशन डाउनलोड करने के लिए प्रेरित किया।

इसके बाद व्हाट्सऐप संदेशों के माध्यम से अलग-अलग समय पर शिकायतकर्ता के खाते से पैसे ट्रांसफर करवा लिए।

जांच के दौरान सामने आया कि इस तरीके से कुल 82 लाख रुपये की ठगी की गई, जिसमें से लगभग 65 से 70 लाख रुपये आरोपी के बैंक खाते में जमा हुए थे।

याचिकाकर्ता का पक्ष

आरोपी अजीत कुमार शुक्ला की ओर से दलील दी गई कि याचिकाकर्ता के खिलाफ लगाए गए अपराध मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय हैं और वह 24 मई 2025 से न्यायिक हिरासत में है। ऐसे में लंबे समय तक उसे जेल में रखना उचित नहीं है।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि ट्रायल कोर्ट ने जमानत देने से इनकार करते समय मुख्य रूप से इस तथ्य को आधार बनाया कि उसके खिलाफ अन्य आपराधिक मामले भी दर्ज हैं।

हालांकि अधिवक्ता का तर्क था कि केवल अन्य मामलों का लंबित होना जमानत से इनकार करने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने दलील दी कि 18 अगस्त 2025 को ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोप तय किए जा चुके हैं। इसके बावजूद आरोप तय होने के बाद से अब तक किसी भी गवाह का बयान दर्ज नहीं किया गया है।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 480(6) के अनुसार यदि मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय गैर-जमानती मामले में आरोप तय होने के बाद 60 दिनों के भीतर ट्रायल पूरा नहीं होता है, तो आरोपी को जमानत का लाभ दिया जा सकता है।

अधिवक्ता ने कहा कि चूंकि आरोप तय होने के बाद 60 दिन की अवधि बीत चुकी है और ट्रायल आगे नहीं बढ़ा है, इसलिए कानून के अनुसार याचिकाकर्ता जमानत का हकदार है।

अपने तर्कों के समर्थन में याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने विभिन्न न्यायिक निर्णयों का हवाला भी दिया। इनमें Ankit Bansal बनाम Union of India तथा Banwari Lal Kushwah बनाम State of Rajasthan जैसे मामलों का उल्लेख किया गया।

सरकार का जवाब

राज्य सरकार की ओर से लोक अभियोजक ने जमानत याचिका का कड़ा विरोध किया और अदालत को बताया कि आरोपी के खिलाफ गंभीर साइबर फ्रॉड का आरोप है।

राज्य के अनुसार आरोपी ने शिकायतकर्ता को “प्रॉफिट ट्रेडिंग प्लान” का लालच देकर एक वेब एप्लिकेशन डाउनलोड करवाया और उसके बाद व्हाट्सऐप संदेशों के माध्यम से अलग-अलग समय पर शिकायतकर्ता के बैंक खाते से रकम ट्रांसफर करवा ली।

इस प्रकार आरोपी ने कुल लगभग 82 लाख रुपये की ऑनलाइन ठगी की, जिसमें से लगभग 65 से 70 लाख रुपये आरोपी के बैंक खाते में जमा हुए थे।

राज्य सरकार ने अदालत को यह भी बताया कि आरोपी के खिलाफ विभिन्न थानों में इसी प्रकार के चार अन्य आपराधिक मामले भी दर्ज हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वह इस प्रकार के अपराधों में शामिल रहा है।

लोक अभियोजक ने कहा कि साइबर फ्रॉड जैसे अपराध अत्यंत गंभीर हैं और यह न केवल व्यक्तिगत स्तर पर आर्थिक नुकसान पहुंचाते हैं बल्कि देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था और वित्तीय व्यवस्था को भी प्रभावित करते हैं।

राज्य ने यह भी दलील दी कि केवल इस आधार पर कि ट्रायल 60 दिनों में पूरा नहीं हुआ, आरोपी को स्वतः जमानत नहीं दी जा सकती।

राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि ट्रायल में देरी के कई कारण हो सकते हैं, जैसे आरोपी की अनुपस्थिति, न्यायिक अधिकारी का अवकाश, गवाहों को समन की तामील में देरी या अन्य प्रशासनिक कारण।

ऐसी स्थिति में BNSS की धारा 480(6) को अनिवार्य प्रावधान नहीं माना जा सकता और अदालत परिस्थितियों को देखते हुए जमानत देने या न देने का निर्णय ले सकती है।

राज्य ने यह भी कहा कि आरोपों की गंभीरता, आरोपी के खिलाफ लंबित अन्य मामलों और साइबर अपराध के व्यापक प्रभाव को देखते हुए जमानत याचिका खारिज की जानी चाहिए।

साइबर फ्रॉड गंभीर अपराध

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि साइबर फ्रॉड के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं और यह आधुनिक डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन चुके हैं।

कोर्ट ने कहा कि डिजिटल लेन-देन पूरी तरह सार्वजनिक विश्वास पर आधारित होते हैं और साइबर अपराध उस विश्वास को कमजोर करते हैं।

ऐसे अपराधों का प्रभाव केवल किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता बल्कि यह व्यापक आर्थिक व्यवस्था को भी प्रभावित कर सकता है।

राज्यभर की अदालतों को निर्देश

हाईकोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान यह भी पाया कि कई मजिस्ट्रेट अदालतों में आरोप तय होने के बाद गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए जाते।

अदालत ने कहा कि कई मामलों में समन जारी होने के बावजूद उनकी सही तरीके से तामील नहीं होती या फिर अदालत के आदेशों का पालन नहीं किया जाता।

इसी को देखते हुए हाईकोर्ट ने राज्यभर की अदालतों को निर्देश दिए कि:

  • गैर-जमानती मामलों में ट्रायल को यथासंभव 60 दिनों के भीतर पूरा करने का प्रयास किया जाए
  • गवाहों को समय पर समन जारी किए जाएं
  • अनावश्यक लंबी तारीखें देने से बचा जाए
  • जिला एवं सत्र न्यायाधीश ऐसे मामलों की नियमित निगरानी करें

हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल के जरिए मामले के फैसले की प्रति कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखते हुए संपूर्ण जिला एवं सत्र न्यायाधीशों को सर्कुलेट करने के निर्देश दिए हैं।

जमानत याचिका खारिज

मामले के सभी तथ्यों, आरोपों की गंभीरता और आरोपी के खिलाफ लंबित अन्य मामलों को देखते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी अजीत कुमार शुक्ला को जमानत देने से इनकार कर दिया।

अदालत ने कहा कि आरोपी पर गंभीर साइबर फ्रॉड का आरोप है और उसके खिलाफ अन्य आपराधिक मामले भी लंबित हैं। ऐसे में इस स्तर पर उसे जमानत देना उचित नहीं होगा।

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