टोल प्लाजा की फुटेज पेश न करने पर अदालत ने उठाए सवाल , कहा-जांच एजेंसी का कर्तव्य है कि सबसे विश्वसनीय सबूत अदालत के सामने रखे, ट्रायल कोर्ट को अभियोजन के खिलाफ प्रतिकूल अनुमान लगाने के निर्देश
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसमें एक मां ने आरोप लगाया है कि पुलिस के वाहन से टच होने पर पुलिस ने उसके बेटे को NDPS केस में न केवल फंसाया, बल्कि जिस टोल प्लाजा पर कार्रवाई को अंजाम देने की बात कही गई, उस जगह पर लगे सबसे अहम सबूत CCTV फुटेज को जानबूझकर पुलिस द्वारा गायब कर दिया है।
याचिकाकर्ता मां का यह भी आरोप है कि ट्रायल कोर्ट में बार-बार CCTV फुटेज की मांग करने के बावजूद उपलब्ध नहीं करवाए गए।
यहां तक कि पुलिस ने तब तक इंतजार किया जब तक कि टोल प्लाजा द्वारा उन फुटेज को डिलीट नहीं कर दिया गया।
इसके बाद भी याचिकाकर्ता मां ने CCTV फुटेज को अपने खर्च पर रिकवरी कराने का आवेदन किया, जिस पर कोई जवाब नहीं दिया गया।
हाईकोर्ट ने क्या कहा
राजस्थान हाईकोर्ट ने अब इस अहम मामले में जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि किसी आपराधिक मामले में उपलब्ध सबसे महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को सुरक्षित नहीं रखा जाता या अदालत के सामने प्रस्तुत नहीं किया जाता, तो इसका प्रतिकूल प्रभाव अभियोजन के मामले पर पड़ेगा।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि
जब किसी घटना से जुड़ा सबसे विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध हो सकता है और फिर भी उसे प्रस्तुत नहीं किया जाता, तो अदालत भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114(g) के तहत यह मान सकती है कि वह साक्ष्य अभियोजन के खिलाफ जाता।
यह महत्वपूर्ण टिप्पणी राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ के जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने सावित्री देवी द्वारा दायर आपराधिक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए की।
मां ने दायर की याचिका
मामला श्रीगंगानगर जिले के राजियासर थाना क्षेत्र में दर्ज NDPS केस से जुड़ा है।
याचिकाकर्ता सावित्री देवी ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर आरोप लगाया कि उनके बेटे को NDPS एक्ट के मामले में झूठा फंसाया गया है।
बीकानेर पुलिस का दावा था कि गश्त के दौरान एक स्विफ्ट कार और एक बोलेरो पिकअप संदिग्ध स्थिति में दिखाई दी।
पुलिस ने उनका पीछा किया और बीकानेर-सूरतगढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित हिंडोर टोल प्लाजा के पास उन्हें रोककर तलाशी ली।
पुलिस के अनुसार स्विफ्ट कार से करीब 76 किलो पोस्त (पॉपी हस्क) बरामद किया गया।
हालांकि याचिकाकर्ता का कहना था कि पूरी कार्रवाई संदिग्ध परिस्थितियों में की गई और पुलिस ने गलत तरीके से आरोपी को फंसाया है।
याचिकाकर्ता की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में कहा गया कि उनके बेटे के खिलाफ दर्ज NDPS केस पूरी तरह से संदिग्ध परिस्थितियों में बनाया गया है।
याचिकाकर्ता मां के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि घटना जिस स्थान पर हुई बताई जा रही है, वह हिंडोर टोल प्लाजा है और वहां CCTV कैमरे लगे हुए हैं। ऐसे में पूरे घटनाक्रम की सच्चाई CCTV फुटेज से सामने आ सकती थी।
याचिकाकर्ता ने अदालत में यह भी कहा कि उनके बेटे का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और पुलिस ने कथित तौर पर पीछा करते समय कार के साइड मिरर को नुकसान पहुंचाया, इसी विवाद के बाद पुलिस ने झूठा मामला बना दिया।
याचिकाकर्ता का यह भी आरोप था कि पुलिस ने जांच के दौरान महत्वपूर्ण साक्ष्यों को सुरक्षित रखने में लापरवाही बरती।
याचिकाकर्ता ने 4 जनवरी 2023 को ट्रायल कोर्ट में धारा 91 CrPC के तहत आवेदन देकर 20 दिसंबर 2022 की सुबह 8:45 बजे से दोपहर 1 बजे तक की CCTV फुटेज पेश करने की मांग की थी।
याचिकाकर्ता के अनुसार यह फुटेज पूरे घटनाक्रम को स्पष्ट कर सकती थी और इससे यह साबित हो सकता था कि पुलिस की कहानी सही नहीं है।
फुटेज पेश करने के लिए कोर्ट का आदेश
ट्रायल कोर्ट ने याचिकाकर्ता की मांग को सही मानते हुए अभियोजन पक्ष को CCTV फुटेज पेश करने के निर्देश दिए।
लेकिन इसके बावजूद जांच एजेंसी बार-बार समय मांगती रही और फुटेज अदालत में पेश नहीं की गई।
आखिरकार टोल प्लाजा प्रबंधन की ओर से बताया गया कि संबंधित तारीख की CCTV फुटेज डिलीट हो चुकी है क्योंकि डेटा केवल सीमित अवधि तक ही सुरक्षित रहता है।
याचिकाकर्ता का आरोप था कि जांच एजेंसी ने जानबूझकर फुटेज हासिल करने में देरी की ताकि वह स्वतः डिलीट हो जाए।
आरोपी की ओर से डेटा रिकवर कराने का प्रस्ताव
मामले की सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि आरोपी ने स्वयं अदालत के सामने प्रस्ताव रखा कि यदि आवश्यक हो तो वह तकनीकी विशेषज्ञों के माध्यम से हार्ड डिस्क से डेटा रिकवर कराने का खर्च भी वहन करने को तैयार है।
लेकिन अभियोजन पक्ष ने इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने में कोई विशेष रुचि नहीं दिखाई।
अदालत ने इस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह असामान्य है कि आरोपी स्वयं सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य अदालत के सामने लाने के लिए तैयार हो और अभियोजन पक्ष उसमें सहयोग न करे।
सरकार का जवाब
इस मामले में राज्य सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत में कहा कि पुलिस ने मामले की जांच विधि के अनुसार की है।
अभियोजन पक्ष का तर्क था कि पुलिस ने गश्त के दौरान संदिग्ध वाहन देखे और उन्हें रोककर तलाशी ली गई, जिसमें तलाशी के दौरान स्विफ्ट कार से मादक पदार्थ बरामद हुआ।
अभियोजन का कहना था कि बरामदगी के दौरान स्वतंत्र गवाह भी मौजूद थे और पूरी कार्रवाई कानूनी प्रक्रिया के अनुसार की गई।
हालांकि अदालत ने यह भी नोट किया कि घटना जिस स्थान पर हुई, वहां CCTV कैमरे लगे थे और वह फुटेज पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकती थी।
हाईकोर्ट का फैसला
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि NDPS एक्ट के तहत अपराध बेहद गंभीर माने जाते हैं और इनमें कठोर सजा का प्रावधान है।
ऐसे मामलों में जांच एजेंसी पर यह जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है कि वह सभी प्रक्रियात्मक नियमों का सख्ती से पालन करे और सबसे विश्वसनीय साक्ष्य अदालत के सामने प्रस्तुत करे।
हाईकोर्ट ने कहा कि
आपराधिक कानून में “रूल ऑफ बेस्ट एविडेंस” एक मूलभूत सिद्धांत है। इसका अर्थ है कि यदि किसी तथ्य को साबित करने के लिए सबसे विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध है तो वही अदालत के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
यदि ऐसा साक्ष्य जानबूझकर प्रस्तुत नहीं किया जाता तो अदालत उसके बारे में प्रतिकूल अनुमान लगा सकती है।
CCTV फुटेज क्यों महत्वपूर्ण
हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में CCTV फुटेज अत्यंत महत्वपूर्ण थी क्योंकि उससे निम्न बातें स्पष्ट हो सकती थीं—जैसे वाहन टोल प्लाजा पर कब और कैसे पहुंचे, पुलिसकर्मी वहां कैसे पहुंचे, आरोपियों को किस परिस्थिति में रोका गया और तलाशी व बरामदगी की कार्रवाई कैसे हुई।
अदालत के अनुसार ऐसी फुटेज घटना का सबसे प्रत्यक्ष और निष्पक्ष साक्ष्य हो सकती थी।
इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य पर कोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि आधुनिक दौर में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य जैसे CCTV रिकॉर्डिंग आपराधिक मामलों में अत्यंत महत्वपूर्ण हो गए हैं।
गवाहों की गवाही कई बार स्मृति या धारणा के कारण प्रभावित हो सकती है, लेकिन CCTV रिकॉर्डिंग घटनाओं को वास्तविक रूप में रिकॉर्ड करती है।
इसलिए यदि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य उपलब्ध हो सकता है तो वह अक्सर मौखिक गवाही से अधिक विश्वसनीय माना जाता है।
जांच एजेंसी की जिम्मेदारी
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जांच एजेंसी का कर्तव्य केवल आरोप साबित करना नहीं है बल्कि न्यायालय के सामने सच्चाई प्रस्तुत करना है।
राज्य कोई सामान्य पक्षकार नहीं है बल्कि वह न्याय सुनिश्चित करने वाला संस्थान है। इसलिए जांच अधिकारी और अभियोजन पक्ष का दायित्व है कि वे सभी प्रासंगिक साक्ष्य अदालत के सामने रखें, चाहे वे उनके पक्ष में हों या खिलाफ।
धारा 114(g) का सिद्धांत
हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 के तहत अदालत यह अनुमान लगा सकती है कि यदि कोई पक्ष अपने नियंत्रण में मौजूद महत्वपूर्ण साक्ष्य प्रस्तुत नहीं करता तो वह साक्ष्य उसके खिलाफ हो सकता था।
इस मामले में भी अदालत ने कहा कि CCTV फुटेज का नष्ट होना और उसे प्रस्तुत न किया जाना जांच की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
हालांकि हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों पर अंतिम निर्णय देने से परहेज किया और कहा कि आपराधिक मुकदमे का अंतिम फैसला ट्रायल कोर्ट को करना है।
लेकिन अदालत ने यह स्पष्ट निर्देश दिया कि ट्रायल कोर्ट को इस तथ्य पर ध्यान देना होगा कि CCTV फुटेज समय रहते सुरक्षित नहीं की गई और अदालत के आदेश के बावजूद उसे प्रस्तुत नहीं किया गया।
इसलिए ट्रायल कोर्ट को साक्ष्य अधिनियम की धारा 114(g) के सिद्धांत को लागू करते हुए आवश्यक प्रतिकूल अनुमान लगाने का अधिकार होगा।
न्यायिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण संदेश
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि आपराधिक न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि जांच और अभियोजन की प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी हो।
यदि जांच एजेंसियां महत्वपूर्ण साक्ष्य को सुरक्षित रखने में विफल रहती हैं या उसे नष्ट होने देती हैं, तो इससे आरोपी के अधिकारों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
अदालत ने कहा कि न्यायालय ऐसी स्थिति को नजरअंदाज नहीं कर सकता जहां सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य गायब हो जाए।