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घायल को इलाज दिलाना पहली प्राथमिकता, FIR में देरी के आधार बनाकर मुआवजा रद्द नहीं किया जा सकता-राजस्थान हाईकोर्ट

Rajasthan High Court Dismisses Insurance Company Appeal, Upholds Compensation in Fatal Ambulance Accident Case

राजस्थान हाईकोर्ट ने बीमा कंपनी की अपील खारिज की, दुर्घटना मुआवजा बरकरार

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने मोटर दुर्घटना मामले में महत्वपूर्ण आदेश देते हुए स्पष्ट किया कि सड़क दुर्घटना के मामलों में एफआईआर दर्ज करने में हुई देरी को मात्र इसी आधार पर दावा खारिज करने का कारण नहीं माना जा सकता, यदि देरी का संतोषजनक कारण मौजूद हो।

हाईकोर्ट ने इस मामले में बीमा कंपनी की ओर से दायर अपील को खारिज करते हुए मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (एमएसीटी) द्वारा दिए गए मुआवजे को बरकरार रखा है।

जस्टिस संदीप तनेजा की एकलपीठ ने आईसीआईसीआई लोम्बार्ड जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड की ओर से दायर अपील को खारिज करते हुए यह आदेश दिया।

अपील मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण, अजमेर द्वारा 20 जनवरी 2016 को पारित उस निर्णय के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें मृतक के परिजनों को 9 लाख 18 हजार 800 रुपये का मुआवजा 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ देने का आदेश दिया गया था।

क्या था मामला

घटना के अनुसार 21 नवंबर 2012 की रात करीब 8:30 बजे रमेश्वर उर्फ रामनिवास अजमेर के जनाना अस्पताल से शहर की ओर एक मारुति वैन एम्बुलेंस में जा रहे थे।

उसी दौरान शास्त्री नगर चुंगी नाका के पास एम्बुलेंस और एक मोटरसाइकिल के बीच टक्कर हो गई। टक्कर के बाद एम्बुलेंस सड़क पर पलट गई, जिससे रमेश्वर की मौत हो गई।

मृतक की पत्नी, पुत्र और अन्य परिजनों ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण में मुआवजे की याचिका दायर की थी।

अधिकरण ने मामले की सुनवाई के बाद पीड़ित परिवार के पक्ष में फैसला देते हुए मुआवजा देने का आदेश दिया।

इसके खिलाफ बीमा कंपनी ने हाईकोर्ट में अपील दायर कर दी।

बीमा कंपनी के तर्क

बीमा कंपनी की ओर से अदालत में कहा गया कि दुर्घटना के बाद एफआईआर दर्ज करने में देरी हुई थी, जिससे घटना की सत्यता पर संदेह उत्पन्न होता है। इसके अलावा यह भी तर्क दिया गया कि जिस व्यक्ति को वाहन चालक बताया गया है, वह वास्तव में वाहन नहीं चला रहा था।

कंपनी की ओर से यह भी दावा किया गया कि मृतक वाहन में अनधिकृत यात्री (gratuitous passenger) के रूप में सफर कर रहा था, इसलिए बीमा कंपनी मुआवजा देने के लिए बाध्य नहीं है।

अपीलकर्ता बीमा कंपनी की ओर से कहा गया कि मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने मामले के तथ्यों और साक्ष्यों का सही मूल्यांकन किए बिना ही मुआवजा देने का आदेश पारित कर दिया।

कंपनी की ओर से यह भी कहा गया कि जिस व्यक्ति ज्ञानसिंह को दुर्घटना के समय वाहन चालक बताया गया है, वह वास्तव में वाहन नहीं चला रहा था। इस तर्क के समर्थन में कंपनी ने एक समाचार पत्र की कटिंग का हवाला दिया, जिसमें चालक का नाम स्पष्ट रूप से उल्लेखित नहीं था।

अपीलकर्ता का कहना था कि इस स्थिति में यह संभावना भी हो सकती है कि दुर्घटना के समय वाहन मृतक स्वयं चला रहा हो और बाद में किसी अन्य व्यक्ति को चालक दिखाया गया हो। इसलिए अधिकरण द्वारा चालक की पहचान को सही मान लेना उचित नहीं था।

प्रतिवादी दावेदारों का पक्ष

मृतक के परिजनों की ओर से पेश अधिवक्ता ने बीमा कंपनी की सभी दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि दुर्घटना 21 नवंबर 2012 की रात लगभग 8:30 बजे हुई थी और एफआईआर अगले दिन सुबह दर्ज कराई गई।

उन्होंने अदालत को बताया कि दुर्घटना के तुरंत बाद घायल व्यक्तियों को अस्पताल पहुंचाना प्राथमिकता थी, इसलिए एफआईआर दर्ज कराने में कुछ समय लगना स्वाभाविक है।

प्रतिवादी के वकील ने यह भी कहा कि पुलिस जांच के दौरान स्पष्ट रूप से पाया गया कि दुर्घटना के समय वाहन ज्ञानसिंह ही चला रहा था। जांच एजेंसी द्वारा दाखिल चार्जशीट और अन्य रिकॉर्ड में भी यही तथ्य सामने आया है।

अधिवक्ता ने कहा कि बीमा कंपनी द्वारा प्रस्तुत समाचार पत्र की कटिंग कोई ठोस साक्ष्य नहीं है और इससे चालक की पहचान पर संदेह नहीं किया जा सकता।

प्रतिवादी पक्ष ने यह भी बताया कि दुर्घटना के समय मृतक वाहन में अधिकृत रूप से मौजूद था और बीमा पॉलिसी एक कॉम्प्रिहेंसिव पैकेज पॉलिसी थी, जिसमें वाहन में बैठे यात्रियों को भी बीमा कवर प्राप्त था। इसलिए बीमा कंपनी मुआवजा देने से बच नहीं सकती।

हाईकोर्ट ने तर्कों को किया खारिज

हाईकोर्ट ने बीमा कंपनी के इन सभी तर्कों को अस्वीकार कर दिया। अदालत ने कहा कि दुर्घटना के बाद प्राथमिकता घायल व्यक्तियों को तुरंत अस्पताल पहुंचाने और उपचार दिलाने की होती है। ऐसी स्थिति में यदि एफआईआर दर्ज कराने में कुछ समय लग जाता है तो इसे दावा खारिज करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के रवि बनाम बद्रीनारायण (2011) फैसले का हवाला देते हुए कहा कि भारतीय परिस्थितियों में यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि दुर्घटना के तुरंत बाद परिजन पहले पुलिस थाने जाकर रिपोर्ट दर्ज कराएं। स्वाभाविक रूप से परिवार के लोग घायल को अस्पताल पहुंचाने और उसकी जान बचाने को प्राथमिकता देते हैं।

बीमा पॉलिसी के तहत कवर था यात्री

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि मृतक को अनधिकृत यात्री नहीं कहा जा सकता। रिकॉर्ड में उपलब्ध बीमा पॉलिसी एक कॉम्प्रिहेंसिव पैकेज पॉलिसी थी, जिसमें वाहन में बैठे यात्रियों को भी कवर किया गया था। इसलिए दावा अधिकरण द्वारा मुआवजा देने का आदेश उचित और वैध है।

अपील खारिज

सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण द्वारा पारित आदेश में कोई त्रुटि नहीं है। इसलिए बीमा कंपनी की अपील में कोई दम नहीं है और इसे खारिज किया जाता है।

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