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ट्रैप मामलों में बड़ा फैसला: इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की हैश वैल्यू और क्लोन कॉपी देना अनिवार्य -राजस्थान हाईकोर्ट

Rajasthan High Court: Hash Value and Clone Copy of Electronic Evidence Mandatory in Trap Cases

सिर्फ सीडी देना पर्याप्त नहीं, मूल डिजिटल रिकॉर्डिंग की प्रमाणित क्लोन कॉपी और हैश वैल्यू आरोपी को देनी होगी; निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

जोधपुर। भ्रष्टाचार और ट्रैप मामलों में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के उपयोग को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि अभियोजन पक्ष किसी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्डिंग—जैसे ऑडियो या वीडियो—पर भरोसा करता है तो उसकी प्रमाणित क्लोन कॉपी और हैश वैल्यू आरोपी को उपलब्ध कराना अनिवार्य है।

कोर्ट ने कहा कि केवल एक सामान्य सीडी देकर अभियोजन अपने दायित्व से मुक्त नहीं हो सकता।

जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू की एकलपीठ ने किशन अग्रवाल की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया हैं.

हाईकोर्ट ने इसके साथ ही चित्तौड़गढ़ की विशेष अदालत (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम) द्वारा पारित उस आदेश को आंशिक रूप से निरस्त कर दिया, जिसमें आरोपी को इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की क्लोन कॉपी और हैश वैल्यू देने से इनकार कर दिया गया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की प्रामाणिकता और अखंडता की जांच के लिए हैश वैल्यू अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि इसके बिना यह सुनिश्चित नहीं किया जा सकता कि रिकॉर्डिंग में किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं हुई है।

ट्रैप केस की रिकॉर्डिंग बनी विवाद की वजह

मामला भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दर्ज एक ट्रैप प्रकरण से जुड़ा है।

अभियोजन का दावा था कि रिश्वत की मांग से संबंधित बातचीत डिजिटल वॉयस रिकॉर्डर में रिकॉर्ड की गई थी और उसी रिकॉर्डिंग के आधार पर आरोपी के खिलाफ कार्रवाई की गई।

लेकिन आरोपी पक्ष का कहना था कि जांच एजेंसी ने जो सीडी उपलब्ध कराई है वह मूल रिकॉर्डिंग की प्रमाणित क्लोन कॉपी नहीं है और उसमें हैश वैल्यू भी नहीं दी गई है।

इसके अलावा वह डिजिटल वॉयस रिकॉर्डर भी अदालत के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया जिसमें कथित बातचीत रिकॉर्ड हुई थी।

याचिकाकर्ता का आरोप था कि उसे केवल एक डब की हुई सीडी और उसका ट्रांसक्रिप्ट दिया गया है, जिसकी प्रामाणिकता की जांच करना संभव नहीं है। ऐसे में आरोपी के लिए यह जानना मुश्किल हो जाता है कि रिकॉर्डिंग वास्तविक है या उसमें किसी प्रकार का संपादन या छेड़छाड़ की गई है।

ट्रायल कोर्ट ने खारिज कर दिया था आवेदन

इस स्थिति में आरोपी किशन अग्रवाल ने ट्रायल कोर्ट में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 91, 207 और 173(5) के तहत आवेदन प्रस्तुत किया था। इसमें मूल रिकॉर्डिंग डिवाइस, डिजिटल रिकॉर्डिंग की क्लोन कॉपी तथा उसकी हैश वैल्यू उपलब्ध कराने की मांग की गई थी।

लेकिन चित्तौड़गढ़ स्थित विशेष न्यायालय (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम) ने 1 सितंबर 2025 को यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि अभियोजन द्वारा आवश्यक दस्तावेज पहले ही उपलब्ध कराए जा चुके हैं और इस स्तर पर अतिरिक्त सामग्री देने की आवश्यकता नहीं है।

ट्रायल कोर्ट के इस आदेश को चुनौती देते हुए आरोपी ने राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ में याचिका दाखिल की।

हाईकोर्ट में आरोपी की दलील

याचिकाकर्ता किशन अग्रवाल की ओर से अधिवक्ता प्रीति शर्मा ने अदालत को बताया कि अभियोजन ने तीन अलग-अलग बातचीत रिकॉर्ड होने का दावा किया है, लेकिन न तो डिजिटल वॉयस रिकॉर्डर को रिकॉर्ड के साथ पेश किया और न ही उसकी प्रमाणित क्लोन कॉपी उपलब्ध कराई गई।

उन्होंने कहा कि जो सीडी दी गई है वह केवल एक डब्ड कॉपी है, जिसकी फोरेंसिक जांच संभव नहीं है।

यदि क्लोन कॉपी के साथ हैश वैल्यू दी जाए तो ही यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि रिकॉर्डिंग में किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं हुई है।

अधिवक्ता ने यह भी तर्क दिया कि बिना सत्यापित इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के आधार पर आरोपी के खिलाफ मुकदमा चलाना न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि P. Gopalkrishnan @ Dileep बनाम State of Kerala (2020) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इलेक्ट्रॉनिक स्टोरेज डिवाइस में मौजूद सामग्री भी “दस्तावेज” की श्रेणी में आती है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि यदि अभियोजन इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड पर भरोसा करता है तो आरोपी को उसकी क्लोन कॉपी उपलब्ध कराना उसके निष्पक्ष बचाव के अधिकार का हिस्सा है।

इसी प्रकार Sidhartha Vashisht @ Manu Sharma बनाम State (NCT of Delhi) और V.K. Sasikala बनाम State के मामलों में भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि निष्पक्ष सुनवाई संविधान के अनुच्छेद 21 का अभिन्न हिस्सा है और आरोपी को जांच में एकत्रित सामग्री तक पहुंच मिलनी चाहिए।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड सामान्य दस्तावेजों से अलग होते हैं, क्योंकि उनकी सत्यता और अखंडता की जांच के लिए विशेष फोरेंसिक मानकों की आवश्यकता होती है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि हैश वैल्यू के बिना इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की विश्वसनीयता पर संदेह बना रहता है। यदि आरोपी को क्लोन कॉपी और हैश वैल्यू नहीं दी जाती तो वह यह साबित ही नहीं कर सकता कि रिकॉर्डिंग में छेड़छाड़ हुई है या नहीं।

कोर्ट ने यह भी कहा कि अधूरी या अप्रमाणित कॉपी उपलब्ध कराने से आरोपी के बचाव का संवैधानिक अधिकार प्रभावित होता है और यह निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया के विपरीत है।

ट्रायल कोर्ट को दिए गए निर्देश

सभी पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को आंशिक रूप से निरस्त कर दिया।

अदालत ने निर्देश दिया कि आरोपी को मूल डिजिटल रिकॉर्डिंग की प्रमाणित क्लोन कॉपी और उसकी हैश वैल्यू उपलब्ध कराई जाए, ताकि वह प्रभावी ढंग से अपना बचाव प्रस्तुत कर सके।

हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मूल रिकॉर्डिंग डिवाइस को मंगाने या अन्य दस्तावेजों से संबंधित प्रश्नों पर फैसला ट्रायल के दौरान किया जाएगा।

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