आंतरिक जांच में दिए गए बयानों को बताया ‘सद्भावना में किया गया कृत्य’, जज के खिलाफ बयान देने के मामले में भीलवाड़ा के पुलिसकर्मियों को राहत
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने जजों के खिलाफ की जाने वाली टिप्पणी और बयानों को अदालत की अवमानना मानी जाए या नहीं, के कानूनी बिंदु पर ऐतिहासिक फैसला दिया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा है कि जज के खिलाफ जांच के दौरान दिया गया बयान अपने आप में अदालत की अवमानना नहीं होता।
राजस्थान हाईकोर्ट ने इसे अधिक स्पष्ट करते हुए कहा है कि आधिकारिक जांच के दौरान, सद्भावना में दिए गए बयान—भले ही वे किसी न्यायिक अधिकारी के व्यवहार से संबंधित हों—उन्हें तब तक अवमानना नहीं माना जा सकता, जब तक वे न्यायपालिका की संस्था को नुकसान न पहुंचाएं या न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप न करें।
हाईकोर्ट ने अवमानना कानून को भी स्पष्ट करते हुए कहा कि अवमानना कानून का उद्देश्य किसी व्यक्तिगत न्यायिक अधिकारी (individual judge) की प्रतिष्ठा की रक्षा करना नहीं, बल्कि न्यायपालिका की संस्था (institution of judiciary) की गरिमा को बनाए रखना है।
यदि किसी न्यायिक अधिकारी के आचरण के संबंध में शिकायत की जाती है, और वह शिकायत उचित मंच पर एवं सद्भावना (good faith) में की गई है, तो उसे अवमानना की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
जस्टिस फरजंद अली और जस्टिस योगेन्द्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने भीलवाड़ा के जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा मजिस्ट्रेट कोर्ट के प्रेसाइडिंग ऑफिसर की ओर से दी गई शिकायत के आधार पर दर्ज की गई अवमानना याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला दिया है।
हाईकोर्ट ने भीलवाड़ा के तत्कालीन एएसपी दिलीप कुमार सैनी, मांडलगढ़ एसएचओ भूराराम खिलेरी सहित 7 पुलिसकर्मियों को अदालत की अवमानना की कार्यवाही से राहत देते हुए अवमानना से मुक्त कर दिया है।
न्यायिक संयम की आवश्यकता
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में बेहद अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि
“Contempt law का इस्तेमाल किसी जज की व्यक्तिगत छवि बचाने के लिए नहीं किया जा सकता।”
“जज एक व्यक्ति हैं, जबकि कोर्ट एक संस्था है—दोनों में अंतर समझना जरूरी है।”
हाईकोर्ट ने कहा कि
अगर हर आलोचना को अवमानना मान लिया जाए, तो लोग अपनी सही शिकायत भी नहीं रख पाएंगे। इससे न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही पर असर पड़ेगा।
कोर्ट ने कहा कि
अवमानना की शक्ति एक असाधारण शक्ति है, जिसका प्रयोग अत्यंत सावधानी एवं संयम के साथ किया जाना चाहिए। प्रत्येक आलोचना या असहमति को अवमानना मान लेना न्यायसंगत नहीं है, क्योंकि इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है और लोग वास्तविक शिकायतें रखने से हिचकिचाने लगेंगे।
मामले की शुरुआत कैसे हुई..
मामले की शुरुआत भीलवाड़ा के एक आपराधिक मामले से हुई, जहां एक महिला ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए।
पीड़िता का कहना था कि उसके साथ गंभीर अपराध हुआ, लेकिन पुलिस ने उसकी शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया।
मामला जब अदालत पहुंचा, तो मजिस्ट्रेट ने FIR दर्ज करने और जांच के आदेश दिए। लेकिन यहीं से कहानी में नया मोड़ आया।
जांच के दौरान अदालत को लगा कि पुलिस ठीक से काम नहीं कर रही है। इसके बाद सीनियर अधिकारी—Additional SP को जांच की जिम्मेदारी दी गई।
जज के खिलाफ दिए बयान
कोर्ट के आदेश पर जब Additional SP ने जांच शुरू की, तो पुलिस अधिकारियों के बयान दर्ज किए गए। इन बयानों में पुलिसकर्मियों ने मामले की सुनवाई कर रहे जज के खिलाफ बयान दिए।
बयानों में पुलिस अधिकारियों ने कहा कि अदालत में उनके साथ सख्त और अपमानजनक व्यवहार हुआ, उन्हें अनावश्यक रूप से डांटा गया और जज का रवैया सहयोगात्मक नहीं था।
यही बयान पूरे विवाद की जड़ बन गए।
अवमानना का मामला कैसे बना?
जैसे ही ये बातें सामने आईं, संबंधित जज ने इसे अपनी गरिमा और न्यायपालिका की प्रतिष्ठा पर हमला माना। इसके बाद हाईकोर्ट में Contempt of Court यानी अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग की गई।
याचिकाकर्ता का पक्ष
याचिकाकर्ता, जो कि संबंधित न्यायिक अधिकारी (Presiding Officer) थे, ने हाईकोर्ट के समक्ष यह दावा किया कि प्रतिवादी पुलिस अधिकारियों का आचरण स्पष्ट रूप से अदालत की अवमानना (Criminal Contempt) के दायरे में आता है।
न्यायिक अधिकारी की शिकायत में कहा गया कि पुलिस अधिकारियों ने उनके खिलाफ असत्य, निराधार और अपमानजनक आरोप लगाए। इन आरोपों में उनके न्यायिक व्यवहार को गलत तरीके से पेश किया गया, जिससे उनकी व्यक्तिगत और पेशेवर प्रतिष्ठा को गंभीर नुकसान पहुंचा।
शिकायत में कहा गया कि यह कृत्य न केवल व्यक्ति विशेष को, बल्कि पूरी न्यायपालिका की छवि को धूमिल करता है।
यह भी कहा गया कि जब एक न्यायिक अधिकारी के खिलाफ इस तरह के आरोप लगाए जाते हैं, तो आम जनता के बीच न्यायालय की विश्वसनीयता कमजोर होती है।
अधिकारी ने कहा कि इसलिए यह केवल व्यक्तिगत मामला नहीं, बल्कि “institution of judiciary” पर हमला है।
शिकायत में यह भी कहा गया कि Contempt of Courts Act, 1971 के तहत ऐसा कोई भी कृत्य जो न्यायालय की गरिमा को ठेस पहुंचाए, उसे criminal contempt माना जाता है।
शिकायत में कहा गया कि पुलिस अधिकारियों के बयान इसी श्रेणी में आते हैं, क्योंकि उन्होंने न्यायिक अधिकारी के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए, जो न्यायिक प्रणाली के प्रति अविश्वास पैदा करते हैं।
शिकायत का मुख्य बिंदु यह था कि भले ही बयान आंतरिक जांच में दिए गए हों, लेकिन उनका प्रभाव व्यापक हो सकता है और ऐसे बयान न्यायिक अधिकारियों के प्रति सम्मान कम कर सकते हैं, जो न्यायिक कार्य में बाधा डाल सकते हैं।
पुलिस अधिकारियों का जवाब
प्रतिवादी पुलिस अधिकारियों ने याचिका का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि उनके खिलाफ लगाया गया अवमानना का आरोप पूरी तरह से निराधार और कानून के विपरीत है।
पुलिस अधिकारियों का मुख्य जवाब यही था कि उन्होंने जो भी बयान दिए, वे Additional SP द्वारा की जा रही आधिकारिक जांच के दौरान दिए गए, इसलिए वे duty-bound statements थे, न कि कोई सार्वजनिक या दुर्भावनापूर्ण टिप्पणी।
बचाव में दलील दी गई कि उन्होंने जो भी कहा, वह सच्चाई और अपने अनुभव के आधार पर कहा और पूरी तरह good faith में कहा।
दलील दी गई कि Contempt of Courts Act की Section 6 के तहत ऐसी शिकायतों को कानूनी संरक्षण प्राप्त है।
पुलिस अधिकारियों की ओर से दलील दी गई कि उनके बयान कभी भी सार्वजनिक (public domain) में नहीं लाए गए, वे केवल जांच का हिस्सा थे।
इसलिए आम जनता पर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ा और न्यायालय की छवि को कोई वास्तविक नुकसान नहीं हुआ और न ही कोर्ट की प्रक्रिया में कोई बाधा उत्पन्न हुई।
अधिवक्ता ने यह भी दलील दी कि उनके बयान किसी “जज” के व्यवहार से संबंधित थे, न कि “कोर्ट” या न्यायपालिका की संस्था से, इसलिए इसे अवमानना नहीं माना जा सकता।
अधिवक्ता ने कहा कि पहले Registrar Vigilance जैसे उचित मंच पर शिकायत की गई थी, जो यह दर्शाता है कि उनका उद्देश्य बदनाम करना नहीं, बल्कि उचित प्रक्रिया के तहत अपनी शिकायत रखना था, जो कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के तहत आता है।
हाईकोर्ट का फैसला
कोर्ट ने स्पष्ट कहा:
“यदि कोई व्यक्ति आधिकारिक जांच के दौरान अपने अनुभव और तथ्य प्रस्तुत करता है, तो उसे अवमानना नहीं माना जा सकता।”
कोर्ट ने दो टूक कहा:
“Contempt law का उद्देश्य किसी जज की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की रक्षा करना नहीं, बल्कि न्यायपालिका की संस्था की गरिमा को बनाए रखना है।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि
किसी जज के व्यवहार की आलोचना करना, पूरे न्यायालय का अपमान नहीं है।
कोर्ट ने कहा
यदि शिकायत सद्भावना (good faith) में और सही मंच पर की गई है, तो उसे कानून संरक्षण देता है।
कोर्ट ने कहा:
“लोकतंत्र में न्यायपालिका भी आलोचना से परे नहीं है। उचित और ईमानदार आलोचना को दबाना न्यायसंगत नहीं होगा।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि contempt तभी बनता है, जब न्यायालय की गरिमा को वास्तविक नुकसान पहुंचे, न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो या न्याय प्रशासन बाधित हो।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में Brahma Prakash Sharma केस – व्यक्तिगत आरोप ≠ अवमानना, P.N. Duda केस – निष्पक्ष आलोचना स्वीकार्य, Mulgaokar केस – न्यायपालिका को सहनशील होना चाहिए और Bal Thackrey केस – अवमानना के लिए स्पष्ट इरादा जरूरी का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि अवमानना कब होगी।
अंतिम फैसला
सभी तथ्यों और तर्कों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस अधिकारियों के बयान आंतरिक जांच का हिस्सा थे, जो सद्भावना में दिए गए थे और सार्वजनिक नहीं थे।
हाईकोर्ट ने इस मामले में न्यायिक अधिकारी की शिकायत के आधार पर दर्ज की गई अवमानना याचिका को खारिज करने का आदेश दिया।