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शरीर पर चोट या वीर्य के निशान न मिलना, रेप को झूठा साबित नहीं करता, विमंदित महिला से दुष्कर्म के आरोपी की उम्रकैद बरकरार-राजस्थान हाईकोर्ट

Rajasthan High Court Upholds Life Imprisonment in Rape Case Despite Lack of Medical Evidence

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्य पीठ ने एक बेहद गंभीर आपराधिक मामले में बड़ा और सख्त फैसला सुनाते हुए रेप के आरोपी मसरा राम उर्फ मस्रू की प्राकृतिक जीवन तक उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने मामले में मेडिकल सबूतों के अभाव के बावजूद स्पष्ट कहा कि पीड़िता की गवाही भरोसेमंद है और पूरे मामले में अभियोजन पक्ष ने आरोपों को संदेह से परे साबित किया है।

जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्रशेखर शर्मा की खंडपीठ ने आरोपी मसाराम की ओर से दायर आपराधिक अपील को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया है।

क्या है पूरा मामला?

जालोर जिले के रानीवाड़ा थाना क्षेत्र में 19 मई 2022 को एक मानसिक रूप से कमजोर (इंटेलेक्चुअल डिसएबिलिटी) से पीड़ित महिला के साथ दुष्कर्म का आरोप सामने आया।

पीड़िता के भाई ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराते हुए बताया कि उसकी बहन शाम के समय शौच के लिए गई थी, तभी आरोपी उसे जबरन पकड़कर नाले (नदी) के पास ले गया और उसके साथ दुष्कर्म किया।

पीड़िता के भतीजे ने मौके पर आरोपी को आपत्तिजनक स्थिति में देखा और शोर मचाया, जिसके बाद आरोपी मौके से फरार हो गया और जान से मारने की धमकी भी दी।

ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी उम्रकैद

इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (रेप) और एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(2)(v) के तहत दोषी मानते हुए जीवनपर्यंत कारावास (आजीवन कारावास) की सजा सुनाई थी।

इसके खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।

बचाव पक्ष की दलीलें

आरोपी मसरा राम उर्फ मस्रू की ओर से ट्रायल कोर्ट के फैसले को पूरी तरह गलत और कानून के विपरीत बताते हुए उसे निरस्त करने की मांग की।

आरोपी पक्ष ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही तरीके से मूल्यांकन नहीं किया और केवल संदेह के आधार पर आरोपी को दोषी ठहरा दिया।

सबसे प्रमुख तर्क यह दिया गया कि पूरा मामला केवल पीड़िता और उसके परिवार के सदस्यों की गवाही पर आधारित है, जो आपस में रिश्तेदार हैं और इसलिए “इंटरेस्टेड विटनेस” हैं। ऐसे गवाहों पर बिना स्वतंत्र पुष्टि के भरोसा नहीं किया जा सकता।

आरोपी पक्ष ने यह भी कहा कि कथित घटना स्थल स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं किया गया। पीड़िता यह नहीं बता पाई कि वह स्थान कितना दूर था, वहां तक जाने का रास्ता कैसा था या घटनास्थल की भौगोलिक स्थिति क्या थी। इससे पूरी कहानी संदिग्ध प्रतीत होती है।

मेडिकल और फॉरेंसिक साक्ष्यों को लेकर सवाल खड़े करते हुए कहा गया कि पीड़िता के शरीर पर किसी प्रकार की चोट नहीं पाई गई और न ही कपड़ों पर संघर्ष या जबरदस्ती के कोई निशान मिले।

अधिवक्ता ने कहा कि एफएसएल और डीएनए रिपोर्ट में वीर्य या यौन संबंध के कोई प्रमाण नहीं मिले।

इस आधार पर आरोपी ने कहा कि जब वैज्ञानिक साक्ष्य ही आरोपों की पुष्टि नहीं करते, तो केवल मौखिक बयान के आधार पर सजा देना उचित नहीं है।

आरोपी पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि FIR दर्ज करने में देरी हुई, जो संदेह पैदा करती है।

साथ ही बचाव पक्ष ने कहा कि पीड़िता और आरोपी एक-दूसरे को पहले से जानते थे और पीड़िता पहले आरोपी के घर भी जा चुकी थी। इससे किसी पूर्व दुश्मनी या अचानक अपराध की संभावना संदिग्ध हो जाती है।

पीड़िता की मानसिक स्थिति को लेकर भी सवाल उठाते हुए कहा गया कि उसका विकलांगता प्रमाणपत्र बाद में तैयार किया गया और यह साबित नहीं किया गया कि वह पहले से मानसिक रूप से कमजोर थी।

राज्य सरकार की दलीलें

राज्य सरकार की ओर से लोक अभियोजक ने आरोपी की सभी दलीलों का कड़ा विरोध करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को पूरी तरह सही और न्यायसंगत बताया।

अभियोजन पक्ष ने कहा कि पीड़िता की गवाही इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है और वह पूरी तरह स्पष्ट, सुसंगत और विश्वसनीय है। कानून के अनुसार, यदि पीड़िता की गवाही भरोसेमंद हो, तो उसी के आधार पर भी दोषसिद्धि की जा सकती है।

राज्य पक्ष ने यह भी बताया कि पीड़िता के भतीजे ने घटना को अपनी आंखों से देखा और उसकी गवाही ने पूरे घटनाक्रम की पुष्टि की।

अभियोजन ने यह स्पष्ट किया कि केवल इसलिए कि गवाह रिश्तेदार हैं, उनकी गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता, यदि वह विश्वसनीय और सुसंगत हो।

मेडिकल साक्ष्य को लेकर राज्य पक्ष ने कहा कि रेप के मामलों में चोट या वीर्य का न मिलना सामान्य है और सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में यह स्पष्ट किया गया है कि केवल मेडिकल सबूत के अभाव में आरोप झूठे नहीं हो जाते।

पीड़िता की मानसिक स्थिति पर अभियोजन ने कहा कि मेडिकल जांच में यह साबित हुआ कि वह 41% बौद्धिक विकलांगता से पीड़ित थी। ऐसे में उसकी सहमति का कोई महत्व नहीं रह जाता।

अभियोजन पक्ष ने यह भी कहा कि FIR में हुई थोड़ी देरी को परिस्थितियों के अनुसार पूरी तरह उचित ठहराया गया है, क्योंकि घटना शाम को हुई थी और आरोपी ने धमकी भी दी थी।

इसके अलावा, अभियोजन ने एससी/एसटी एक्ट के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि आरोपी और पीड़िता एक ही गांव के रहने वाले थे, इसलिए आरोपी को पीड़िता की जाति की जानकारी थी और यह मान लिया जाता है कि अपराध इसी ज्ञान के साथ किया गया।

हाईकोर्ट का फैसला

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि पीड़िता की गवाही स्पष्ट, सुसंगत और भरोसेमंद है। कानून के अनुसार, यदि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय है, तो केवल उसी के आधार पर भी सजा दी जा सकती है।

कोर्ट ने कहा कि मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार, पीड़िता 41% बौद्धिक विकलांगता से पीड़ित थी। कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में “सहमति” का सवाल ही नहीं उठता।

कोर्ट ने साफ कहा कि शरीर पर चोट या वीर्य के निशान न मिलना, रेप को झूठा साबित नहीं करता। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि विश्वसनीय गवाही सबसे अहम है।

कोर्ट ने पाया कि आरोपी और पीड़िता एक ही गांव के रहने वाले थे और आरोपी को पीड़िता की जाति की जानकारी थी।

ऐसे में एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(2)(v) लागू होती है, जिसमें यह मान लिया जाता है कि आरोपी को पीड़ित की जाति का ज्ञान था।

अंतिम फैसला

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले पर मुहर लगाते हुए कहा कि आरोपी की सजा में कोई कमी नहीं की जा सकती।

हाईकोर्ट ने विमंदित महिला के साथ दुष्कर्म के आरोपी अपीलकर्ता की अपील को खारिज करते हुए उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है।

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