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सिविल विवाद लंबित होने पर धारा 145-146 CrPC की कार्यवाही अनुचित, एसडीएम का आदेश रद्द

Rajasthan High Court Rules Parallel Criminal Proceedings Invalid When Civil Dispute Is Pending

हाईकोर्ट ने कहा-बिना ठोस आधार के संपत्ति कुर्की और रिसीवर नियुक्ति नहीं, सिविल कोर्ट के रहते समानांतर आपराधिक कार्यवाही का कोई औचित्य नहीं

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि जब किसी संपत्ति विवाद से संबंधित मामला पहले से ही सिविल कोर्ट में लंबित हो, तो उसी विषय पर दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 145 और 146 के तहत समानांतर आपराधिक कार्यवाही करना न केवल अनुचित है, बल्कि कानून के सिद्धांतों के विपरीत भी है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि बिना ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों के केवल आशंका के आधार पर शांति भंग का मामला बनाकर संपत्ति को कुर्क करना या रिसीवर नियुक्त करना न्यायोचित नहीं माना जा सकता।

जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ ने यह रिपोर्टेबल जजमेंट राजपाल सिंह की ओर से दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए दिया है।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में एसडीएम का आदेश रद्द करते हुए निचली अदालत के आदेश को सही ठहराया है।

क्या था पूरा मामला?

याचिकाकर्ता राजपाल सिंह ने दावा किया कि वह नागौर जिले के बेसरौली गांव स्थित कृषि भूमि (खसरा नंबर 81 और 81/1) का सह-स्वामी है और लंबे समय से उस पर खेती कर रहा है।

उसने आरोप लगाया कि उसके पिता पन्नाराम ने कथित रूप से अन्य प्रतिवादियों के पक्ष में गिफ्ट डीड कर दी, जिससे उसे उसके वैधानिक हिस्से से वंचित किया जा रहा है।

याचिकाकर्ता का यह भी आरोप था कि प्रतिवादी उसे जबरन बेदखल करने, फसल को नुकसान पहुंचाने और शांति भंग की स्थिति पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।

इसी आधार पर उसने एसडीएम मकराना के समक्ष कार्यवाही शुरू करवाई।

पुलिस रिपोर्ट के आधार पर एसडीएम ने 4 सितंबर 2024 को विवादित संपत्ति को कुर्क करने और रिसीवर नियुक्त करने का आदेश पारित किया।

हालांकि, इस आदेश को बाद में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, मकराना ने 18 नवंबर 2024 को निरस्त कर दिया। इसी आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया।

हाईकोर्ट का फैसला

हाईकोर्ट ने पूरे मामले का गहन विश्लेषण करते हुए कई महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्थापित किए। कोर्ट ने कहा कि जब किसी संपत्ति के स्वामित्व और कब्जे का विवाद सिविल कोर्ट में पहले से विचाराधीन हो, तो उसी विषय पर धारा 145 और 146 CrPC के तहत कार्यवाही करना न्यायसंगत नहीं है। यह केवल न्यायालयों के समय और संसाधनों की अनावश्यक बर्बादी है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल सामान्य या अस्पष्ट आरोपों के आधार पर यह मान लेना कि शांति भंग होगी, पर्याप्त नहीं है। इसके लिए ठोस, विश्वसनीय और तात्कालिक खतरे को दर्शाने वाले साक्ष्य होना आवश्यक है।

कोर्ट ने कहा कि कार्यपालक मजिस्ट्रेट का कार्य केवल यह तय करना है कि विवादित संपत्ति पर किसका वास्तविक कब्जा है। वह किसी भी पक्ष के स्वामित्व या अधिकार का अंतिम निर्णय नहीं दे सकता। यह अधिकार केवल सिविल कोर्ट के पास है।

हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 146 CrPC के तहत संपत्ति को कुर्क करना और रिसीवर नियुक्त करना केवल अत्यंत आपातकालीन परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए, जब स्पष्ट रूप से शांति भंग का खतरा हो।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले Ram Sumer Puri Mahant बनाम State of U.P. (1985) का उल्लेख करते हुए कहा कि जब सिविल कोर्ट में मामला लंबित हो, तो समानांतर आपराधिक कार्यवाही करना उचित नहीं है।

सिविल कोर्ट का निर्णय अंतिम रूप से बाध्यकारी होता है और उसी के आधार पर अधिकार तय किए जाते हैं।

इसके अलावा, अन्य मामलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि कानून का उद्देश्य अनावश्यक मुकदमों की पुनरावृत्ति से बचना है।

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश

सभी पक्षों की बहस सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि एसडीएम द्वारा पारित आदेश में आवश्यक कानूनी मानकों का पालन नहीं किया गया था, शांति भंग की आशंका को साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं थे, और मामला पहले से ही सिविल कोर्ट में लंबित था।

इन आधारों पर कोर्ट ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के आदेश को सही ठहराते हुए एसडीएम का आदेश रद्द कर दिया और याचिका खारिज कर दी।

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