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जन्मदिन विशेष: सख्त फैसलों, निष्पक्ष सोच और न्याय के प्रति अडिग संकल्प ने दिलाई अलग पहचान-जस्टिस विजय बिश्नोई

Special Lecture in Memory of Late Kishan Singh Arya to Be Held on November 9 in Sikar

नई दिल्ली/जोधपुर। देश की न्यायपालिका में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो केवल पद के कारण नहीं, बल्कि अपने कार्य और दृष्टिकोण से विशिष्ट पहचान बनाते हैं।

तपते रेगिस्तान में खेजड़ी के वृक्षों की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वाली परंपरा से प्रेरित न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई आज न्याय के उस “हरे-भरे वृक्ष” के सशक्त संरक्षक के रूप में खड़े हैं, जो अन्याय की आंधियों में भी अडिग रहता है—और यही संकल्प उन्हें न्यायपालिका में एक असाधारण और अत्यंत सम्मानित स्थान दिलाता है।

जस्टिस विजय बिश्नोई उन्हीं व्यक्तित्वों में से एक हैं, जिन्होंने अपने तीन दशक से अधिक लंबे कानूनी करियर में न्याय, पारदर्शिता और संवैधानिक मूल्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।

30 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में शपथ लेने के साथ ही उनका यह सफर भारतीय न्यायिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय बन गया।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

जस्टिस विजय बिश्नोई का जन्म 26 मार्च 1964 को जोधपुर, राजस्थान में हुआ।

जस्टिस​ विजय बिश्नोई का परिवार कृषि और खेती से जुड़ा रहा है उनके पिता ने किसानी से आगे बढकर एडवोकेट बनने वाले पहली पीढी रहे. एडवोकेट रामनारायण बिश्नोई का नाम राजस्थान के अधिवक्ता समुदाय में बेहद सम्मान के साथ लिया जाता हैं.

उनके पिता एडवोकेट रामनारायण राजस्थान की राजनीति में भी बेहद कर्तव्यनिष्ठ राजनेताओं में गिने जाते रहे है जो राजस्थान में पर्यावरण और रेगिस्तानी इलाके के विकास में किए गए कार्यो के लिए याद किए जाते हैं.

उनके पिता अधिवक्ता होने के साथ साथ जोधपुर के पास फलौदी से विधायक रहने के साथ ही मंत्री और विधानसभा के उपाध्यक्ष भी रह चुके है तो वही माता गृहिणी रही हैं.

किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले जस्टिस विजय बिश्नोई के फैसलो में इसका असर साफ नजर आता हैं जब वे किसानों के हितो के लिए खड़े नजर आते हैं.

जस्टिस विजय बिश्नोई ने नवंबर 2025 में राजस्थान के सीकर जिले में आयोजित एक किसान सम्मेलन को संबोधित करते हुए किसानों के लिए किसान न्याय केन्द्र की वकालत कर चुके हैं.

जोधपुर विश्वविद्यालय से लॉ ग्रेज्यूएट

जस्टिस विजय बिश्नोई ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा राजस्थान के जोधपुर से ही हासिल की.

जोधपुर में ही प्राथमिक शिक्षा के बाद के बाद जोधपुर विश्वविद्यालय से एलएलबी की डिग्री प्राप्त की, जिसने उनके जीवन की दिशा तय कर दी।

पिता से मिली विरासत से उन्हे कानून के क्षेत्र में उनकी रुचि और प्रतिबद्धता ने उन्हें जल्दी ही एक मजबूत कानूनी पेशेवर के रूप में स्थापित कर दिया।

वकालत का सफर

8 जुलाई 1989 को अधिवक्ता के रूप में नामांकन के बाद उन्होंने राजस्थान हाईकोर्ट और केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण, जोधपुर में प्रैक्टिस शुरू की।

उनका कार्यक्षेत्र अत्यंत व्यापक रहा—संवैधानिक कानून, आपराधिक कानून, सिविल विवाद, सेवा मामलों और चुनाव कानून तक।

उन्होंने कई महत्वपूर्ण सरकारी विभागों और संस्थाओं का प्रतिनिधित्व किया.

वे राजस्थान के ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग, परिवहन, श्रम, सहकारिता, स्टाम्प एवं पंजीयन विभाग शामिल हैं। इसके अलावा, वे राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI), राजस्थान राज्य विद्युत बोर्ड, बीएसएनएल और भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड जैसे प्रतिष्ठित संगठनों के वकील भी रहे।

साथ ही, उन्होंने महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर और जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर जैसे शैक्षणिक संस्थानों का भी प्रतिनिधित्व किया।

वर्ष 2000 से 2004 के बीच उन्होंने अतिरिक्त केंद्रीय सरकारी स्थायी अधिवक्ता (Additional Central Government Standing Counsel) के रूप में भी सेवा दी।

एक संतुलित और प्रभावशाली न्यायिक यात्रा

उनकी बेहतरीन वकालत और गहरी कानूनी समझ को देखते हुए 8 जनवरी 2013 को उन्हें राजस्थान हाईकोर्ट का अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया।

करीब दो वर्ष के बाद 7 जनवरी 2015 को उन्हे पदोन्नत कर स्थायी न्यायाधीश नियुक्त किया गया.

वर्ष 2013 से जनवरी 2024 तक राजस्थान हाईकोर्ट में लगभग नौ वर्षों तक उन्होंने सेवा दी और इस दौरान करीब 6500 से अधिक ऐतिहासिफ और रिपोर्टेबल जजमेंट दिए, जो उनकी न्यायिक क्षमता और गहन विश्लेषण को दर्शाते हैं।

फरवरी 2024 में उन्हें गुवाहाटी हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया।

इस पद पर रहते हुए उन्होंने न्यायिक प्रशासन में कई सुधार किए, लंबित मामलों को कम करने के लिए प्रभावी कदम उठाए और न्याय तक पहुंच को आसान बनाने के लिए नई पहलें शुरू कीं।

सुप्रीम कोर्ट तक का सफर

26 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने उनके नाम की सिफारिश की, जिसे 29 मई को केंद्र सरकार ने मंजूरी दी।

अगले ही दिन, 30 मई 2025 को उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में पदभार ग्रहण किया। उनका कार्यकाल 25 मार्च 2029 तक निर्धारित है।

ऐतिहासिक फैसले और न्यायिक दृष्टिकोण

जस्टिस विजय बिश्नोई के निर्णयों में संतुलन, संवेदनशीलता और कानूनी गहराई साफ दिखाई देती है।

  1. वॉयस सैंपल लेने की अनुमति

राजस्थान बनाम विक्रमजीत सिंह (2018) मामले में उन्होंने आरोपी से वॉयस सैंपल लेने की अनुमति दी। उन्होंने स्पष्ट कहा कि आधुनिक तकनीक का उपयोग अपराध नियंत्रण के लिए आवश्यक है और इससे आरोपी के अधिकारों का उल्लंघन नहीं होता।

  1. विवाहित पुत्रियों को अनुकंपा नियुक्ति

प्रियंका श्रीमाली बनाम राजस्थान राज्य (2022) में उन्होंने विवाहित पुत्रियों को अनुकंपा नियुक्ति से बाहर रखने को असंवैधानिक करार दिया। यह फैसला लैंगिक समानता के क्षेत्र में मील का पत्थर माना गया।

  1. व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण

दसरथ राय बनाम असम राज्य (2024) में उन्होंने किशोरों को अग्रिम जमानत का अधिकार देते हुए कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता सभी के लिए समान है।

  1. मिजोरम में राज्य मानवाधिकार आयोग

मिजोरम सरकार को राज्य मानवाधिकार आयोग गठित करने के लिए बाध्य करना उनके न्यायिक हस्तक्षेप का उदाहरण है, जिसने प्रशासनिक जवाबदेही को मजबूत किया।

  1. पर्यावरण और विरासत संरक्षण

असम में ऐतिहासिक स्थलों और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मामलों में उन्होंने सख्त रुख अपनाया और सरकार को आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए।

प्रशासनिक सुधार और न्यायिक नवाचार

गुवाहाटी मुख्य न्यायाधीश के रूप में उन्होंने कई महत्वपूर्ण सुधार किए।

POCSO मामलों में पीड़ितों की पहचान गोपनीय रखने के लिए नई प्रक्रिया लागू करना एक बड़ा कदम था। इससे न्यायिक प्रक्रिया अधिक संवेदनशील और पीड़ित-केंद्रित बनी।

इसके अलावा, उन्होंने RTI कानून के प्रभावी क्रियान्वयन और सरकारी विभागों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए भी निर्देश दिए।

न्यायिक दर्शन और व्यक्तित्व

जस्टिस विजय बिश्नोई का न्यायिक दर्शन स्पष्ट है—संविधान सर्वोपरि, न्याय सुलभ और प्रक्रिया निष्पक्ष। उनके फैसलों में न केवल कानूनी मजबूती होती है, बल्कि मानवीय संवेदनाएं भी झलकती हैं।

वे मानते हैं कि न्याय केवल कानून की व्याख्या नहीं, बल्कि समाज में संतुलन और विश्वास स्थापित करने का माध्यम है। उनके निर्णयों में यह संतुलन स्पष्ट दिखाई देता है।

न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की यात्रा केवल एक व्यक्ति की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारतीय न्यायपालिका की उस परंपरा का प्रतीक है, जहां कड़ी मेहनत, ईमानदारी और कानून के प्रति समर्पण सर्वोच्च स्थान रखते हैं।

उनका जीवन और करियर यह संदेश देता है कि न्याय के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति न केवल अपने लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए परिवर्तन का माध्यम बन सकता है।

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