अधिवक्ताओं ने कहा, राजनीतिक दबाव के चलते बर्खास्तगी; हाईकोर्ट ने कहा-मनमानी नहीं चलेगी, JDA नई नीति बनाए जिसमें महिलाओं को मिले प्रतिनिधित्व।
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) द्वारा 17 सहायक अधिवक्ताओं की बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने आदेश को रद्द करते हुए साफ शब्दों में कहा कि यह कार्रवाई पूरी तरह मनमानी और नियमों के खिलाफ थी।
जस्टिस गणेशराम मीणा की एकलपीठ ने याचिकाकर्ता प्रताप सिंह सहित 17 सहायक अधिवक्ताओं की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए यह महत्वपूर्ण फैसला दिया हैं।
सम्मानजनक पेशा
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में अधिवक्ताओं को इस तरह हटाने को गलत बताते हुए कहा कि वकीलों का पेशा सम्मानजनक है, उन्हें मनमाने तरीके से नहीं हटाया जा सकता।
सरकारी संस्थाओं को पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखनी चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि JDA ने अपने ही नियमों का पालन नहीं किया और किसी भी अधिवक्ता के खराब प्रदर्शन का कोई प्रमाण पेश नहीं किया गया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना ठोस कारण और निर्धारित प्रक्रिया के किसी भी व्यक्ति को हटाना संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
कोर्ट ने अपने फैसले में न केवल JDA के आदेश को निरस्त किया, बल्कि सरकारी संस्थाओं को कड़ा संदेश भी दिया कि वे पारदर्शिता और निष्पक्षता के सिद्धांतों का पालन करें।
क्या था पूरा विवाद?
मामला JDA में नियुक्त सहायक अधिवक्ताओं की सेवाएं समाप्त करने से जुड़ा था।
इन अधिवक्ताओं को वर्षों पहले नियुक्त किया गया था ताकि वे विभाग और पैनल वकीलों के बीच समन्वय स्थापित कर सकें।
लेकिन नवंबर 2025 में अचानक एक आदेश जारी कर 17 सहायक अधिवक्ताओं की सेवाएं समाप्त कर दी गईं।
इस फैसले को चुनौती देते हुए प्रताप सिंह समेत अन्य अधिवक्ताओं ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ता अधिवक्ताओं का पक्ष
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं कमलाकर शर्मा, दिनेश यादव, पवन शर्मा ने दलीलें देते हुए कहा कि वे वर्षों से JDA के साथ सहायक अधिवक्ता के रूप में कार्य कर रहे थे और उनका कार्य प्रदर्शन लगातार संतोषजनक रहा है।
उन्होंने कोर्ट के समक्ष ऐसे दस्तावेज भी पेश किए, जिनमें उनके काम को “गुणवत्तापूर्ण और संतोषजनक” बताया गया था।
इसके बावजूद उन्हें बिना किसी कारण और बिना नोटिस के हटा दिया गया, जो कि पूरी तरह अनुचित है।
अधिवक्ताओं ने कहा कि JDA द्वारा जारी आदेशों (2009, 2014 और 2022) में स्पष्ट रूप से यह शर्त रखी गई थी कि किसी भी सहायक अधिवक्ता को केवल तभी हटाया जा सकता है जब उसका कार्य असंतोषजनक पाया जाए और इसके लिए संबंधित अधिकारी की रिपोर्ट आवश्यक होती है।
लेकिन इस मामले में न तो कोई ऐसी रिपोर्ट प्रस्तुत की गई और न ही किसी प्रकार का आरोप लगाया गया।
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि उनकी सेवाएं राजनीतिक दबाव या निर्देश के कारण समाप्त की गईं।
अधिवक्ताओं ने दलील दी कि यह कार्रवाई निष्पक्ष नहीं है और कुछ अन्य वकीलों को अवसर देने के लिए उन्हें हटाया गया, क्योंकि उन्हें हटाने से पहले कोई कारण बताओ नोटिस और अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं दिया गया।
JDA का जवाब
याचिकाओं के विरोध में जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) की ओर से अधिवक्ताओं ने कहा कि सहायक अधिवक्ताओं की नियुक्ति स्थायी नहीं, बल्कि पूर्णतः अनुबंध (contractual) आधार पर की गई थी।
JDA का मुख्य तर्क था कि सहायक अधिवक्ता JDA के नियमित कर्मचारी नहीं हैं, उनकी सेवाएं अस्थायी प्रकृति की हैं और उन्हें सेवा में बने रहने का कोई “अधिकार” (vested right) नहीं है।
प्रतिवादी पक्ष ने कहा कि किसी भी संस्था को यह अधिकार है कि वह अपनी आवश्यकता के अनुसार किसी भी अधिवक्ता की सेवाएं ले या समाप्त करे।
JDA को यह बाध्य नहीं किया जा सकता कि वह किसी विशेष व्यक्ति को ही बनाए रखे। उन्होंने यह भी बताया कि JDA में सहायक अधिवक्ताओं के कई पद खाली हैं और संस्था को अपनी कार्यप्रणाली के अनुसार नए अधिवक्ताओं की नियुक्ति करने का अधिकार है।
JDA ने “डॉक्ट्रिन ऑफ प्लेजर” (Doctrine of Pleasure) का हवाला देते हुए कहा कि सरकार या उसकी एजेंसियां अपने अधीन कार्यरत व्यक्तियों की सेवाएं समाप्त कर सकती हैं।
हाईकोर्ट का फैसला
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि JDA द्वारा जारी नियमों में स्पष्ट था कि केवल असंतोषजनक कार्य प्रदर्शन पर ही हटाया जा सकता है, लेकिन किसी भी अधिवक्ता के खिलाफ खराब प्रदर्शन का कोई रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया गया।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में JDA को सहायक अधिवक्ताओं की नियुक्ति और हटाने के लिए स्पष्ट और पारदर्शी नीति बनाने के आदेश दिए हैं।
साथ ही याचिकाकर्ता अधिवक्ताओं को बर्खास्त करने के आदेश पर रोक लगाते हुए उन्हें तब तक सेवा में बनाए रखने का आदेश दिया, जब तक उनका कार्य संतोषजनक हो या नई नीति लागू नहीं हो जाती।
हाईकोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि नई नीति में महिलाओं को प्रतिनिधित्व मिले और कमजोर वर्गों को अवसर दिए जाएं।