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ट्रांसजेंडर पहचान ‘राज्य की अनुमति’ पर निर्भर नहीं हो सकती, उनकी पहचान और गरिमा से समझौता नहीं किया जा सकता- राजस्थान हाईकोर्ट

Rajasthan High Court Orders 3% Weightage for Transgender Candidates, Directs State to Frame Inclusive Policy

सरकार की OBC नीति पर कोर्ट सख्त, कहा-“स्व-पहचान मौलिक अधिकार”; ट्रांसजेंडर को 3% अतिरिक्त वेटेज देने का आदेश

जोधपुर। ट्रांसजेंडर अधिकारों को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक और कड़ा संदेश देते हुए केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

राजस्थान हाईकोर्ट ने साफ कहा-“स्व-पहचान कोई सरकारी मंजूरी नहीं, बल्कि मौलिक अधिकार है”।

संशोधन विधेयक, 2026 पर चिंता

जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने केन्द्र द्वारा लाए जा रहे Transgender Persons (Protection of Rights) Amendment Bill, 2026 पर चिंता जताते हुए कहा-

“लैंगिक पहचान को प्रमाणपत्र और प्रशासनिक मंजूरी से जोड़ना, व्यक्ति की गरिमा पर सीधा हमला है।”

कोर्ट ने चेताया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा “व्यक्तित्व का अविच्छेद्य हिस्सा” मानी गई पहचान को अब राज्य-निर्भर अधिकार में बदला जा रहा है।

कोर्ट ने कहा:

“स्व-परिचय कोई रियायत नहीं, बल्कि अधिकार है।”

हालांकि, कोर्ट ने यह भी चिंता जताई कि संसद द्वारा पारित ट्रांसजेंडर (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 इस अधिकार को सीमित कर सकता है, क्योंकि इसमें लैंगिक पहचान को प्रशासनिक प्रमाणन से जोड़ने का प्रस्ताव है

पिछले सप्ताह पारित इस विधेयक का उद्देश्य यह पुनर्परिभाषित करना है कि “ट्रांसजेंडर व्यक्ति” किसे माना जाएगा। यह कानून बनने के लिए राष्ट्रपति की मंजूरी का इंतजार किया जा रहा हैं.

यह देखते हुए कि यह विधेयक आत्म-धारित लैंगिक पहचान के अधिकार को छीन लेता है, हाईकोर्ट ने कहा:

“अब यह प्रस्तावित किया गया है कि लैंगिक पहचान की कानूनी मान्यता को प्रमाणन, जांच या अन्य प्रकार की प्रशासनिक स्वीकृति पर निर्भर बनाया जाएगा। जिसे सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्तित्व के एक अविच्छेद्य पहलू के रूप में मान्यता दी थी, वह अब एक सशर्त, राज्य-नियंत्रित अधिकार में परिवर्तित होने का जोखिम रखता है।”

NALSA फैसले की याद दिलाई

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक NALSA जजमेंट का हवाला देते हुए कहा—

जेंडर की पहचान व्यक्ति का मौलिक अधिकार है , यह ह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16 और 21 के तहत संरक्षित है.

कोर्ट ने कहा कि “जेंडर बाइनरी नहीं, बल्कि विविधता है” “Selfhood is not a concession, it is a right” – कोर्ट

राज्य सरकार की नीति पर बड़ा सवाल

राजस्थान सरकार द्वारा ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को OBC में शामिल करने की नीति को कोर्ट ने “आंखों में धूल झोंकने वाली” (eyewash) करार दिया।

कोर्ट ने कहा इस नीति से कोई वास्तविक लाभ नहीं मिला उल्टा, कई ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के SC/ST के पुराने आरक्षण अधिकार खत्म हो गए हैं.

कोर्ट ने कहा कि बिना विकल्प दिए सभी को OBC में डालना अनुचित और हानिकारक है

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया हैं कि ट्रांसजेंडर समुदाय की स्थिति पर उच्च स्तरीय समिति गठित कर सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन का गहन अध्ययन करें और उनके लिए रोजगार और शिक्षा में प्रभावी आरक्षण नीति बनाएं.

हाईकोर्ट ने अंतरिम राहत के रूप में यह भी आदेश दिया कि जब तक राज्य सरकार कोई अंतिम नीति नहीं बनाती, तब तक ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए अधिकतम अंकों में 3% अतिरिक्त वेटेज दिया जाए।

यह व्यवस्था राज्य सरकार, उसके उपक्रमों, सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों और राज्य से वित्तपोषित संस्थानों पर लागू होगी।

केवल कागजी उपाय पर्याप्त नहीं

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि ट्रांसजेंडर समुदाय को केवल OBC श्रेणी में शामिल कर देना पर्याप्त नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि राजस्थान सरकार द्वारा लागू ट्रांसजेंडर उत्थानकोष दिशानिर्देश, 2021 केवल निर्देशात्मक हैं और इससे वास्तविक सामाजिक न्याय सुनिश्चित नहीं होता।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि आरक्षण नीति बनाना विधायिका और कार्यपालिका का अधिकार है, लेकिन न्यायालय यह सुनिश्चित कर सकता है कि संवैधानिक मूल्यों का पालन हो और हाशिए पर खड़े समुदायों को न्याय मिले।

कर्नाटक और तमिलनाडु मॉडल का हवाला

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कर्नाटक सरकार के 2021 के भर्ती नियमों का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए अलग से 1% आरक्षण का प्रावधान किया गया है।

साथ ही तमिलनाडु द्वारा उठाए गए सकारात्मक कदमों का भी उल्लेख करते हुए कोर्ट ने राजस्थान सरकार से अपेक्षा जताई कि वह इन मॉडलों का अध्ययन कर अपनी नीति तैयार करे।

क्या हैं मामला

राजस्थान हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति द्वारा दायर उस याचिका पर सुनवाई करते हुए कीं, जिसमें शैक्षणिक संस्थानों और सार्वजनिक रोजगार में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए आरक्षण के अभाव का मुद्दा उठाया गया था।

याचिका पर सुनवाई करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने हा कि “लैंगिक पहचान की मान्यता एक मौलिक अधिकार है,” इसमें जोड़ा गया।

लगातार बदलते कानूनों की स्थिती में राज्य द्वारा बनाई गई किसी भी नीति-व्यवस्था को सावधानीपूर्वक तैयार किया जाना चाहिए और उसे यथासंभव संवैधानिक गारंटी को बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए, जिसमें आरक्षण जैसे सकारात्मक उपायों का विस्तार शामिल हो.

इसमें आगे कहा गया कि विधि का शासन यह मांग करता है कि कोई भी ढांचा, चाहे वह विधायी हो या कार्यकारी, केवल वैधता ही नहीं बल्कि संवैधानिक विवेक की कसौटी पर भी खरा उतरे।

“राज्य, एक संवैधानिक इकाई के रूप में, ऐसा दृष्टिकोण अपनाने के लिए अपेक्षित है जो वैधानिक अनुपालन और संवैधानिक सामंजस्य को संतुलित करे, ताकि प्रक्रियात्मक बाधाओं के कारण ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकार केवल दिखावटी न रह जाएं। वास्तविक मापदंड यह है कि उस प्रणालीगत हाशियाकरण को ठोस रूप से समाप्त किया जाए, जिसका सामना ट्रांसजेंडर व्यक्ति लगातार करते हैं,” पीठ ने जोड़ा।

हाईकोर्ट ने ये टिप्पणी मुख्य रूप से राजस्थान सरकार को लेकर की गयी हैं जिसे ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए आरक्षण पर नीति निर्णय लेने के लिए कहा गया है।

हाईकोर्ट का समाज से सवाल

पिछले वर्ष दायर याचिका में मूल रूप से उस राज्य सरकार की अधिसूचना को चुनौती दी गई थी, जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) घोषित किया गया था, लेकिन उन्हें कोई अलग आरक्षण प्रदान नहीं किया गया था।

फैसले की शुरुआत में, हाईकोर्ट ने कहा कि भारत के धार्मिक ग्रंथों में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अत्यधिक महत्व दिया गया है, लेकिन वास्तविकता में उन्हें अक्सर बुनियादी मानवीय व्यवहार से भी वंचित रखा जाता है।

हाईकोर्ट ने कहा –

“हमारी पौराणिक कथाओं में कई ऐसे पात्र हैं जो ट्रांसजेंडर या तीसरे लिंग की पहचान से जुड़े हैं, जिन्हें अक्सर लिंग परिवर्तन या उभयलिंगी रूप में दर्शाया गया है। इनमें मोहिनी, इला (या सुद्युम्न), अर्जुन (बृहन्नला के रूप में) और अर्धनारीश्वर जैसे देवता और पात्र शामिल हैं। कुछ देवताओं की विशेष रूप से ट्रांसजेंडर समुदाय द्वारा पूजा की जाती है। बहुचरा माता के भक्त (जिनमें आत्म-नपुंसकीकरण करने वाले भी शामिल हैं) गुजरात के मंदिरों में त्योहारों, व्रतों और अनुष्ठानों के माध्यम से उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। अन्य पात्र जैसे अंगालम्मा और येल्लम्मा भी विशेष रूप से ट्रांसजेंडर समूहों द्वारा पूजे जाते हैं, जो उन्हें संरक्षक और शुभ मानते हैं,” पीठ ने कहा।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस समृद्ध सांस्कृतिक मान्यता के बावजूद, समकालीन भारत में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की वास्तविक सामाजिक स्थिति अब भी अत्यंत प्रतिकूल बनी हुई है, क्योंकि वे समाज के सबसे कमजोर वर्गों में शामिल हैं।

“उनका सामाजिक बहिष्कार, आर्थिक असुरक्षा और संस्थागत भेदभाव उनके दैनिक जीवन को परिभाषित करते हैं,” पीठ ने कहा।

हाईकोर्ट ने यह सवाल उठाया कि क्या एक ऐसा समाज, जो अपनी आध्यात्मिक कल्पना में लैंगिक विविधता का सम्मान करता है, वास्तविक जीवन में उसी विविधता को जीने वाले लोगों को गरिमा, समानता और संवैधानिक संरक्षण जैसे मूलभूत अधिकार देने से इनकार कर सकता है।

राज्य को दी चेतावनी: नीति बनाते समय संवैधानिक संतुलन जरूरी

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को स्पष्ट चेतावनी दी कि कोई भी नई नीति बनाते समय संवैधानिक मूल्यों से समझौता नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि नीति ऐसी होनी चाहिए जो:

ट्रांसजेंडर समुदाय की वास्तविक समस्याओं को संबोधित करे, उनकी गरिमा और समानता के अधिकार की रक्षा करे और प्रक्रियात्मक बाधाओं के कारण उनके अधिकारों को कमजोर न करे क्या होगा आगे?

हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रांसजेंडर समुदाय की स्थिति पर विस्तृत अध्ययन कराना होगा, विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के आधार पर नीति बनानी होगी और तब तक 3% अतिरिक्त वेटेज की व्यवस्था लागू रखनी होगी.

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता विवेक माथुर, प्रकाश कुमार बालौत और धीरेंद्र सिंह सोढ़ा ने पैरवी की।

राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता प्रवीण खंडेलवाल ने पक्ष रखा।

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