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उदयपुर के कोटड़ा CHC को तोड़ने पर राजस्थान हाईकोर्ट की रोक, हाईकोर्ट ने कहा-पहले वैकल्पिक व्यवस्था जरूरी,

Rajasthan High Court Stays Demolition of Kotda CHC, Says Alternative Arrangements Must Come First

जोधपुर/उदयपुर। राजस्थान के उदयपुर जिले के कोटड़ा स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) को तोड़कर उसी स्थान पर उप जिला अस्पताल बनाने के सरकारी आदेश पर राजस्थान हाईकोर्ट ने अंतरिम रोक लगा दी है।

राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्य पीठ में जस्टिस कुलदीप माथुर की एकलपीठ ने यह आदेश Mohammad Idris की ओर से दायर याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई करते हुए दिया है। याचिकाकर्ता मोहम्मद इदरीस की ओर से अधिवक्ता पंकज

राजस्थान हाईकोर्ट ने प्रमुख सचिव और निदेशक चिकित्सा विभाग, जिला कलेक्टर उदयपुर, सीएमएचओ सहित अन्य अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

क्या है पूरा मामला

कोटड़ा में पहले से एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र संचालित हो रहा है, जो क्षेत्र के ग्रामीणों के लिए प्रमुख स्वास्थ्य सुविधा है।

राज्य सरकार ने इसी क्षेत्र में उप जिला अस्पताल स्थापित करने की स्वीकृति दी थी, लेकिन मौजूदा CHC परिसर में पर्याप्त जगह नहीं होने के कारण प्रशासन ने करीब 2–3 किलोमीटर दूर नई भूमि आवंटित की थी।

याचिका में बताया गया कि जिला कलेक्टर, उदयपुर ने 13 जनवरी 2025 को पूर्व आवंटन को निरस्त करते हुए नई भूमि पर अस्पताल निर्माण का निर्णय लिया था।

इसके बावजूद संबंधित अधिकारियों ने नई भूमि पर निर्माण करने के बजाय पुराने CHC भवन को ही तोड़कर वहीं उप जिला अस्पताल बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी।

याचिकाकर्ता की मुख्य दलीलें

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता पंकज चौधरी ने हाईकोर्ट में दलीलें पेश करते हुए कहा कि मौजूदा CHC भवन अच्छी स्थिति में है और वहां नियमित स्वास्थ्य सेवाएं दी जा रही हैं।

अधिवक्ता ने कहा कि नई भूमि पहले ही आवंटित हो चुकी है, इसलिए पुराने भवन को तोड़ना अवैध और मनमाना फैसला है।

याचिका में दलील दी गई कि सरकार द्वारा स्वीकृत धनराशि का उपयोग निर्धारित स्थल के बजाय अन्यत्र करना सार्वजनिक धन का दुरुपयोग है और CHC को तोड़ने से क्षेत्र की जनता तत्काल स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित हो जाएगी, जो जनहित के विपरीत है।

याचिका में यह भी कहा गया कि यह निर्णय संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन भी है।

जनहित का मुद्दा बना केंद्र

अदालत के समक्ष यह भी तर्क रखा गया कि अस्पताल जैसी सार्वजनिक सुविधा को हटाने से पहले वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है। स्वास्थ्य सेवाएं सीधे तौर पर लोगों के जीवन और सुरक्षा से जुड़ी होती हैं, इसलिए ऐसे मामलों में न्यायालय का हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है।

याचिका में यह भी कहा गया कि सरकार द्वारा जारी सर्कुलर (04 अगस्त 2022) के अनुसार, जहां पर्याप्त भूमि उपलब्ध नहीं हो, वहां नई जमीन पर ही अस्पताल निर्माण किया जाना चाहिए। इसके बावजूद पुराने परिसर को तोड़ने का निर्णय नीति के विपरीत है।

हाईकोर्ट की टिप्पणी और आदेश

प्रारंभिक सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता के तर्कों को प्रथम दृष्टया उचित मानते हुए कहा कि यदि एक कार्यरत स्वास्थ्य केंद्र को बिना वैकल्पिक व्यवस्था के ध्वस्त किया जाता है, तो इससे आम जनता को अपूरणीय क्षति हो सकती है।

इसी आधार पर न्यायालय ने 24 नवंबर 2025 के नष्टिकरण (dismantling) आदेश के प्रभाव और क्रियान्वयन पर रोक लगा दी।

15 अप्रैल अगली सुनवाई

हाईकोर्ट ने मामले की विस्तृत सुनवाई तक यथास्थिति बनाए रखने के आदेश दिए।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि अगली सुनवाई तक किसी भी प्रकार का ध्वस्तीकरण (demolition) नहीं किया जाएगा, विशेष रूप से उन भवनों का जो वर्तमान में मरीजों को स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान कर रहे हैं।

साथ ही कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 15 अप्रैल 2026 को निर्धारित करते हुए प्रशासन को यह छूट दी है कि नियमों के अनुसार आसपास उपलब्ध खाली भूमि या पीडब्ल्यूडी क्वार्टर पर निर्माण कार्य किया जा सकता है।

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