जोधपुर। भारत ने एक बार फिर अपनी क्षमता, साहस और तकनीकी दक्षता का अद्भुत प्रदर्शन करते हुए विश्व मंच पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है।
31 मार्च 2026 को लक्षद्वीप के कवरत्ती द्वीप के पास भारतीय समुद्री सीमा में तीन भारतीय सिविलियन गोताखोरों ने 100 मीटर की गहराई तक सफलतापूर्वक गोता लगाकर इतिहास रच दिया।

इस ऐतिहासिक मिशन के दौरान उन्होंने समुद्र की गहराइयों में तिरंगा फहराया, जो न केवल एक प्रतीकात्मक उपलब्धि थी, बल्कि भारत की तकनीकी डाइविंग क्षमताओं का भी सशक्त प्रदर्शन था।
यह उपलब्धि भारतीय डाइविंग समुदाय के लिए एक बड़ा मील का पत्थर मानी जा रही है, क्योंकि यह देश में अब तक की सबसे गहरी सिविलियन डाइव में से एक है।
राजस्थान के लिए भी यह गौरव का क्षण है कि इस तीन सदस्यीय दल में जोधपुर के अधिवक्ता मुक्तेश माहेश्वरी भी शामिल हैं।
कौन हैं मुक्तेश माहेश्वरी
राजस्थान हाईकोर्ट के अधिवक्ता मुक्तेश माहेश्वरी मूल रूप से जोधपुर के निवासी हैं। वे पिछले 18 वर्षों से राजस्थान हाईकोर्ट में सक्रिय और प्रतिष्ठित वकील के रूप में कार्यरत हैं तथा विभिन्न संस्थानों का भी प्रतिनिधित्व करते हैं।
कानूनी क्षेत्र के साथ-साथ उन्हें साहसिक गतिविधियों में भी विशेष रुचि है। वर्ष 2018 से वे स्कूबा डाइविंग से जुड़े हुए हैं और वर्ष 2023 से उन्होंने डीप टेक्निकल डाइविंग में कदम रखते हुए इस क्षेत्र में अपनी मजबूत पहचान बनाई है।
मुक्तेश माहेश्वरी सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज और वर्तमान में लॉ कमीशन ऑफ इंडिया के चेयरमैन जस्टिस दिनेश माहेश्वरी के बेटे हैं।

इस ऐतिहासिक मिशन के नायक
इस साहसिक अभियान का नेतृत्व प्रसिद्ध डीप ट्रिमिक्स और रीब्रीदर इंस्ट्रक्टर डोनारुन दास ने किया। वे लंबे समय से तकनीकी डाइविंग के क्षेत्र में सक्रिय हैं और जटिल परिस्थितियों में गोताखोरी करने की विशेषज्ञता रखते हैं। उनके नेतृत्व में यह मिशन अत्यंत सटीकता और अनुशासन के साथ पूरा किया गया।
पेशे से वकील मुक्तेश माहेश्वरी इस साहसिक अभियान की 3 सदस्यीय टीम के दूसरे सदस्य हैं, जो अपनी गहरी रुचि और वर्षों के प्रशिक्षण के चलते तकनीकी डाइविंग में भी मजबूत पहचान बना चुके हैं।
तीसरे सदस्य रोलान मैथियास ने भी इस मिशन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने पानी के भीतर टीम के समन्वय और निष्पादन में अहम योगदान दिया। तीनों गोताखोरों का यह संयोजन अनुभव, अनुशासन और जुनून का बेहतरीन उदाहरण है।
तिरंगा फहराने का ऐतिहासिक क्षण
इस मिशन का सबसे भावनात्मक और गौरवपूर्ण पल वह था, जब टीम ने 100 मीटर की गहराई पर भारतीय तिरंगा फहराया। समुद्र की अंधेरी और चुनौतीपूर्ण गहराइयों में तिरंगे का लहराना हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है।
यह संभवतः भारत में अब तक का सबसे गहरा सिविलियन फ्लैग डिप्लॉयमेंट माना जा रहा है। यह केवल एक प्रतीकात्मक कार्य नहीं था, बल्कि यह इस बात का प्रमाण था कि भारतीय गोताखोर कठिनतम परिस्थितियों में भी आत्मविश्वास और दक्षता के साथ काम कर सकते हैं।
100 मीटर की गहराई: क्यों है यह इतना चुनौतीपूर्ण?
100 मीटर की गहराई तक गोता लगाना सामान्य डाइविंग से कहीं अधिक कठिन और जोखिमपूर्ण होता है।
इतनी गहराई पर पानी का दबाव अत्यधिक बढ़ जाता है और शरीर पर इसका सीधा प्रभाव पड़ता है।
इस स्तर की डाइविंग के लिए विशेष तकनीकों जैसे डीप ट्रिमिक्स डाइविंग का उपयोग किया जाता है, जिसमें ऑक्सीजन, नाइट्रोजन और हीलियम का मिश्रण नियंत्रित मात्रा में इस्तेमाल किया जाता है।
इसके अलावा, गोताखोरों को डीकंप्रेशन स्टॉप्स का सख्ती से पालन करना होता है, ताकि शरीर में गैस के बुलबुले न बनें और डीकंप्रेशन सिकनेस से बचा जा सके। यह पूरी प्रक्रिया अत्यंत सटीक योजना, अनुशासन और टीमवर्क की मांग करती है।
सुरक्षा, योजना और भविष्य
इतनी गहरी डाइव को सफलतापूर्वक अंजाम देना केवल साहस का नहीं, बल्कि सूक्ष्म योजना और सुरक्षा प्रबंधन का परिणाम होता है। इस मिशन के लिए टीम ने पहले से विस्तृत डाइव प्लान तैयार किया था, जिसमें बैकअप गैस, आपातकालीन प्रोटोकॉल और डीकंप्रेशन शेड्यूल शामिल थे।

सतह पर मौजूद टीम ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। रियास जलाल और समीर अमन ने पूरे मिशन के दौरान निगरानी और समन्वय सुनिश्चित किया। उनकी सतर्कता ने गोताखोरों की सुरक्षा को और मजबूत बनाया।
लक्षद्वीप, खासकर कवरत्ती द्वीप के आसपास का समुद्री क्षेत्र, अपनी स्वच्छता, शांत जल और अद्भुत दृश्यता के लिए जाना जाता है। यहां की जैव विविधता भी बेहद समृद्ध है, जो इसे डाइविंग के लिए आदर्श स्थान बनाती है।
यह ऐतिहासिक डाइव केवल एक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक संकेत है कि भारत में तकनीकी डाइविंग का भविष्य उज्ज्वल है।
इस उपलब्धि से न केवल युवा गोताखोरों को प्रेरणा मिलेगी, बल्कि सरकार और निजी क्षेत्र भी इस क्षेत्र में निवेश बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित होंगे।
