2009 से लंबित केस में अभियोजन सबूत पेश करने में विफल, अदालत बोली-मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य के बिना आरोप सिद्ध नहीं; राज्य की जांच व्यवस्था पर उठे सवाल
जयपुर। न्याय में देरी को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन जयपुर की एक अदालत से सामने आए मामले ने पूरे तंत्र पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।
जयपुर की अदालत में वर्ष 2009 से लंबित एक आपराधिक मामले में 16 साल तक एक भी गवाह पेश नहीं हुआ, जिसके बाद अदालत ने आरोपी कर्मचारी नाथूलाल धोबी को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया।
यह मामला कथित रूप से जाति प्रमाण पत्र के आधार पर सरकारी नौकरी प्राप्त करने से जुड़ा था।
अदालत ने स्पष्ट कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने के लिए कोई मौखिक या दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका, इसलिए अभियुक्त के खिलाफ लगाए गए आरोप सिद्ध नहीं होते।
40 साल पुराने प्रमाण पत्र से शुरू हुआ विवाद
मामले की शुरुआत वर्ष 1985 में हुई थी, जब 03 दिसंबर 1985 को तहसील जयपुर द्वारा नाथूलाल धोबी को अनुसूचित जनजाति (ST) का जाति प्रमाण पत्र जारी किया गया था।
बाद में इसी प्रमाण पत्र के आधार पर उन्होंने सरकारी सेवा में नियुक्ति प्राप्त की।
दावा किया गया कि याचिकाकर्ता नाथूलाल धोबी वास्तव में अनुसूचित जाति (SC) वर्ग से संबंधित था, लेकिन उसे गलती से अनुसूचित जनजाति का प्रमाण पत्र जारी कर दिया गया।
इसी आधार पर उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने ST वर्ग के लिए आरक्षित पद पर नौकरी हासिल कर ली।
अन्य लोगों को भी गलत प्रमाण पत्र जारी होने का दावा
मामले में यह भी सामने आया कि उस समय तहसील कार्यालय के डिस्पैच रजिस्टर में ऐसे कई नाम दर्ज थे, जिन्हें कथित रूप से गलत श्रेणी के जाति प्रमाण पत्र जारी किए गए थे।
इनमें घनश्याम बैरवा सहित अन्य व्यक्तियों के नाम भी बताए गए, जो अनुसूचित जाति वर्ग में आते थे, लेकिन उन्हें भी ST प्रमाण पत्र दिए जाने का उल्लेख था।
इस तथ्य के आधार पर बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि यदि प्रशासनिक स्तर पर त्रुटि हुई थी, तो उसका दोष कर्मचारी पर नहीं डाला जा सकता।
इंटेलिजेंस ब्यूरो की शिकायत पर 2009 में दर्ज हुई FIR
नाथूलाल धोबी इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) में कार्यरत थे। उसके खिलाफ 01 अप्रैल 2009 को आईबी की ओर से ही पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाई गई।
शिकायत में आरोप लगाया गया कि उन्होंने गलत जाति प्रमाण पत्र के जरिए सरकारी नौकरी प्राप्त की और आरक्षित सीट पर नियुक्ति हासिल की।
इस रिपोर्ट के आधार पर बनीपार्क थाना जयपुर ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी।
बिना पर्याप्त जांच के दर्ज हुई एफआईआर?
बचाव पक्ष के अधिवक्ता हितेष बागड़ी का कहना था कि पुलिस ने शिकायत मिलने के बाद आरोपों की गहराई से जांच किए बिना ही एफआईआर दर्ज कर ली।
बाद में जांच अधिकारी ने स्वयं निष्कर्ष निकालते हुए कहा कि जाति प्रमाण पत्र में गड़बड़ी हुई है और आरोपी के खिलाफ अदालत में चालान पेश कर दिया।
नाथूलाल धोबी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धाराएं 420 (धोखाधड़ी), 465 (जालसाजी), 466 (सरकारी दस्तावेज में जालसाजी) और 471 (फर्जी दस्तावेज का उपयोग) के तहत आरोप लगाए गए।
2011 में आरोप तय, लेकिन ट्रायल में नहीं आया एक भी गवाह
मामला अदालत पहुंचने के बाद वर्ष 2011 में एसीजेएम कोर्ट, जयपुर ने आरोप तय कर दिए और ट्रायल शुरू हुआ। लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह न्यायिक प्रक्रिया की गंभीर कमजोरी को उजागर करता है।
करीब 16 वर्षों तक एक भी गवाह अदालत में बयान देने नहीं आया। न तो शिकायतकर्ता पक्ष ने साक्ष्य प्रस्तुत किए और न ही अभियोजन अपने आरोपों को साबित कर पाया।
बचाव पक्ष ने उठाया त्वरित न्याय का मुद्दा
आरोपी की ओर से पैरवी करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता भंवर बागड़ी और अधिवक्ता हितेष बागड़ी ने अदालत में जोरदार दलीलें दीं।
उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति को अनिश्चितकाल तक मुकदमे में फंसाकर नहीं रखा जा सकता। यदि अभियोजन पक्ष लगातार गवाह पेश नहीं कर पा रहा है और कोई ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, तो न्यायालय को त्वरित न्याय के सिद्धांत के तहत निर्णय देना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि जब आरोप तय होने के इतने वर्षों बाद भी एक भी गवाह नहीं आया, तो आरोपी को केवल लंबित मुकदमे के बोझ तले रखना न्यायसंगत नहीं है।
अदालत ने कहा-अभियोजन कहानी की पुष्टि नहीं
मामले की सुनवाई कर रहे एसीजेएम-6 जयपुर के पीठासीन अधिकारी कन्हैयालाल पारीक ने आदेश पारित करते हुए कहा कि अभियुक्त के विरुद्ध लगाए गए अपराधों के संबंध में कोई मौखिक अथवा दस्तावेजी साक्ष्य रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं है।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि जब अभियोजन अपनी कहानी की पुष्टि ही नहीं कर पाया, तो आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
इसी आधार पर न्यायालय ने नाथूलाल धोबी को दोषमुक्त (Acquitted) कर दिया।
न्याय में देरी पर उठे सवाल
यह मामला केवल एक आरोपी के बरी होने तक सीमित नहीं है, बल्कि न्याय व्यवस्था की धीमी गति और जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करता है।
यदि किसी व्यक्ति पर गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया जाता है, तो यह जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी होती है कि वे समयबद्ध तरीके से साक्ष्य जुटाएं और अदालत में पेश करें।
लेकिन यहां 16 वर्षों तक मामला लंबित रहा और एक भी गवाह पेश नहीं हुआ।
ऐसी स्थिति में आरोपी व्यक्ति वर्षों तक मानसिक, सामाजिक और प्रशासनिक दबाव झेलता है।
प्रशासनिक गलती का बोझ कर्मचारी पर?
बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि यदि जाति प्रमाण पत्र तहसील कार्यालय द्वारा जारी किया गया था, तो उसकी वैधता और जांच का दायित्व संबंधित प्रशासनिक विभाग का था।
यदि सरकारी अभिलेखों में त्रुटि थी, तो केवल प्रमाण पत्र धारक को आरोपी बनाना न्यायोचित नहीं माना जा सकता।
इस बिंदु पर अदालत ने भले विस्तार से टिप्पणी नहीं की, लेकिन साक्ष्य के अभाव में आरोपी को राहत मिल गई।
आरोपी के लिए राहत, सिस्टम के लिए चेतावनी
नाथूलाल धोबी को 16 वर्षों बाद राहत जरूर मिली, लेकिन इतने लंबे समय तक मुकदमे का सामना करना किसी भी नागरिक के लिए बड़ी परेशानी है।
यह फैसला उन संस्थाओं के लिए चेतावनी भी है, जो पर्याप्त आधार के बिना मामले दर्ज कर देती हैं या फिर मुकदमों को वर्षों तक लंबित छोड़ देती हैं।
