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10 वर्षीय मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म के बाद की थी बर्बर तरीके से हत्या, हाईकोर्ट ने कहा अपराध अत्यंत गंभीर और जघन्य, फिर भी आरोपी की फांसी की सजा को बदला आजीवन उम्रकैद में

Rajasthan High Court Commutes Death Sentence in Minor Rape-Murder Case, Orders Life Imprisonment Till Natural Death

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने डूंगरपुर जिले के बहुचर्चित नाबालिग बच्ची के अपहरण, दुष्कर्म और हत्या मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए दोषी जितेंद्र उर्फ जीतू की सजा-ए-मौत को उम्रकैद में बदल दिया है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई फांसी की सजा को बरकरार नहीं रखा और कहा कि यह मामला “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” की श्रेणी में नहीं आता।

हालांकि कोर्ट ने आरोपी की दोषसिद्धि को पूरी तरह कायम रखा और स्पष्ट किया कि उसे शेष प्राकृतिक जीवन तक कारावास में रहना होगा।

राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्रशेखर शर्मा की खंडपीठ ने यह महत्वपूर्ण फैसला ट्रायल कोर्ट की फांसी की सजा के रेफरेंस और आरोपी की अपील पर सुनाया है।

क्या था पूरा मामला

मामला डूंगरपुर जिले के सदर थाना क्षेत्र का है।

पीड़िता की मां ने 29 जून 2022 को पुलिस में रिपोर्ट दी थी कि उनकी 10 वर्षीय बेटी रात में घर के आंगन में सो रही थी।

आधी रात के बाद बच्ची लापता हो गई। परिवार और रिश्तेदारों ने काफी तलाश की, लेकिन उसका कोई पता नहीं चला। बाद में पुलिस ने अपहरण का मामला दर्ज किया।

जांच के दौरान बच्ची का शव डेपाट फला रोड पर एक पुलिया के नीचे मिला। शव की हालत बेहद गंभीर थी।

मेडिकल जांच में बच्ची के साथ क्रूर यौन हमला, सिर पर गंभीर चोटें और गला दबाकर हत्या किए जाने की पुष्टि हुई।

ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी फांसी

स्पेशल पॉक्सो कोर्ट, डूंगरपुर ने 1 अक्टूबर 2022 को आरोपी जितेंद्र उर्फ जीतू को आईपीसी की धारा 302, 363, 376AB तथा पॉक्सो एक्ट की धाराओं में दोषी मानते हुए फांसी की सजा सुनाई थी।

इसके साथ ही अन्य धाराओं में उम्रकैद और अन्य सजाएं भी दी गई थीं।

ट्रायल कोर्ट ने फांसी की पुष्टि के लिए मामला हाईकोर्ट को भेजा था, जबकि आरोपी ने सजा और दोषसिद्धि को चुनौती देते हुए अपील दायर की थी।

हाईकोर्ट ने किन आधारों पर दोषी माना

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद परिस्थितिजन्य, वैज्ञानिक और मौखिक साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण किया।

अदालत ने कहा कि भले ही घटना का कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं है, लेकिन परिस्थितियों की श्रृंखला इतनी मजबूत है कि आरोपी के अलावा किसी और के अपराधी होने की संभावना नहीं बचती।

हाईकोर्ट ने जिन अहम साक्ष्यों पर भरोसा किया:

आरोपी को पुलिया के पास देखा गया

एक गवाह के अनुसार घटना की सुबह लगभग 6:30 बजे उसने आरोपी को उसी पुलिया से बाहर आते देखा, जहां बाद में बच्ची का शव मिला। आरोपी के हाथ में बीयर की बोतल थी।

आरोपी का संदिग्ध व्यवहार

अन्य गवाहों के बयान में यह सामने आया कि आरोपी सुबह परेशान हालत में था और पिछली रात की बात को लेकर तनाव में दिख रहा था।

डीएनए और एफएसएल रिपोर्ट

फोरेंसिक रिपोर्ट में आरोपी की शर्ट पर मिले खून का डीएनए मृत बच्ची से मेल खाया। वहीं बच्ची के कपड़ों पर आरोपी के बाल मिले। अदालत ने इसे मजबूत वैज्ञानिक साक्ष्य माना।

मेडिकल रिपोर्ट

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बच्ची के साथ जबरन यौन उत्पीड़न, जननांगों पर गंभीर चोटें, सिर पर घातक वार और गला दबाकर हत्या की पुष्टि हुई।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी ने एक मासूम बच्ची के साथ अमानवीय और बर्बर कृत्य किया। यह केवल एक व्यक्ति के खिलाफ अपराध नहीं बल्कि समाज की सामूहिक चेतना पर हमला है।

कोर्ट ने टिप्पणी की:

“यह अपराध अत्यंत क्रूरता, नैतिक पतन और मानवीय गरिमा की अवहेलना का उदाहरण है। पीड़िता इतनी छोटी थी कि वह अपना बचाव भी नहीं कर सकती थी।”

फिर फांसी क्यों नहीं बरकरार रखी गई?

हाईकोर्ट ने कहा कि मृत्यु दंड केवल उन्हीं मामलों में दिया जा सकता है, जहां जीवन कारावास का विकल्प पूरी तरह समाप्त हो जाए और मामला “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” श्रेणी में आए।

अदालत ने माना कि अपराध अत्यंत गंभीर और जघन्य है, लेकिन उपलब्ध परिस्थितियों में यह ऐसा असाधारण मामला नहीं है जिसमें फांसी ही एकमात्र दंड हो।

आरोपी के पक्ष में किन बातों पर विचार हुआ

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार आरोपी की पृष्ठभूमि पर भी विचार किया। रिपोर्ट में सामने आया कि आरोपी 32 वर्ष का है और ग्रामीण और साधारण आर्थिक पृष्ठभूमि से है.

कोर्ट ने कहा ​कि आरोपी विवाहित है और दो छोटे बच्चे हैं और कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है.

कोर्ट ने कहा कि आरोपी को मानसिक बीमारी या हिंसक इतिहास नहीं मिला हैं.

कोर्ट ने कहा कि दंड तय करते समय इन तथ्यों की भी अनदेखी नहीं की जा सकती।

अंतिम फैसला

हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि आरोपी की दोषसिद्धि बरकरार रहेगी लेकिन फांसी की सजा समाप्त की जाती है.

आरोपी को शेष प्राकृतिक जीवन तक कारावास भुगतना होगा और अन्य धाराओं में दी गई सजाएं यथावत रहेंगी.

जनभावना से नहीं

डूंगरपुर की मासूम बच्ची के साथ हुई दरिंदगी ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया था। इस घटना के बाद आम जनता में दुष्कर्मी को तत्काल फांसी देने की मांग ने जोर पकड़ा था.

राजस्थान हाईकोर्ट ने भी अपने फैसले में आरोपी के कृत्य को बेहद जघन्य माना.

लेकिन राजस्थान हाईकोर्ट ने इस फैसले में स्पष्ट किया कि जघन्य अपराधों में भी अदालतें केवल जनभावना के आधार पर नहीं, बल्कि कानून, साक्ष्य और सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय सिद्धांतों के आधार पर सजा तय करती हैं।

हाईकोर्ट ने एक ओर दोषी को कठोर दंड दिया, वहीं दूसरी ओर “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” सिद्धांत का संतुलित उपयोग भी किया। ने आरोपी को

Case Detiels

RAJASTHAN HIGH COURT JODHPUR

JUSTICE VINIT KUMAR MATHUR & JUSTICE CHANDRA SHEKHAR SHARMA
(1) D.B. Murder Refrence No.2/2022
State Of Rajasthan Versus Jitendra @ Jitu S/o Sh. Narayan,

(2) D.B. Criminal Appeal (Db) No. 173/2022
Jitendra @ Jitu S/o Narayan Versus State Of Rajasthan,

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