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राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: फोटोकॉपी कागजों से जमीन पर नहीं मिलेगा हक

Rajasthan High Court Rules Photocopy Documents Cannot Establish Land Ownership Rights

हाईकोर्ट ने कहा- मूल दस्तावेज के बिना स्वामित्व दावा नहीं, अपर्याप्त स्टांप शुल्क वाली कॉपी न साक्ष्य बनेगी, न इम्पाउंड होगी

जयपुर। प्रदेश में संपत्ति विवाद, जमीन के एग्रीमेंट, पुराने सौदे और फोटोकॉपी दस्तावेजों के आधार पर मुकदमे लड़ रहे लोगों के लिए राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला दिया है।

अक्सर पक्षकार वर्षों पुराने दस्तावेजों की केवल फोटोकॉपी के आधार पर अदालत में दावा पेश करते हैं, लेकिन अब राजस्थान हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि फोटोकॉपी मात्र से स्वामित्व या अनुबंध सिद्ध नहीं होगा।

राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ में जस्टिस बिपिन गुप्ता की एकलपीठ ने संपत्ति विवादों और दस्तावेजी साक्ष्य से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि अपर्याप्त स्टांप शुल्क वाले दस्तावेज की मात्र फोटोकॉपी को न तो अदालत में साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है और न ही उसे इम्पाउंड (जब्त कर शुल्क वसूली हेतु भेजना) किया जा सकता है।

हाईकोर्ट ने कहा कि जब मूल दस्तावेज ही उपलब्ध नहीं है, तो उसकी फोटोकॉपी के आधार पर कानूनी अधिकार स्थापित नहीं किए जा सकते।

जस्टिस बिपिन गुप्ता की एकलपीठ ने कमलेश व अन्य की ओर से दायर याचिकाओं को खारिज करते हुए फैसला दिया है।

क्या था पूरा मामला?

मामला जयपुर जिले के विराटनगर क्षेत्र से जुड़ा है। याचिकाकर्ता कमलेश व अन्य ने वर्ष 2019 में सिविल कोर्ट में एक वाद दायर कर 12 मार्च 2003 के कथित एग्रीमेंट टू सेल (बिक्री समझौता) के आधार पर संपत्ति के विशिष्ट निष्पादन (Specific Performance) की मांग की थी।

याचिकाकर्ताओं का दावा था कि संबंधित जमीन के संबंध में विक्रय समझौता हुआ था, लेकिन उनके पास उस समझौते की मूल प्रति नहीं है।

उनके पास केवल उसकी फोटोकॉपी उपलब्ध है। इसलिए उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि उन्हें उस दस्तावेज को सेकेंडरी एविडेंस (द्वितीयक साक्ष्य) के रूप में पेश करने की अनुमति दी जाए।

ट्रायल कोर्ट ने क्यों ठुकराई मांग?

विराटनगर स्थित सिविल जज ने 11 फरवरी 2025 को याचिकाकर्ताओं की यह अर्जी खारिज कर दी। ट्रायल कोर्ट ने कहा कि जिस दस्तावेज को पेश किया जा रहा है, वह पर्याप्त स्टांप शुल्कयुक्त नहीं है और उसकी केवल फोटोकॉपी उपलब्ध है। ऐसे में उसे साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने दूसरी अर्जी लगाकर कहा कि उक्त दस्तावेज को इम्पाउंड कर उचित स्टांप शुल्क वसूला जाए, ताकि बाद में उसे साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जा सके।

लेकिन 26 अगस्त 2025 को यह अर्जी भी खारिज कर दी गई। ट्रायल कोर्ट ने कहा कि फोटोकॉपी दस्तावेज को इम्पाउंड नहीं किया जा सकता।

इस फैसले के खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आदेश को चुनौती दी।

हाईकोर्ट में क्या दलील दी गई?

हाईकोर्ट में याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि मूल दस्तावेज उनके पास नहीं है और संभवतः बिजली विभाग के रिकॉर्ड में उपलब्ध है। इसलिए फोटोकॉपी के आधार पर सेकेंडरी एविडेंस की अनुमति दी जानी चाहिए।

यह भी कहा गया कि जब दस्तावेज के अस्तित्व का संकेत है, तो उसकी फोटोकॉपी को स्टांप शुल्क जमा करवाकर वैध बनाया जा सकता है। इसलिए ट्रायल कोर्ट के आदेश रद्द किए जाएं।

प्रतिवादियों का कड़ा विरोध

प्रतिवादी पक्ष की ओर से अधिवक्ता Z.A. Naqvi, Sehban Naqvi, Rabiya Mateen और Sahil Khan ने कोर्ट में दलील दी कि कथित एग्रीमेंट टू सेल पूरी तरह फर्जी और मनगढ़ंत है। ऐसा कोई मूल समझौता कभी हुआ ही नहीं।

अधिवक्ताओं ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता दावा करते हैं कि दस्तावेज किसी विभाग के पास है, तो वे सूचना का अधिकार कानून (RTI) के तहत प्रमाणित प्रति प्राप्त कर सकते हैं या रिकॉर्ड मंगवा सकते हैं।

लेकिन केवल फोटोकॉपी के आधार पर दस्तावेज की वैधता स्वीकार नहीं की जा सकती।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने अपने विस्तृत फैसले में कहा कि भारतीय साक्ष्य कानून का मूल सिद्धांत है कि दस्तावेजों को प्राथमिक साक्ष्य यानी मूल प्रति से साबित किया जाए।

सेकेंडरी एविडेंस केवल विशेष परिस्थितियों में ही स्वीकार्य है।

कोर्ट ने कहा कि यदि कोई पक्ष सेकेंडरी एविडेंस देना चाहता है, तो उसे पहले यह साबित करना होगा कि मूल दस्तावेज वास्तव में अस्तित्व में था और उसका विधिवत निष्पादन हुआ था।

साथ ही यह भी कि मूल दस्तावेज उपलब्ध क्यों नहीं है और प्रस्तुत की गई प्रति असली दस्तावेज की सही प्रति है।

यदि ये बुनियादी शर्तें पूरी नहीं होतीं, तो फोटोकॉपी स्वीकार नहीं की जा सकती।

अपर्याप्त स्टांप शुल्क पर सख्त टिप्पणी

कोर्ट ने कहा कि राजस्थान स्टांप एक्ट, 1998 की धारा 35 के अनुसार, ऐसा दस्तावेज जिस पर देय स्टांप शुल्क पूरा नहीं है, उसे साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि मूल दस्तावेज ही अपर्याप्त स्टांप शुल्क वाला है और इसलिए inadmissible है, तो उसकी फोटोकॉपी को साक्ष्य में लेकर कानून की बाधा को दरकिनार नहीं किया जा सकता।

फोटोकॉपी इम्पाउंड नहीं हो सकती

कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत दोहराया कि इम्पाउंडिंग की प्रक्रिया मूल दस्तावेज पर लागू होती है, फोटोकॉपी पर नहीं।

अदालत ने कहा कि जब मूल दस्तावेज अदालत के समक्ष प्रस्तुत ही नहीं किया गया, तब केवल फोटोकॉपी को इम्पाउंड करने का प्रश्न ही नहीं उठता।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी हवाला

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि यह स्थापित कानून है कि केवल फोटोकॉपी पेश कर देना पर्याप्त नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि बिना मूल दस्तावेज के अस्तित्व और निष्पादन सिद्ध किए सेकेंडरी एविडेंस नहीं मिलेगी। कानूनन अपूर्ण दस्तावेज को परोक्ष तरीके से स्वीकार नहीं किया जा सकता।

दोनों रिट याचिकाएं खारिज

इन सभी तथ्यों और कानून की स्थिति पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने सही आदेश पारित किया था और उसमें किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि नहीं है।

इसलिए दोनों रिट याचिकाओं को मेरिट विहीन मानते हुए खारिज कर दिया गया।

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