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83 वर्षीय महिला से 80 लाख की ठगी: समझौते के बावजूद हाईकोर्ट ने आरोपी को जमानत देने से किया इनकार, बुजुर्ग महिला को दी बड़ी राहत

Rajasthan High Court Denies Bail in ₹80 Lakh Cyber Fraud Case Involving 83-Year-Old Woman Despite Settlement

कोर्ट ने कहा अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी रैकेट का गंभीर मामला, आरोपी का पिता भी शामिल, नहीं दी जा सकती जमानत; 34 म्यूल अकाउंट्स के जरिए दुबई तक पहुंचा पैसा

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने देश को झकझोर देने वाले एक बड़े और बहुचर्चित “डिजिटल अरेस्ट” के जरिए 83 वर्षीय बुजुर्ग महिला से करीब 80 लाख रुपये की ठगी करने के मामले में आरोपी को जमानत देने से इनकार कर दिया है।

ठगी करने के आरोपी नवीन टेमानी द्वारा मामले में बुजुर्ग महिला से समझौता करने के बावजूद राजस्थान हाईकोर्ट ने इसे बेहद गंभीर मामला मानते हुए जमानत देने से इनकार किया है।

हाईकोर्ट ने साफ कहा कि यह कोई साधारण विवाद नहीं है, जो समझौते के जरिए सुलझाया जा सकता है, बल्कि एक संगठित, अंतरराष्ट्रीय और समाज को प्रभावित करने वाला गंभीर आर्थिक अपराध है, जिसमें नरमी बरतना न्याय के साथ समझौता होगा।

अपराध का अंतरराष्ट्रीय स्वरूप

जस्टिस समीर जैन की एकलपीठ ने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए फैसला देते हुए कहा कि—

यह अपराध एक संगठित गिरोह द्वारा योजनाबद्ध तरीके से किया गया है, जिसमें कई स्तरों पर म्यूल अकाउंट्स (34 खातों) का उपयोग किया गया। इन अकाउंट्स के जरिए पैसे को विभिन्न चैनलों से घुमाकर हवाला के माध्यम से विदेश भेजा गया। यह अपराध का ट्रांसनेशनल (अंतरराष्ट्रीय) स्वरूप स्पष्ट करता है।

इसलिए यह कोई साधारण विवाद नहीं बल्कि एक गंभीर, संगठित और अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराध का मामला है, जिसमें आरोपी को किसी भी प्रकार की राहत देना न्यायहित के विपरीत होगा।

कोर्ट ने कहा कि यह मामला एक सुनियोजित “डिजिटल अरेस्ट” साइबर फ्रॉड का है, जिसमें 83 वर्षीय बुजुर्ग महिला को निशाना बनाया गया।

कोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि पीड़िता की उम्र और शारीरिक स्थिति उसे अत्यंत संवेदनशील और कमजोर वर्ग में रखती है, आरोपी ने इसी कमजोरी का फायदा उठाकर अपराध किया।

कोर्ट ने कहा कि 80 लाख रुपये की ठगी कोई सामान्य आर्थिक अपराध नहीं है।

well-organized crime

जस्टिस समीर जैन ने स्पष्ट कहा कि यह एक well-organized and deliberated criminal operation है, जिसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।

एकलपीठ ने कहा कि इस अंतरराष्ट्रीय मामले की जांच अभी महत्वपूर्ण और संवेदनशील चरण में है। कई आरोपी गिरफ्तार किए जा चुके हैं, लेकिन नेटवर्क पूरी तरह उजागर होना बाकी है।

कोर्ट ने कहा कि आरोपी से जुड़े इलेक्ट्रॉनिक उपकरण (मोबाइल, लैपटॉप, सिम कार्ड) की बरामदगी जरूरी है और पूरे षड्यंत्र (conspiracy) का खुलासा अभी बाकी है।

कोर्ट ने माना कि आरोपी की कस्टोडियल पूछताछ (custodial interrogation) आवश्यक है और अग्रिम जमानत देने से जांच प्रभावित हो सकती है।

समझौते पर कोर्ट का रुख

पूर्व में सुनवाई के दौरान कोर्ट के सख्त रवैये के बाद आरोपी नवीन टेमानी ने पीड़ित बुजुर्ग महिला से समझौता करते हुए 10 लाख रुपये देने की बात कही थी।

बाद में यह राशि 13.40 लाख तक जमा कराने की बात कही गई।

हाईकोर्ट ने इस समझौते को खारिज करते हुए कहा कि यह समझौता आरोपी द्वारा स्वयं हस्ताक्षरित नहीं है। पीड़िता की आर्थिक और मानसिक स्थिति को देखते हुए यह समझौता स्वेच्छा से नहीं बल्कि मजबूरी में किया गया है।

कोर्ट ने कहा कि यह मामला केवल निजी या सिविल विवाद नहीं बल्कि गंभीर आर्थिक अपराध है।

कोर्ट ने कहा कि संगठित और गंभीर आर्थिक अपराधों में समझौते के आधार पर राहत नहीं दी जा सकती, क्योंकि इनका प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है।

कोर्ट ने कहा कि—

ऐसे साइबर अपराध विशेष रूप से अनजान और बुजुर्ग लोगों को निशाना बनाते हैं।यह अपराध समाज में भय और असुरक्षा का माहौल पैदा करते हैं। यदि ऐसे मामलों में नरमी बरती गई, तो यह गलत संदेश देगा।

हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में सख्त दृष्टिकोण अपनाना अनिवार्य है।

इस संहिता में निहित कोई भी प्रावधान ऐसा नहीं माना जाएगा जो उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों को सीमित या प्रभावित करे, जिससे वह इस संहिता के अंतर्गत किसी आदेश को प्रभावी बनाने, किसी न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने या अन्यथा न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति सुनिश्चित करने हेतु आवश्यक आदेश पारित कर सके।

जमानत खारिज

हाईकोर्ट ने कहा कि अपराध अत्यंत गंभीर है और आरोपी की भूमिका प्रमुख (key conspirator) के रूप में सामने आई है। जांच अभी जारी है, इसलिए आरोपी को अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती।

बुजुर्ग महिला की मानवीय मदद

हाईकोर्ट ने हालांकि आरोपी की जमानत याचिका को खारिज कर दिया, लेकिन इस मामले में पीड़िता की स्थिति को देखते हुए महत्वपूर्ण आदेश दिया है।

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को आदेश दिया है कि इस मामले में समझौते से आरोपी से जब्त की गई ₹13.40 लाख की राशि को पीड़िता को एक सप्ताह में जारी करने पर विचार करें।

हाईकोर्ट ने इसके साथ राज्य सरकार को भी आदेश दिया है कि वह पीड़िता को हर संभव सहायता प्रदान करे।

यह है पूरा मामला

यह पूरा मामला एक सुनियोजित साइबर फ्रॉड नेटवर्क का हिस्सा है, जिसमें बुजुर्ग महिला को डिजिटल माध्यम से डराकर, मानसिक दबाव डालकर और “डिजिटल अरेस्ट” का झांसा देकर उसके बैंक खाते से करीब 80 लाख रुपये ट्रांसफर करवा लिए गए।

जांच में खुलासा हुआ कि ठगी की रकम को सीधे नहीं रखा गया, बल्कि उसे कई लेयर्स में घुमाया गया। पहले अलग-अलग बैंक खातों (म्यूल अकाउंट्स) में भेजा गया, फिर हवाला के जरिए विदेश ट्रांसफर किया गया और अंत में दुबई तक रकम पहुंचाई गई।

पुलिस का आरोप है कि आरोपी नवीन टेमानी इस पूरे नेटवर्क का मास्टरमाइंड (Kingpin) है और ठगी की रकम से Bitcoin और USDT जैसी क्रिप्टोकरेंसी खरीदी गई। इसमें कुल 34 म्यूल अकाउंट्स का इस्तेमाल हुआ और इस गिरोह से जुड़ी 187 से अधिक शिकायतें दर्ज हैं।

राज्य पक्ष ने कोर्ट को बताया कि यह एक अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी सिंडिकेट है, जो तकनीक और वित्तीय तंत्र का दुरुपयोग कर बड़े स्तर पर अपराध कर रहा है।

व्हीलचेयर पर पहुंची थी पीड़िता, कोर्ट भी भावुक

इस मामले में सबसे मार्मिक दृश्य तब सामने आया जब 83 वर्षीय पीड़िता व्हीलचेयर पर कोर्ट में पेश हुईं।

हाईकोर्ट ने पीड़िता की स्थिति देखते हुए राज्य के डीजीपी को वीसी के जरिए पेश होने के आदेश दिए थे।

कोर्ट में महिला ने कहा था कि उनके पास इलाज और दवाइयों के लिए पैसे नहीं बचे और वह केवल ₹35,000 मासिक पेंशन पर निर्भर हैं।

समझौते पर पीड़ित महिला ने कहा था कि आर्थिक और मानसिक दबाव में उन्होंने समझौते पर सहमति दी थी।

उन्होंने साफ कहा कि यह समझौता मजबूरी में किया गया, न कि स्वेच्छा से।

मामले की सुनवाई के दौरान राज्य के डीजीपी राजीव कुमार शर्मा, डीआईजी साईबर क्राइम शांतनुसिंह, एसपी साईबर सुमति मेहरड़ा वीसी के जरिए मौजूद रहें है।.

राज्य सरकार की ओर से GA-cum-AAG राजेश चौधरी, AAAG अमनकुमार, PP विवेक शमा, मानवेन्द्र सिंह शेखावत ने पैरवी की

याचिकाकर्ता आरोपी की ओर से अधिवक्ता अमित जिंदल और हेमंत विजय ने पैरवी

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