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हाईकोर्ट ने दिव्यांगता प्रमाण-पत्रों की दोबारा जांच को दी मंजूरी, कहा-विभाग फर्जी प्रमाण-पत्रों की जांच कर सकता है, लेकिन बार-बार उत्पीड़न नहीं।

Rajasthan High Court Upholds Reassessment of Fake Disability Certificates in Teacher Recruitment Scam

जयपुर। राजस्थान में सरकारी नौकरियों में फर्जी दिव्यांगता प्रमाण-पत्रों की सरकार द्वारा जांच के मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने एक बार फिर से यह स्पष्ट कर दिया है कि सरकार को इन प्रमाण-पत्रों की जांच करने का अधिकार है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने खासकर शिक्षक भर्ती में दिव्यांग कोटे में एक महत्वपूर्ण याचिका पर फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार को दिव्यांग प्रमाण-पत्रों की दोबारा जांच का अधिकार दिया है।

टोंक जिले के कुलदीप चौधरी की ओर से दायर याचिका पर जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकलपीठ ने फैसला सुनाते हुए साफ कहा कि विभाग फर्जी प्रमाण-पत्रों की जांच कर सकता है, लेकिन बार-बार उत्पीड़न नहीं।

यह फैसला उस बड़े घोटाले के बीच आया है, जहां एसओजी की जांच में दर्जनों शिक्षकों के प्रमाण-पत्र फर्जी पाए गए। कुलदीप चौधरी ने अपनी नौकरी बचाने की कोशिश की, लेकिन कोर्ट ने RPwD एक्ट के तहत प्रक्रिया का पालन करने पर जोर दिया।

क्या है मामला

राजस्थान में पिछले कुछ वर्षों से शिक्षक भर्ती में PH कोटे का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग सामने आया है।

2025 में शुरू हुई एसओजी जांच में 29 कर्मचारियों की मेडिकल जांच हुई, जिसमें सिर्फ 5 को 40% से अधिक दिव्यांगता मिली। बाकी 24 फर्जी साबित हुए।

कुलदीप चौधरी, टोंक के बंसेरा गांव के निवासी, ने लो विजन कैटेगरी में 60% स्थायी विकलांगता का प्रमाण-पत्र दिखाकर टीचर लेवल-1 की नौकरी पाई।

लेकिन 19 नवंबर 2025 को विभाग ने री-मेडिकल के आदेश दिए।

याचिका में उन्होंने दावा किया कि पहले ही कोर्ट के निर्देश पर JLN अस्पताल, अजमेर की मेडिकल बोर्ड ने 40% से अधिक पाया था।

एसओजी ने भी शिकायत पर जांच शुरू की, जिसमें डिप्टी एसपी, ब्यावर ने उन्हें पूछताछ के लिए बुलाया। याचिकाकर्ता ने इसे उत्पीड़न बताया।

हाईकोर्ट ने इस मामले में पुलिस जांच पर रोक लगाने से इनकार किया है लेकिन यह भी कहा कि जांच के नाम पर प्रताड़ित नहीं किया जाना चाहिए।

कोर्ट का विस्तृत फैसला

जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकलपीठ ने अपने फैसले में कहा कि राज्य सरकार या भर्ती एजेंसी किसी भी समय विकलांगता का पुनर्मूल्यांकन करा सकती है।

कोर्ट ने कहा कि प्रमाण-पत्र RPwD एक्ट 2016 के चैप्टर-10 के तहत बेंचमार्क डिसेबिलिटी साबित होनी चाहिए और ऐसे प्रमाण-पत्र मान्यता प्राप्त बोर्ड द्वारा जारी किए होने चाहिए।

हाईकोर्ट ने रामप्रकाश खरलवा फैसले का हवाला देते हुए कहा कि फर्जी प्रमाण-पत्र पर कोई सुरक्षा नहीं। केवल भारत सरकार के दिशानिर्देशों से मान्य बोर्ड का प्रमाण-पत्र वैध।

कोर्ट ने कहा कि विभाग पुन: जांच के बाद कार्रवाई कर सकता है, जैसे नौकरी समाप्ति।

हालांकि, कोर्ट ने चेतावनी दी कि विभाग द्वारा जांच के बाद फिर बार-बार नहीं बुलाना चाहिए। अगर पुलिस जांच में उत्पीड़न हो, तो BNSS की धारा 528 या क्रिमिनल रिट दाखिल करें।

राज्यव्यापी घोटाले का खुलासा

2025-26 में एसओजी ने 44 कर्मचारियों पर केस दर्ज किए, जिनमें 3 डॉक्टर शामिल। सिरोही, बीकानेर, बूंदी जैसे जिलों में फर्जी प्रमाण-पत्र बांटे गए। बीकानेर में 3 प्रोफेसरों पर डमी कैंडिडेट से प्रमाण-पत्र लेने का आरोप।

पूर्ववर्ती सरकार में 90% PH कोटे के शिक्षक फर्जी निकले। वर्तमान सरकार ने कमेटी बनाकर कार्रवाई तेज की। RPSC जैसे संस्थानों में भी घुसपैठ हुई।

जोधपुर-जयपुर बेंच में दर्जनों याचिकाएं लंबित हैं। सरकार ने SMS अस्पताल, जयपुर जैसे बोर्डों को निर्देश दिए।

कानूनी प्रावधान और चुनौतियां

RPwD एक्ट 2016 के सेक्शन 56-57 के तहत प्रमाण-पत्र केवल नामित अथॉरिटी जारी करेगी। 40% से अधिक बेंचमार्क डिसेबिलिटी जरूरी। कोर्ट ने अनुच्छेद 14, 16, 21 का हवाला देकर समानता पर जोर दिया।

चुनौती यह है कि जांच में देरी से नौकरी प्रभावित होती है। असली दिव्यांगों को कोटा मिलना चाहिए, लेकिन फर्जीवाड़ा से आरक्षण का अपमान हो रहा। विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल सत्यापन और केंद्रीकृत बोर्ड जरूरी।

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