8 अप्रैल तक पालन नहीं होने पर अधिकारी को किया था तलब, डेढ़ साल की देरी के बाद दबाव में हुआ चयन
जयपुर। अदालतों के अवमानना नोटिस के बाद राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों की नींद खुलती है, उससे पहले वे तब तक अदालती आदेशों की पालना नहीं करते या फिर उसमें देरी करते हैं, जब तक अभ्यर्थी पूरी तरह से थक न जाए।
ऐसे ही एक मामले में राजस्थान हाईकोर्ट की सख्ती और अवमानना नोटिस के बाद राज्य के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग ने एक याचिकाकर्ता को लैब टेक्नीशियन पद पर चयनित किया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में अधिकारियों को अंतिम चेतावनी देते हुए 8 अप्रैल तक आदेश का पालन नहीं होने पर अधिकारी को कोर्ट में तलब किया था।
यह मामला लंबे समय से लंबित आदेश की अनुपालना से जुड़ा हुआ था, जिस पर हाईकोर्ट ने 12 मार्च 2026 को सुनवाई करते हुए सरकार को कड़ी फटकार लगाई थी।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी और अंतिम चेतावनी
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया था कि राज्य सरकार द्वारा पहले पारित आदेश की पालना अब तक नहीं की गई है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि 15 दिन के भीतर आवश्यक अनुपालन नहीं किया गया तो चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के निदेशक (गैर-राजपत्रित) को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना पड़ेगा।
जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने मामले की अगली सुनवाई 8 अप्रैल 2026 तय की थी और इसे अंतिम अवसर तय किया था।
राजस्थान हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता संतोष के पक्ष में 12 दिसंबर 2024 को फैसला देते हुए नियुक्ति देने के आदेश दिए थे।
इस मामले में राज्य सरकार की ओर से खंडपीठ में की गई अपील भी खारिज कर दी गई थी।
सरकार ने खंडपीठ के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने के निर्णय की प्रक्रिया में होने की बात कही।
लेकिन डेढ़ साल बाद भी ऐसा नहीं हुआ और न ही याचिकाकर्ता का चयन ही किया गया था।
जिस पर अधिवक्ता के जरिए अवमानना याचिका दायर की गई।
जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने मेडिकल डायरेक्टर को 15 दिन में याचिकाकर्ता को नियुक्ति देने के आदेश देते हुए 8 अप्रैल को मामले को सुनवाई के लिए तय किया था।
इसके साथ ही आदेश की पालना नहीं होने पर 8 अप्रैल को डायरेक्टर को पेश होने के आदेश दिए थे।
सुनवाई से एक दिन पूर्व ही विभाग ने याचिकाकर्ता का चयन करते हुए पत्र जारी किया।
अधिकारी पर दबाव आया तो हो गया चयन
हाईकोर्ट की इस सख्ती और संभावित अवमानना कार्रवाई के दबाव में स्वास्थ्य विभाग ने समय सीमा के भीतर कार्रवाई करते हुए याचिकाकर्ता संतोष चौहान का लैब टेक्नीशियन पद पर चयन कर दिया।
दिनांक 07 अप्रैल 2026 को स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर, जयपुर द्वारा जारी आदेश में स्पष्ट रूप से संतोष चौहान का चयन दर्ज किया गया है, जिसमें उनके आवेदन, श्रेणी और प्राप्त अंकों का विवरण भी शामिल है।
अधिवक्ता स्वप्निल सिंह पटेल ने की प्रभावी पैरवी
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में अधिवक्ता स्वप्निल सिंह पटेल ने मजबूती से पक्ष रखा। उन्होंने कोर्ट को बताया कि राज्य सरकार द्वारा आदेश की पालना में लगातार देरी की जा रही है, जिससे याचिकाकर्ता को न्याय नहीं मिल पा रहा था।
उनकी प्रभावी दलीलों के बाद ही कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया और प्रशासन को स्पष्ट चेतावनी दी।
अदालत की सख्ती का असर
यह मामला एक बार फिर साबित करता है कि न्यायपालिका की सख्ती और अवमानना की कार्यवाही का डर प्रशासन को आदेशों के पालन के लिए बाध्य करता है।
जहां एक ओर आला अधिकारियों ने पहले आदेश की अनदेखी की, वहीं कोर्ट की चेतावनी के बाद तत्काल कार्रवाई करते हुए चयन प्रक्रिया पूरी करनी पड़ी।
यह निर्णय न केवल याचिकाकर्ता के लिए न्याय सुनिश्चित करता है, बल्कि भविष्य में प्रशासनिक जवाबदेही को भी मजबूत करता है।