जयपुर। राजस्थान में पंचायत और नगर निकाय चुनावों को लेकर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है।
राज्य सरकार ने चुनाव टालने के लिए हाईकोर्ट में प्रार्थना पत्र दायर कर साफ संकेत दिया है कि दिसंबर 2026 से पहले चुनाव कराना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।
सरकार ने अदालत से समय देने की मांग की है
वहीं, अदालत पहले ही 15 अप्रैल तक चुनाव कराने के निर्देश दे चुकी है—ऐसे में अब यह मामला न्यायपालिका बनाम कार्यपालिका की संवेदनशील स्थिति बन गया है।
मामला क्या है?
राजस्थान में पंचायतों और शहरी निकायों का कार्यकाल समाप्ति की ओर है और कई पंचातयों का कार्यकाल पहले ही समाप्त हो चुका हैं.
संविधान के अनुसार स्थानीय निकायों के चुनाव समय पर कराना अनिवार्य है। इसी को लेकर पूर्व विधायक संयम लोढ़ा और गिर्राज देवंदा ने हाईकोर्ट में जनहित याचिकाएं दायर की थीं।
इन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को 15 अप्रैल 2026 तक चुनाव कराने के निर्देश दिए थे।
अब सरकार ने उसी आदेश को लेकर असमर्थता जताते हुए विस्तृत प्रार्थना पत्र पेश किया है।
सरकार का विस्तृत पक्ष: “स्थिति हर महीने अलग, अभी चुनाव असंभव”
महाधिवक्ता राजेन्द्र प्रसाद द्वारा दायर प्रार्थना पत्र में सरकार ने महीने-दर-महीने परिस्थितियों का हवाला देते हुए बताया कि
अप्रैल–मई: परीक्षाएं, स्कूल स्टाफ की व्यस्तता
जून–जुलाई: गर्मी और प्रशासनिक पुनर्संरचना
अगस्त–सितंबर: त्योहार और अन्य प्रशासनिक कार्य
अक्टूबर–दिसंबर: कई निकायों का कार्यकाल समाप्त हो रहा हैं
सरकार का तर्क है कि इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए चुनाव दिसंबर के बाद कराना ही व्यावहारिक और प्रभावी होगा।
“वन स्टेट, वन इलेक्शन” की रणनीति
सरकार ने अपने प्रार्थना पत्र में एक बड़ा प्रशासनिक तर्क दिया है कि सभी पंचायत और निकाय चुनाव एक साथ कराने की योजना इससे खर्च में कमी आएगी, प्रशासनिक मशीनरी पर दबाव घटेगा और मतदाता सहभागिता बढ़ेगी.
सरकार का कहना है कि अक्टूबर से दिसंबर के बीच जब सभी संस्थाओं का कार्यकाल खत्म होगा, तब एक साथ चुनाव कराना बेहतर रहेगा।
ओबीसी आरक्षण: सबसे बड़ा कानूनी पेच
इस पूरे मामले का सबसे संवेदनशील पहलू ओबीसी आरक्षण बताते हुए सरकार ने दलील दी हैं कि 9 मई 2025 को ओबीसी आयोग का गठन किया गया हैं और आयोग ने डेटा संग्रह और रिपोर्ट के लिए कई बार समय मांगा हैं और रिपोर्ट अभी लंबित है
सरकार ने कहा कि बिना इस रिपोर्ट के सीटों का पुनर्निर्धारण संभव नहीं हैं और
आरक्षण लागू नहीं किया जा सकता.
सरकार ने स्पष्ट कहा: “बिना आरक्षण तय किए चुनाव कराना सामाजिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ होगा और यह अदालत में चुनौती का कारण बन सकता है।”
चुनावी मशीनरी: आंकड़ों में बड़ी चुनौती
सरकार ने चुनाव कराने में आने वाली लॉजिस्टिक कठिनाइयों का विस्तृत ब्यौरा भी दिया.
सरकार के अनुसार शहरी क्षेत्र में 22,891 मतदान केंद्रों पर 1,14,455 कर्मचारी आवश्यकता होगी.
वही ग्रामीण क्षेत्र के 45,380 मतदान केंद्र पर करीब 2,26,900 कर्मचारी आवश्यकता होगी.
सरकार ने कहा कि कुल मिलाकर 3.4 लाख से अधिक कर्मचारियों की जरूरत, भारी संख्या में ईवीएम मशीनें और उनका प्रबंधन में काफी समय लगेगा.
सरकार का कहना है कि इतनी बड़ी व्यवस्था को अचानक तैयार करना संभव नहीं है।