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“हर बार बोलने से पहले ये सोचना कि कैसे बोलें-यही तो वो अनकहा दबाव है।”-प्रियंका बोराणा

Before Saying “My Lords”: The Unspoken Struggles of Women Lawyers in Courtrooms

स्पेस बनाने से लेकर भरोसा जीतने तक-महिला अधिवक्ता के लिए हर दिन की अनकही चुनौतियों का सच

……….

क्या matter है, Priyanka?
“Ma’am/Sir…”
“हाँ, बताइए…”

The moment you say My Lords

एक पल के लिए सब शांत हो जाता है। नज़रें आपकी तरफ उठती हैं। हाथ में फाइल है या नहीं-उस क्षण में फर्क नहीं पड़ता। कभी फाइल होते हुए भी पेज ढूंढने का वक्त नहीं मिलता, और कभी बिना फाइल के भी तुरंत बोलना पड़ता है।

अब सिर्फ आप हैं और आपकी आवाज़। आप खड़ी होती हैं, बोलना शुरू करती हैं… और उसी क्षण आपको महसूस होता है कि ये सिर्फ एक argument नहीं है, ये एक presence है—जिसे आपको भरना है।

लेकिन एक महिला वकील के लिए, यह पल सिर्फ इतना नहीं होता। इसमें एक और परत होती है-अनकही, लेकिन बहुत वास्तविक। आपके मन में साथ-साथ दो बातें चल रही होती हैं-क्या कहना है… और कैसे कहना है।

कितनी दृढ़ता से अपनी बात रखूँ कि ठीक रहे?

कितनी बार बीच में बोलूँ कि मेरी बात पूरी हो जाए?

कहाँ रुक जाना चाहिए ताकि लगे मैं “ज़्यादा” नहीं हो रही?

“कोर्ट में सिर्फ कानून नहीं बोला जाता, कई बार खुद को भी साबित करना पड़ता है—बार-बार, हर दिन।”

ये कोई एक दिन की बात नहीं है। ये हर रोज़ के छोटे-छोटे पलों में होता है।

कोर्टरूम के अवलोकनों और विभिन्न रिपोर्ट्स में यह बात सामने आई है कि महिला वकीलों को अक्सर ज़्यादा interruptions का सामना करना पड़ता है, या उनकी दलीलों पर जल्दी सवाल उठाए जाते हैं। यह हर बार दिखाई नहीं देता, लेकिन बार-बार होने पर एक pattern बन जाता है।

ऐसे ही एक मामले में, एक महिला वकील अपनी दलील रख रही थीं। बीच में उन्हें रोका गया-जो कि प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन उन्होंने बिना झिझक कहा-“My Lords, just one clarification…” और अपनी बात पूरी की। फर्क सिर्फ इतना था कि उन्हें वह जगह खुद बनानी पड़ी, जो कई बार दूसरों को सहज मिल जाती है।

एक अन्य अवसर पर, एक युवा महिला अधिवक्ता अपना point रख रही थीं। अदालत का ध्यान क्षणभर के लिए आगे बढ़ गया। उन्होंने विनम्रता से कहा-“My Lords, if I may just complete…” और अपनी बात पूरी की।

ऐसे moments छोटे लगते हैं, लेकिन यहीं अंतर दिखाई देता है-किसी को अपनी बात कहने के लिए सिर्फ बोलना होता है, और किसी को पहले वह space बनानी पड़ती है।

“आवाज़ वही होती है, लेकिन सुनने का तरीका बदल जाता है-जब बोलने वाली एक महिला वकील हो।”

यह अंतर केवल courtroom तक सीमित नहीं है। कई पेशेवर अनुभव यह भी दर्शाते हैं कि opportunities की शुरुआत में ही एक subtle divide बन जाता है-महत्वपूर्ण briefs, high-stakes matters या strategy-driven cases अक्सर चुनिंदा हाथों में जाते हैं। इससे exposure और visibility का अंतर धीरे-धीरे और गहरा हो जाता है।

इसके साथ ही एक और अनकहा पहलू जुड़ा होता है-credibility का। कई बार एक पुरुष वकील की बात को सहज रूप से स्वीकार कर लिया जाता है, जबकि एक महिला वकील को पहले अपनी तैयारी और अपने दृष्टिकोण के माध्यम से वही विश्वास अर्जित करना पड़ता है।

Client perception भी इस प्रक्रिया को प्रभावित करता है। कुछ परिस्थितियों में अब भी यह धारणा देखने को मिलती है कि “authority” एक विशेष तरीके से दिखती है-और उस धारणा को बदलने के लिए अतिरिक्त प्रयास करना पड़ता है।

और फिर courtroom के बाहर का एक और संसार है-जहाँ informal networking, professional circles और visibility का अपना महत्व है। ये spaces अक्सर structured नहीं होते, और यही कारण है कि उनमें समान भागीदारी अपने आप नहीं बन पाती।

“कई बार चुनौती सिर्फ बोलने की नहीं होती, बल्कि वहाँ तक पहुँचने की होती है जहाँ आपकी आवाज़ सुनी जाए।”

कई अध्ययन और पेशेवर अनुभव यह भी दर्शाते हैं कि महिला वकीलों को अक्सर ज़्यादा scrutiny का सामना करना पड़ता है-उनकी तैयारी, उनके tone और उनके व्यवहार तक पर। यह bias हमेशा स्पष्ट नहीं होता, बल्कि subtle रूप में सामने आता है-interruptions में, reactions में, expectations में।

और धीरे-धीरे, बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण के, यह एक सीख बन जाती है।

आप सीख जाती हैं कि कब रुकना है, कब बोलना है, कब चुप रह जाना ही बेहतर है।
आप अपनी दलील से पहले अपना स्वर तय करती हैं।
आप अपने तर्क से पहले अपना अंदाज़ सोचती हैं।
और कई बार… आप सही होते हुए भी खुद को थोड़ा रोक लेती हैं।

“कई बार बहस कानून की नहीं होती, इस बात की होती है कि आपको कितना ‘ज़्यादा’ नहीं लगना है।”

सबसे दिलचस्प बात यह है कि ये कहीं लिखा नहीं है। किसी कानून में नहीं, किसी नियम में नहीं, किसी किताब में नहीं-फिर भी, हर महिला वकील इसे महसूस करती है।

तो सवाल यह है-ऐसा होता क्यों है?

शायद इसलिए क्योंकि हमने दरवाज़े तो खोल दिए हैं, लेकिन कमरे का माहौल अब भी पूरी तरह नहीं बदला है। महिलाएँ आज अदालतों में हैं-दलील दे रही हैं, मुकदमे लड़ रही हैं, अपनी जगह बना रही हैं। लेकिन उनके लिए जो अपेक्षाएँ हैं, वे अब भी पूरी तरह निष्पक्ष नहीं हैं।

हमने प्रवेश तो दे दिया, लेकिन स्वीकार्यता अभी भी विकसित हो रही है। यही वह कमी-वह lacuna-है, जो दिखाई नहीं देता, लेकिन हर दिन महसूस होता है।

यह कमी कानून की नहीं है, सोच की है। यह नियमों में नहीं, बल्कि नज़रिए में है। जब तक अधिकार को बिना सोचे-समझे स्वीकार करना नहीं सीखा जाएगा-चाहे वह किसी भी व्यक्ति से आए-तब तक यह अंतर बना रहेगा।

“शब्द वही होते हैं, तर्क वही होते हैं-पर उनके पीछे खड़ी पहचान बदल जाए तो मायने भी बदल जाते हैं।”

एक महिला वकील अदालत में सिर्फ कानून का अभ्यास नहीं करती-वह अपनी जगह भी तय करती है। वह समझती है कि कब मजबूती से अपनी बात रखनी है, कब उसे थोड़ा नरम रखना है, कब अपनी बात पर टिके रहना है और कब विराम लेना है।

यह केवल समायोजन नहीं है-यह एक शांत, लेकिन मजबूत क्षमता है, जो अनुभव से आती है।

लेकिन सच यह भी है कि समानता का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि हम स्वयं को ढालना सीख जाएँ। समानता तब होगी, जब ढलने की जरूरत ही खत्म हो जाए।

“हर बार बोलने से पहले ये सोचना कि कैसे बोलें-यही तो वो अनकहा दबाव है।”

और शायद बराबरी तब होगी…

“जब बोलने से पहले ये सोचना ही न पड़े कि ‘कैसे’ बोलना है।”

“तब तक, अदालतें हमें ऐसे अनुभव देती रहेंगी-जो किसी किताब का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन हर दिन की प्रैक्टिस का हिस्सा बन जाते हैं।”

प्रियंका बोराणा

राजस्थान हाईकोर्ट की युवा और प्रतिष्ठित अधिवक्ता, जिनका नाम लगातार उभरता हुआ देखा जा रहा है। वे आपराधिक, वैवाहिक और दीवानी मामलों में विशेषज्ञता रखती हैं और अपने गंभीर दृष्टिकोण और न्याय के प्रति समर्पण के लिए जानी जाती हैं। प्रियंका बोराणा जोधपुर हाईकोर्ट की लीगल सर्विसेज़ अथॉरिटी कमिटी की सदस्य भी हैं और विशेष रूप से महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर अपनी बेबाक राय और संवेदनशील दृष्टिकोण के लिए पहचानी जाती हैं।

यहां दिए जाने वाले विचार लेखक ​के निजी विचार हैं.

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