अंबेडकर जयंती पर राजस्थान हाईकोर्ट में मेगा डॉक्यूमेंट्री प्रतियोगिता के उद्घाटन समारोह में जस्टिस अशोक कुमार जैन का संबोधन
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट में आयोजित कार्यक्रम में जस्टिस अशोक कुमार जैन ने भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती के अवसर पर उनके जीवन, संघर्ष और संवैधानिक योगदान को याद करते हुए कहा कि आज हम उस महान व्यक्तित्व का जन्मदिन मना रहे हैं, जिन्होंने समाज में व्याप्त भेदभाव को न केवल समझा, बल्कि उसे समाप्त करने के लिए संविधान के माध्यम से एक नई दिशा प्रदान की।
उन्होंने कहा कि हम सौभाग्यशाली हैं कि ऐसे देश में रह रहे हैं जहाँ कानून सर्वोपरि है और हमारा संविधान यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी व्यक्ति के साथ धर्म, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव न हो।
विशेष रूप से अनुच्छेद 15 का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह प्रावधान समानता और न्याय की भावना को सशक्त करता है।
एक कहानी से कानून की शुरुआत
अपने उद्बोधन को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने एक मार्मिक प्रसंग साझा किया—
एक छोटा बच्चा, अपनी कक्षा के बाहर बैठा है। तेज धूप में प्यासा, वह देखता है कि बाकी बच्चे पानी पी रहे हैं। लेकिन उसे पानी के घड़े को छूने की अनुमति नहीं है। उसे इंतजार करना पड़ता है किसी “स्वीकार्य” व्यक्ति का, जो उसे ऊपर से पानी पिलाए…
कई दिनों तक कोई नहीं आता, और वह बच्चा प्यासा ही रह जाता है।
वह बच्चा था — डॉ. भीमराव अंबेडकर।
जस्टिस जैन ने कहा, यह केवल एक घटना नहीं, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था का प्रतिबिंब है जहाँ एक बच्चे को उसके मूलभूत अधिकार से वंचित किया गया।
यही वह पीड़ा थी जिसने अंबेडकर को सामाजिक असमानता के खिलाफ संघर्ष के लिए प्रेरित किया।
शुरुआती जीवन: अन्याय से न्याय तक की यात्रा
डॉ. अंबेडकर का बचपन भेदभाव और अपमान से भरा था। उन्हें स्कूल में अलग बैठाया जाता था, अपनी बैठने के लिए बोरी लानी पड़ती थी और वे मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित रहते थे।
उन्होंने संस्कृत पढ़ने की इच्छा जताई, लेकिन सामाजिक कुरीतियों के कारण उन्हें यह अवसर नहीं मिला और उन्हें मजबूरन फारसी विषय चुनना पड़ा।
जस्टिस जैन ने कहा कि ये घटनाएँ उन्हें तोड़ नहीं सकीं, बल्कि और अधिक मजबूत बनाती गईं।
शिक्षा: संघर्ष से शक्ति तक
अंबेडकर ने मुंबई विश्वविद्यालय से लेकर कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स तक शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने कानून, अर्थशास्त्र, राजनीति और समाजशास्त्र में गहन अध्ययन किया।
उनका प्रसिद्ध संदेश — “शिक्षित बनो, संगठित हो, संघर्ष करो” आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
सामाजिक संघर्ष और न्याय की लड़ाई
भारत लौटने के बाद भी उन्हें जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा। बड़ौदा में उन्हें रहने के लिए स्थान नहीं मिला। वकालत के शुरुआती दिनों में भी उन्हें स्वीकार नहीं किया गया।
फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी और समाज में न्याय स्थापित करने के लिए संघर्ष जारी रखा।
1927 में महाड़ सत्याग्रह के माध्यम से उन्होंने दलितों के पानी के अधिकार के लिए आंदोलन किया। यह केवल आंदोलन नहीं, बल्कि अधिकार की कानूनी मांग थी।
संविधान: न्याय की मजबूत नींव
जस्टिस जैन ने कहा कि डॉ. अंबेडकर ने केवल विरोध नहीं किया, बल्कि व्यवस्था को सुधारने का मार्ग चुना। उन्होंने भारतीय संविधान के माध्यम से समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के सिद्धांतों को स्थापित किया।
उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि हर नागरिक को समान अधिकार मिले, अस्पृश्यता का उन्मूलन हो, कमजोर वर्गों को संरक्षण मिले और संवैधानिक नैतिकता और सिद्धांतों की शक्ति मिले।
डॉ. अंबेडकर का मानना था कि “संवैधानिक नैतिकता स्वाभाविक नहीं होती, इसे विकसित करना पड़ता है।”
उन्होंने पद से अधिक सिद्धांतों को महत्व दिया। हिंदू कोड बिल पारित न होने पर उन्होंने कानून मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
जस्टिस जैन ने कहा कि कानून केवल किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज को बदलने का सबसे प्रभावी माध्यम है। यह कमजोर वर्गों को सशक्त बनाता है।
भविष्य के न्याय संरक्षकों के लिए संदेश
अंत में जस्टिस जैन ने युवाओं और कानून के विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा, आप भविष्य के न्याय के संरक्षक हैं।
याद रखें, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व केवल शब्द नहीं, बल्कि जीवन के आदर्श हैं।
डॉ. अंबेडकर का जीवन हमें सिखाता है कि कानून केवल पढ़ने की चीज नहीं, बल्कि समाज को बदलने का एक शक्तिशाली माध्यम है।
अब प्रश्न यह है, क्या आप केवल कानून सीखेंगे… या उससे जीवन बदलेंगे?
