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‘टूटे रिश्ते को ढोना भी मानसिक क्रूरता-लंबे समय से अलग रहना भी तलाक का आधार : तलाक मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

Supreme Court Says Long Separation Can Amount To Mental Cruelty In Divorce Cases

जयपुर/नई दिल्ली: राजस्थान से जुड़े एक वैवाहिक विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि पति-पत्नी लंबे समय तक अलग रह रहे हों, रिश्ते में भावनात्मक जुड़ाव पूरी तरह खत्म हो चुका हो और साथ आने की कोई वास्तविक संभावना न बची हो, तो ऐसे रिश्ते को जबरन जारी रखना दोनों पक्षों के लिए मानसिक क्रूरता बन सकता है।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा दिए गए तलाक के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि अदालतें केवल इस आधार पर किसी विवाह को अनिश्चितकाल तक जारी रखने पर जोर नहीं दे सकतीं कि कानूनी रूप से शादी अभी भी अस्तित्व में है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि:

“लंबे समय तक अलग रहना, मेल-मिलाप की कोई वास्तविक कोशिश न होना, साथ रहना पूरी तरह बंद हो जाना और भावनात्मक दूरी मानसिक क्रूरता का आधार बन सकती है।”

अदालत ने यह भी कहा कि कई बार रिश्ते केवल कागजों पर बचे रह जाते हैं और ऐसे मृत हो चुके रिश्तों को जबरन ढोना दोनों पक्षों के मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक जीवन पर गंभीर असर डाल सकता है।

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फैमिली कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक का सफर

मामला राजस्थान के एक डॉक्टर दंपती से जुड़ा था।

पति ने वर्ष 2009 में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत मानसिक क्रूरता के आधार पर तलाक की याचिका दायर की थी। पति का आरोप था कि शादी के शुरुआती समय से ही दोनों के बीच सामान्य वैवाहिक संबंध नहीं रहे।

मामला पहले फैमिली कोर्ट पहुंचा, जहां तलाक की याचिका खारिज कर दी गई। हालांकि बाद में राजस्थान हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला पलटते हुए पति को तलाक दे दिया।

इसके खिलाफ पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि:

  • दोनों लगभग 15 वर्षों से अलग रह रहे थे।
  • वैवाहिक संबंध पूरी तरह समाप्त हो चुके थे।
  • सुप्रीम कोर्ट द्वारा कराई गई मध्यस्थता भी सफल नहीं हो सकी।

अदालत ने यह भी नोट किया कि दोनों सरकारी सेवा में डॉक्टर हैं और आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं।

“विवाह केवल कानूनी अनुबंध नहीं”

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में विवाह संस्था को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

कोर्ट ने कहा कि विवाह को केवल व्यक्तिगत अधिकारों या कानूनी अनुबंध की तरह नहीं देखा जा सकता। कोर्ट के अनुसार विवाह आपसी सम्मान, भावनात्मक साझेदारी, साझा उम्मीदों और बराबर जिम्मेदारियों पर आधारित संबंध होता है।

अदालत ने कहा कि यदि इन मूल तत्वों का अस्तित्व खत्म हो जाए और पति-पत्नी वर्षों तक अलग-अलग जीवन जीते रहें, तो केवल औपचारिक रूप से शादी बनाए रखने का कोई वास्तविक अर्थ नहीं रह जाता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “कई बार लंबे वैवाहिक मुकदमों के बाद रिश्ता केवल कागजों पर बचा रह जाता है।”

अदालत ने स्पष्ट किया कि अदालतों को केवल तकनीकी आधारों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि रिश्ते की वास्तविक स्थिति भी देखनी चाहिए।

“दीर्घकालिक अलगाव मानसिक क्रूरता बन सकता है”

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भले ही “डेजर्शन” यानी परित्याग को सीधे तौर पर याचिका में आधार न बनाया गया हो, फिर भी अपीलीय अदालतें पूरे वैवाहिक व्यवहार और परिस्थितियों का मूल्यांकन कर सकती हैं।

अदालत ने कहा कि लंबे समय तक अलग रहना, साथ रहने का पूरी तरह खत्म हो जाना, रिश्ते में भावनात्मक दूरी और मेल-मिलाप की वास्तविक कोशिशों का अभाव मानसिक क्रूरता साबित करने के लिए पर्याप्त हो सकते हैं।

कोर्ट ने कहा कि मुकदमे के दौरान घटित घटनाओं और लगातार बने अलगाव को भी अदालतें ध्यान में रख सकती हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि मानवीय संबंध स्थिर नहीं होते, बल्कि समय के साथ बदलते रहते हैं। ऐसे में अदालतों को वास्तविक जीवन की परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

वैवाहिक संबंध से इनकार भी मानसिक क्रूरता

कोर्ट ने इस मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू पर जोर दिया-वैवाहिक संबंधों में शारीरिक निकटता का महत्व।

सुप्रीम कोर्ट ने पति द्वारा लगाए गए कुछ आरोपों का भी जिक्र किया।

पति ने कहा था कि शादी के शुरुआती समय में पत्नी जल्दी कमरे में चली जाती थीं। अंदर से दरवाजा बंद कर लेती थीं और दरवाजा खटखटाने के बावजूद नहीं खोलती थीं। इसके कारण पति को अलग कमरे में सोना पड़ता था।

अदालत ने कहा कि पत्नी ने इस तथ्य से इनकार नहीं किया कि दोनों अलग-अलग कमरों में सोते थे। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यह भी वैवाहिक संबंधों में दूरी का संकेत था।

अदालत ने अपने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि बिना उचित कारण लगातार वैवाहिक संबंधों से इनकार करना भी मानसिक क्रूरता माना जा सकता है।

कोर्ट ने कहा शारीरिक निकटता विवाह का महत्वपूर्ण हिस्सा है और लगातार दूरी बनाए रखना गंभीर भावनात्मक पीड़ा पैदा कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि बिना उचित कारण के लगातार शारीरिक संबंध से इनकार करना मानसिक क्रूरता माना जाता है और यह तलाक का वैध आधार है।

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“मृत हो चुके विवाह को ढोना भी क्रूरता”

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि पति-पत्नी लंबे समय से अलग रह रहे हों और रिश्ते में वापसी की कोई संभावना न हो, तो उन्हें जबरन साथ रहने के लिए मजबूर करना भी क्रूरता बन सकता है।

कोर्ट ने कहा कि “ऐसे रिश्ते धीरे-धीरे सड़ते हुए सामाजिक, मानसिक और भावनात्मक खालीपन पैदा करते हैं।”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मृत हो चुके रिश्ते को केवल कानूनी औपचारिकता के लिए जारी रखना दोनों पक्षों के लिए तनाव, मानसिक पीड़ा और निराशा का कारण बन सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि हर व्यक्ति को स्वतंत्र और सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार है।

ऐसी स्थिति में, विवाह को समाप्त करना ही दोनों पक्षों और समाज के हित में होता है, बजाय इसके कि विवाद को अनिश्चित काल तक जारी रखा जाए।

अनुच्छेद 142 के तहत विवाह समाप्त

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला ऐसा है जहां पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 की शक्ति का इस्तेमाल किया जा सकता है।

अदालत ने माना कि विवाह पूरी तरह टूट चुका है, रिश्ते के पुनर्जीवित होने की संभावना नहीं है और दोनों वर्षों से अलग जीवन जी रहे हैं। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने विवाह समाप्त करने का आदेश दिया और पत्नी की अपील खारिज कर दी।

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि दंपति की कोई संतान नहीं थी और दोनों ही सरकारी सेवा में डॉक्टर थे तथा आर्थिक रूप से स्वतंत्र थे।

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समाज और परिवार व्यवस्था पर ‘सुप्रीम’ टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले से संकेत दिया है कि विवाह संस्था का सम्मान जरूरी है, लेकिन किसी रिश्ते को केवल सामाजिक दबाव या कानूनी औपचारिकता के लिए जीवित रखना भी उचित नहीं माना जा सकता।

अदालत ने कहा कि जहां रिश्ते में विश्वास, सम्मान, भावनात्मक जुड़ाव और साथ रहने की इच्छा ही समाप्त हो जाए, वहां अदालतों को वास्तविक स्थिति को स्वीकार करना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विवाह को केवल इसलिए जीवित नहीं रखा जा सकता क्योंकि वह कानूनी रूप से अस्तित्व में है। यदि संबंध पूरी तरह खत्म हो चुका है, तो उसे सम्मानजनक तरीके से समाप्त करना ही बेहतर है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के जरिए स्पष्ट किया है कि अदालतें केवल तकनीकी आधार नहीं देखेंगी, बल्कि रिश्ते की वास्तविक स्थिति और मानसिक प्रभाव का भी मूल्यांकन करेंगी।

यह फैसला विशेष रूप से उन मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है जहां पति-पत्नी लंबे समय से अलग रह रहे हों, भावनात्मक जुड़ाव समाप्त हो चुका हो और मेल-मिलाप की संभावना खत्म हो गई हो।

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