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26 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति : पीड़िता ने दो बार किया सुसाइड का प्रयास, इसलिए हाईकोर्ट ने गंभीर अवस्था के बावजूद नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता को दी राहत, कहा-महिला की इच्छा, गरिमा और प्रजनन स्वायत्तता सर्वोपरि

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26 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति : पीड़िता ने दो बार किया सुसाइड का प्रयास, इसलिए हाईकोर्ट ने गंभीर अवस्था के बावजूद नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता को दी राहत, कहा-महिला की इच्छा, गरिमा और प्रजनन स्वायत्तता सर्वोपरि

Rajasthan High Court Allows Termination of 26-Week Pregnancy of Minor Rape Survivor, Upholds Reproductive Autonomy

मेडिकल बोर्ड की निगरानी में होगा गर्भसमापन, जीवित शिशु के जन्म पर राज्य उठाएगा जिम्मेदारी, हर हाल में पीड़िता की पहचान गोपनीय रखने के आदेश

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने एक अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण मामले में 16 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता को 26 सप्ताह से अधिक की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति प्रदान करते हुए महिलाओं के प्रजनन अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि किसी भी महिला, विशेषकर एक नाबालिग लड़की को उसकी इच्छा के विरुद्ध अवांछित गर्भावस्था को पूरा करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

महिला की प्रजनन स्वायत्तता, शारीरिक गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित मौलिक अधिकार हैं और इन्हें किसी भी परिस्थिति में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

जस्टिस बिपिन गुप्ता की एकलपीठ ने यह आदेश झालावाड़ जिले की एक 16 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता की ओर से उसकी मां द्वारा दायर याचिका पर दिया।

पीड़िता ने हाईकोर्ट से 26 सप्ताह और 2 दिन की गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति मांगी थी।

जीवित बच्चे के जन्म पर राज्य उठाएगा जिम्मेदारी

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने आदेश में गर्भसमापन की प्रक्रिया के दौरान जीवित शिशु के जन्म की स्थिति को लेकर भी महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं।

अदालत ने कहा कि यदि गर्भसमापन की प्रक्रिया के दौरान जीवित शिशु का जन्म होता है तो संबंधित अस्पताल उसे सर्वोत्तम उपलब्ध चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराएगा, ताकि उसके जीवन और स्वास्थ्य की रक्षा की जा सके।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पीड़िता बच्चे की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहती है, तो राज्य सरकार और उसकी संबंधित एजेंसियां बच्चे की देखभाल, चिकित्सा सहायता, संरक्षण और पुनर्वास की पूरी जिम्मेदारी उठाएंगी।

यह प्रक्रिया किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) कानून के प्रावधानों के अनुरूप पूरी की जाएगी।

पीड़िता ने दो बार किया आत्महत्या का प्रयास

राजस्थान हाईकोर्ट ने पीड़िता की गंभीर अवस्था के बावजूद 26 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति दी है. क्योकि दुष्कर्म पीड़िता बड़े मानसिक सदमे में है और उसने दुष्कर्म की घटना के बाद दो बार आत्महत्या का प्रयास भी किया.

पीड़िता की मां ने अदालत को बताया कि इस मामले में नाबालिग पीड़िता ने दुष्कर्म की घटना के बाद दो आर आत्महत्या का प्रयास किया.

राजस्थान हाईकोर्ट में पीड़िता की मांग ने कहा कि उसकी बेटी अभी तक दुष्कर्म की घटना से नहीं उबर पायी है। ऐसे में अगर उसे गर्भ रखा गया तो वो खुद को जीवित नहीं रख पाएगी.

दुष्कर्म का परिणाम थी गर्भावस्था

याचिका में मां की ओर से हाईकोर्ट को बताया गया कि नाबालिग लड़की यौन अपराध की शिकार हुई थी।

इस संबंध में झालावाड़ जिले के पुलिस थाना पगारिया में एफआईआर दर्ज की गई है और आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) तथा पॉक्सो अधिनियम की गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज कर जांच की जा रही है।

पीड़िता और उसके परिवार ने अदालत को बताया कि गर्भावस्था पूरी तरह अवांछित है तथा इसे जारी रखना उसके मानसिक, शारीरिक और सामाजिक जीवन पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।

पीड़िता की शिक्षा, भविष्य और मानसिक स्वास्थ्य को देखते हुए गर्भसमापन की अनुमति प्रदान की जानी चाहिए।

मेडिकल बोर्ड ने बताई गंभीर स्वास्थ्य स्थिति

राजस्थान हाईकोर्ट के निर्देश पर गठित मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट भी सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष प्रस्तुत की गई।

झालावाड़ मेडिकल कॉलेज और एसएचकेबीएम अस्पताल के विशेषज्ञ चिकित्सकों के बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि पीड़िता की गर्भावस्था 25 सप्ताह से अधिक की हो चुकी है।

बोर्ड ने यह भी कहा कि गर्भावस्था यौन उत्पीड़न का परिणाम है और इसे जारी रखना उसके मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।

मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि पीड़िता गंभीर एनीमिया से पीड़ित थी और उसका हीमोग्लोबिन स्तर केवल 5.1 ग्राम था, जो उसके स्वास्थ्य के लिए अत्यंत चिंताजनक स्थिति थी।

अदालत ने इस संबंध में अतिरिक्त रिपोर्ट मांगी थी, जिसके बाद चिकित्सकों ने बताया कि उपचार और आवश्यक चिकित्सा देखभाल के बाद उसका हीमोग्लोबिन स्तर बढ़कर 9.6 ग्राम हो गया है।

बोर्ड ने यह भी कहा कि गर्भसमापन की प्रक्रिया उच्च जोखिम वाली होगी। इसमें रक्तस्राव, संक्रमण, शल्य चिकित्सा और अन्य जटिलताओं की आशंका बनी रहेगी।

इसके बावजूद विशेषज्ञों ने राय दी कि न्यायालय की अनुमति और अभिभावकों की सहमति मिलने पर गर्भसमापन किया जा सकता है।

पीड़िता ने कहा, किसी भी हाल में नहीं रखना चाहती गर्भ

मेडिकल बोर्ड द्वारा बताई गई गंभीर चिकित्सीय परिस्थितियों के बावजूद नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता और उसकी मां ने गर्भ को किसी भी स्थिति में जारी रखने से इनकार कर दिया।

पीड़िता की ओर से उसकी मां ने अदालत को स्पष्ट रूप से बताया कि वह किसी भी हाल में गर्भ नहीं रखना चाहती।

पीड़िता का निर्णय पूरी तरह स्पष्ट और स्वैच्छिक है तथा वह गर्भावस्था को समाप्त कर अपने जीवन को सामान्य रूप से आगे बढ़ाना चाहती है।

महिला की इच्छा सर्वोपरि

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यह मामला केवल चिकित्सकीय या कानूनी सीमाओं का नहीं, बल्कि एक नाबालिग लड़की के जीवन, गरिमा, भविष्य और मौलिक अधिकारों का है।

अदालत ने कहा कि गर्भावस्था बलात्कार का परिणाम है, पीड़िता नाबालिग है और उसने स्पष्ट रूप से गर्भ जारी रखने से इनकार किया है। ऐसे में उसे गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर करना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा।

न्यायालय ने कहा कि किसी भी महिला को, विशेषकर एक नाबालिग को, उसकी इच्छा के विरुद्ध मातृत्व स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। ऐसा करना उसकी निर्णय लेने की स्वतंत्रता, निजता और शारीरिक स्वायत्तता को समाप्त करने जैसा होगा।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रजनन संबंधी निर्णय लेने का अधिकार महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अभिन्न हिस्सा है।

अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि महिला को यह तय करने का अधिकार है कि वह गर्भ जारी रखना चाहती है या नहीं। गर्भ को जारी रखने या समाप्त करने का निर्णय अत्यंत व्यक्तिगत होता है और इसका सम्मान किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा कि संवैधानिक अदालतों को ऐसे मामलों में केवल वैधानिक सीमाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि महिला के सर्वोत्तम हितों, मानसिक स्वास्थ्य और भविष्य को प्राथमिकता देनी चाहिए।

मेडिकल बोर्ड की निगरानी में होगा गर्भसमापन

अदालत ने झालावाड़ के एसएचकेबीएम अस्पताल एवं मेडिकल कॉलेज को निर्देश दिया कि मेडिकल बोर्ड की निगरानी और निर्धारित चिकित्सकीय प्रोटोकॉल के अनुसार जल्द से जल्द गर्भसमापन की प्रक्रिया पूरी की जाए।

अस्पताल को यह भी निर्देश दिया गया कि पीड़िता को गर्भसमापन से पहले और बाद में सभी आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं, पौष्टिक आहार, दवाइयां और उपचार पूरी तरह निशुल्क उपलब्ध कराए जाएं।

अदालत ने कहा कि पूरी प्रक्रिया विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी में की जाएगी तथा पीड़िता के स्वास्थ्य और सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी।

पीड़िता की पहचान रखनी होगी गोपनीय

राजस्थान हाईकोर्ट ने पीड़िता की पहचान को पूरी तरह गोपनीय रखने के निर्देश दिए हैं।

अदालत ने कहा कि अस्पताल, प्रशासन, पुलिस और जांच एजेंसियां किसी भी स्तर पर पीड़िता की पहचान सार्वजनिक नहीं करेंगी। उपचार, दस्तावेजों और किसी भी आधिकारिक कार्रवाई के दौरान उसकी निजता और सम्मान की पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी।

पीड़िता को मुआवजा देने के आदेश

राजस्थान हाईकोर्ट ने इसके साथ ही राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (RSLSA) और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) को निर्देश दिया कि राजस्थान पीड़ित प्रतिकर योजना के तहत पीड़िता को उपयुक्त मुआवजा प्रदान किया जाए।

अदालत ने आदेश दिया कि मुआवजा निर्धारित समयावधि में दिया जाए तथा उसकी राशि छह वर्षों की अवधि के लिए सावधि जमा (एफडी) में रखी जाए, ताकि भविष्य में पीड़िता के पुनर्वास, शिक्षा और अन्य आवश्यक जरूरतों में उसका उपयोग किया जा सके।

Case Deteils

HIGH COURT OF JUDICATURE FOR RAJASTHAN
BENCH AT JAIPUR
S.B. Civil Writ Petition No. 10621/2026

HON’BLE MR. JUSTICE BIPIN GUPTA (V. J.)
Judgment / Order -16/06/2026

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