टॉप स्टोरी

चर्चित खबरें

आर्बिट्रेशन समझौते में जगहों को लेकर विवाद हो तो किस कोर्ट में जाएगा मामला? : सुप्रीम कोर्ट ने तय किया सिद्धांत, तेलंगाना हाईकोर्ट का आदेश बरकरार

Exclusive Jurisdiction Clause Will Prevail In Arbitration Agreements, Rules Supreme Court

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने आर्बिट्रेशन मामलों में अधिकार क्षेत्र को लेकर एक बार फिर कानूनी स्थिति साफ की है।

आर्बिट्रेशन समझौतों में अक्सर यह विवाद खड़ा हो जाता है कि मामला किस हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आएगा। इस अहम सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि समझौते में किसी एक शहर की कोर्ट को विशेष अधिकार दिया गया है, तो वही कोर्ट मामले की निगरानी करेगी, भले ही आर्बिट्रेशन के लिए एक से अधिक स्थानों का उल्लेख किया गया हो।

सु्प्रीम कोर्ट ने कहा कि दो कंपनियों के बीच हुए कॉन्ट्रैक्ट में अगर आर्बिट्रेशन के लिए एक से ज्यादा शहरों का नाम लिखा हो, लेकिन साथ ही किसी एक शहर की कोर्ट को विशेष अधिकार भी दिया गया हो, तो विवाद होने पर मामला उसी कोर्ट में जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने आर्बिट्रेशन समझौतों की व्याख्या को लेकर यह महत्वपूर्ण सिद्धांत तय करते हुए कहा है कि पक्षकारों की आपसी सहमति सबसे अहम होती है और उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर किसी दूसरी कोर्ट का अधिकार क्षेत्र नहीं माना जा सकता कि वहां काम हुआ था या विवाद से जुड़ी घटनाएं हुई थीं। यदि समझौते में साफ तौर पर किसी एक शहर की कोर्ट को विशेष अधिकार दिया गया है, तो वही कोर्ट आर्बिट्रेशन प्रक्रिया की निगरानी करेगी। ऐसी स्थिति में यह तर्क भी नहीं दिया जा सकता कि कोई दूसरी कोर्ट सुनवाई के लिए ज्यादा उपयुक्त या सुविधाजनक है।

जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने यह टिप्पणी करते हुए भारतीया इंफ्रा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड की याचिका खारिज कर दी। कंपनी ने तेलंगाना हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसके और विश्व समुद्र इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड के बीच विवाद को आर्बिट्रेशन में भेजा गया था।

यह भी पढ़ें : ‘मकान मालिकों के पास किराया बढ़ाने का कानूनी अधिकार’, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- बिना सबूत किराया तय नहीं कर सकता हाईकोर्ट

क्या है पूरा मामला ?

यह मामला दो कंपनियों भारतीया इंफ्रा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड और विश्व समुद्र इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड के बीच हुए एक कॉन्ट्रैक्ट विवाद से जुड़ा था।

कॉन्ट्रैक्ट में यह प्रावधान था कि विवाद होने पर आर्बिट्रेशन हैदराबाद (तेलंगाना) या गुवाहाटी (असम) में हो सकता है। यानी समझौते में आर्बिट्रेशन के लिए दो संभावित स्थानों का उल्लेख किया गया था। लेकिन इसी क्लॉज में आगे यह भी स्पष्ट रूप से लिखा गया था कि इस एग्रीमेंट से जुड़े सभी मामलों पर “हैदराबाद की अदालतों” का विशेष अधिकार होगा।

बाद में दोनों पक्षों के बीच विवाद पैदा हो गया। इसके बाद सवाल उठा कि आर्बिट्रेटर की नियुक्ति के लिए किस हाईकोर्ट के पास जाना चाहिए।

भारतीया इंफ्रा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड का कहना था कि पूरा काम गुवाहाटी में हुआ था। वर्क ऑर्डर भी वहीं से जारी हुआ था और विवाद से जुड़ी सभी घटनाएं भी गुवाहाटी में हुई थीं। कंपनी का तर्क था कि ऐसे में मामला गुवाहाटी हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है।

दूसरी ओर, विश्व समुद्र इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड ने तेलंगाना हाईकोर्ट का रुख किया और कहा कि समझौते में हैदराबाद की कोर्ट को विशेष अधिकार दिया गया है।

यह भी पढ़ें : वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने के लिए आधार के इस्तेमाल को चुनौती: आधार को नागरिकता का प्रमाण मानने पर रोक की मांग, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और चुनाव आयोग मांगा जवाब

विवाद किस बात पर था ?

मामले का मुख्य सवाल यह नहीं था कि दोनों कंपनियों के बीच विवाद सही है या गलत।

असल विवाद यह था कि आर्बिट्रेशन प्रक्रिया की निगरानी कौन सी कोर्ट करेगी।

याचिकाकर्ता कंपनी का कहना था कि जब समझौते में हैदराबाद और गुवाहाटी दोनों का उल्लेख है, तो केवल तेलंगाना हाईकोर्ट को अधिकार नहीं दिया जा सकता।

कंपनी ने यह भी दलील दी कि हाल के एक सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कहा गया था कि जब एक से अधिक संभावित स्थान हों, तो यह देखा जा सकता है कि किस स्थान पर सुनवाई अधिक उपयुक्त होगी।

इसी आधार पर कंपनी ने तेलंगाना हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

यह भी पढ़ें : वकीलों की पहचान, डिग्री और रिकॉर्ड एक प्लेटफॉर्म पर लाने की तैयारी : सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल रजिस्ट्री और सोशल मीडिया नियमों पर मांगा पूरा प्लान

सुप्रीम कोर्ट ने समझौते को कैसे पढ़ा ?

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दोनों कंपनियों के बीच हुए आर्बिट्रेशन समझौते को ध्यान से पढ़ा। कोर्ट ने पाया कि समझौते में एक तरफ आर्बिट्रेशन के लिए हैदराबाद और गुवाहाटी दोनों का उल्लेख किया गया था। लेकिन उसी क्लॉज के अगले हिस्से में स्पष्ट रूप से लिखा गया था कि समझौते से जुड़े सभी मामलों में हैदराबाद की कोर्ट को विशेष अधिकार होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी कॉन्ट्रैक्ट को पढ़ते समय उसकी सभी शर्तों को एक साथ देखकर समझना चाहिए। यदि किसी क्लॉज के एक हिस्से में दो संभावित स्थानों का उल्लेख है और दूसरे हिस्से में साफ तौर पर किसी एक शहर की कोर्ट को विशेष अधिकार दिया गया है, तो दोनों शर्तों को मिलाकर पढ़ना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समझौते की शर्तों से साफ है कि दोनों पक्षों ने हैदराबाद की कोर्ट को ही विवादों पर फैसला करने का अधिकार दिया था।

पक्षकारों की सहमति सबसे अहम: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने आर्बिट्रेशन कानून के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत पर भी जोर दिया। कोर्ट ने कहा कि आर्बिट्रेशन की पूरी व्यवस्था पक्षकारों की सहमति पर आधारित होती है।

कोर्ट ने कहा कि जब दो पक्ष किसी शर्त पर सहमत होकर समझौता करते हैं, तो उस शर्त का सम्मान किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि पक्षकार पहले ही तय कर चुके हैं कि किसी विशेष शहर की कोर्ट ही विवादों की निगरानी करेगी, तो बाद में उस सहमति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आर्बिट्रेशन समझौतों की व्याख्या करते समय पक्षकारों की मंशा और उनकी सहमति को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है।

यही वजह थी कि कोर्ट ने हैदराबाद की कोर्ट को दिए गए अधिकार को सही माना। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समझौते की शर्तों को देखते हुए विवाद से जुड़े मामलों की निगरानी हैदराबाद की कोर्ट ही करेगी।

‘कौन सी कोर्ट ज्यादा सुविधाजनक है’ वाला सिद्धांत लागू नहीं होगा

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने एक पुराने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला दिया। उस फैसले में कहा गया था कि कुछ परिस्थितियों में यह देखा जा सकता है कि मामला किस कोर्ट में सुनना अधिक उपयुक्त या सुविधाजनक होगा।

इस मामले में याचिकाकर्ता ने एक पुराने फैसले-“आरिफ अज़ीम कंपनी लिमिटेड बनाम माइक्रोमैक्स इन्फॉर्मेटिक्स एफजेडई (2025)” का हवाला दिया था। उस फैसले में कहा गया था कि जब एक से अधिक सीट हों, तो “फोरम नॉन कन्वीनियंस” का सिद्धांत लागू किया जा सकता है।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले के तथ्य अलग हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जहां पक्षकार खुद किसी विशेष कोर्ट को विशेष अधिकार दे चुके हों, वहां यह बहस करने की जरूरत नहीं रह जाती कि कौन सी कोर्ट ज्यादा सुविधाजनक है।

बेंच ने कहा कि पहले से हुई स्पष्ट सहमति के बाद ऐसे सिद्धांतों को लागू करने का सवाल ही नहीं उठता। इसलिए पुराने फैसले का लाभ इस मामले में नहीं दिया जा सकता।

यह भी पढ़ें : ‘सरकारी भर्ती में विभागीय देरी की सजा उम्मीदवार को नहीं दी जा सकती’: सुप्रीम कोर्ट ने कहा-चयन सूची भी अंतिम नहीं, तमिलनाडु में चयन प्रक्रिया दोबार पूरी करने के निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना हाईकोर्ट को सही माना?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पूरे आर्बिट्रेशन क्लॉज को पढ़ने पर यह साफ हो जाता है कि हैदराबाद की कोर्ट को ही निगरानी का अधिकार दिया गया था। यही वजह थी कि तेलंगाना हाईकोर्ट ने जब आर्बिट्रेटर नियुक्त करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई, तो उसने अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर ही काम किया।

कोर्ट ने कहा कि तेलंगाना हाईकोर्ट ने इस मामले में कोई गलती नहीं की। बेंच के अनुसार समझौते से साफ पता चलता है कि दोनों पक्ष पहले ही हैदराबाद की कोर्ट को विवादों पर अधिकार देने पर सहमत हो चुके थे।

ऐसी स्थिति में गुवाहाटी हाईकोर्ट को प्राथमिकता देने का कोई आधार नहीं बनता।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला

सभी पक्षों की दलीलें सुनने और आर्बिट्रेशन समझौते का अध्ययन करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भारतीया इंफ्रा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड की विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी।

कोर्ट ने तेलंगाना हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें विवाद को आर्बिट्रेशन के लिए भेजा गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर किसी समझौते में किसी एक कोर्ट को विवादों पर अधिकार दिया गया है, तो उसी शर्त को माना जाएगा। सिर्फ इसलिए कि आर्बिट्रेशन के लिए एक से ज्यादा शहरों का नाम लिखा है, उस व्यवस्था को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी साफ किया कि ऐसी परिस्थितियों में यह तर्क नहीं दिया जा सकता कि किसी दूसरी कोर्ट में सुनवाई ज्यादा सुविधाजनक होगी।

इस फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने आर्बिट्रेशन मामलों में अधिकार क्षेत्र को लेकर एक महत्वपूर्ण सिद्धांत स्पष्ट कर दिया है, जिसका असर भविष्य में होने वाले कई कॉर्पोरेट और कारोबारी विवादों पर पड़ सकता है।

सबसे अधिक लोकप्रिय