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सुप्रीम कोर्ट का वो फैसला जिसने बदल दिया हिंदुस्तान में मोहब्बत का सफर, अधिकार पाने की एक सच्ची कहानी हैं- लतासिंह

हमारे देश मे अंतर्धार्मिक और अंतर्जातीय विवाह कभी भी आसान नही रहे है.अक्सर जाति और धर्म की दीवारों को तोड़कर मोहब्बत करने वालों के लिये राहे आसान कभी रही ही नही,लेकिन ये मुश्किलें तब ओर भी बढ़ जाती है जब अपने ही प्यार के दुश्मन बन जाते है और सत्ता के गलियारें उनके हथियार बन जाते है.

आज़ादी के बाद यू तो देश की संसद ने महिलाओं को लेकर कई कानून बनाए है, लेकिन देश की न्यायपालिका ने भी कई ऐसे फैसले दिए है, जिन फैसलों ने ना केवल महिलाओं को मजबूत किया है, बल्कि उन्हे अपने फैसले आजादी से लेने के लिए प्रेरित किया है.

देश में ऐसा ही एक फैसला सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2006 में दिया है, जिसकी नज़ीर पेश कर देशभर में प्रतिदिन ना केवल हजारों युवतियां बल्कि युवक भी अपने जीने की राह तय कर रहे है.

इस फैसले की वजह बनने वाली भी एक महिला है, जिसके संघर्ष ने ही आज देश के लाखों युवाओं के लिये जीने की राह आसान की है,जो अपने प्यार की एक नई दुनिया बसाना चाहते है.

प्यार करने वालो पर अक्सर ही परिवार और समाज का पहरा लगा रहता है,उत्तप्रदेश के फरुखाबाद की रहने वाली लतासिंह के प्यार पर भी समाज और परिवार के साथ साथ कानून का ऐसा पहरा था कि उससे लड़ते लड़ते वो देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुँच गयी, और सर्वोच्च अदालत ने भी जैसे लतासिंह के संघर्ष को स्वीकार कर एक ऐसा फैसला दिया जो आज नज़ीर बन गया है.

वैसे तो इस फैसले की कहानी की शुरूआत वर्ष 2000 में उत्तरप्रदेश के लखनऊ विश्वविद्यालय में हिंदी में एमए कर रही युवा लड़की लता सिंह से होती है, लेकिन इस कहानी की नींव वर्षो पहले उत्तरप्रदेश के फर्रूखाबाद के ही एक गांव में लिखी जा चुकी थी.

लता सिंह अपने माता पिता के साथ गांव में रहती थी, लेकिन माता पिता की मृत्यु हो जाने और 12वीं के बाद आगे की पढाई के लिए वह अपने भाई अजय प्रताप सिंह के साथ एलडीए कॉलोनी, कानपुर रोड, लखनऊ में रहने लगी, जहाँ उसने 1997 में इंटरमीडिएट किया और 2000 में स्नातक की पढ़ाई की.

लता सिंह अपने कॉलेज के शुरुआती दिनों से ही गांव के ही एक बनिया परिवार के युवा ब्रह्मानंद गुप्ता से प्यार करने लगी थी.पिता की मृत्यु के बाद अपनी किशोरावस्था में दोनों करीब आये थे.

“मुझे यह भी याद नहीं है कि हमारी प्रेम कहानी कहां से शुरू हुई,फर्रुखाबाद जिले के एक गाँव में पले-बढ़े, दोनो के परिवार आपस में दोस्त थे,स्कूल समय मे साथ पढ़ने तक हम एक दूसरे को जानते थे,फिर आगे की पढ़ाई के लिए मैं लखनऊ तो वही व्यापार के लिये गुप्ताजी दिल्ली शिफ्ट हो गये”

कुछ समय के बाद ही इस रिश्ते की महक लता सिंह के परिजनों तक पहुंच चुकी थी. इसका असर ये हुआ कि परिवार ने पढ़ाई समाप्त कर किसी अन्य जगह शादी के प्रयास शुरू कर दिए.

लता सिंह एक रूढ़िवादी शाही राजपूत परिवार से संबंध रखती थी, जो अंतर्धार्मिक विवाह तो बहुत दूर की बात, अंतर्जातीय विवाह को भी बहुत नापंसद करता था.

इसी बीच लता सिंह के पिता का निधन हो गया और अकेलेपन के समय में, उन्हें एहसास हुआ कि वह गुप्ता के साथ ही अपना जीवन बिताना चाहती है.

“काफी समय बाद हम 1999 में अपने एक भाई की शादी में शामिल हुए, हम मिले और मोबाइल नम्बर एक्सचेंज किए,जब हमने गाँव छोड़ा तो हम संपर्क में रहे, थोड़ी बातचीत शुरू की. मैंने सोचा कि हम एक रिश्ते में थे लेकिन शादी संभव नहीं थी.

परिवार के बढ़ते दबाव के बीच लता सिंह ने अपनी पसंद और बचपन के दोस्त से विवाह करने का ऐलान करते हुए नवंबर 2000 में अपने भाई का घर छोड़कर दिल्ली आ गई.

लता सिंह कहती है मैने गुप्ता जी को फोन किया, 2 नवंबर 2000 को हम लखनऊ में मिले और हम दिल्ली आ गए. हमारी शादी 7 नवंबर को हुई थी. यह हमारे परिवार में पहली शादी थी.

लता सिंह के प्रेमी ब्रम्हा नंद गुप्ता के परिवार का दिल्ली और अन्य जगहों पर कारोबार था. जिसके चलते गुप्ता दिल्ली में कई लोगो को जानते थे,यही पर उन्होने 2 नवम्बर को दिल्ली के आर्य समाज मंदिर में शादी कर ली.

लतासिंह के भाइयों के लिये ये उनके सम्मान को ठेस पहुँचाना था, जो इस बात से नाराज थे कि उनकी राजपूत बहन राजपूत समाज को छोड़कर कैसे एक बनिया परिवार के लड़के से शादी कर रही थीं.

2 नवम्बर को लतासिंह अपने प्रेमी के साथ दिल्ली आयी थी और उसके एक सप्ताह के भीतर ही उसके भाई भी उसे खोजने के लिए दिल्ली पहुंच गए थे.

“मुझे लगा कि मेरे भाइयों को पता चलने में एक या दो महीने लगेंगे, लेकिन उन्हें दो दिन बाद ही हमारी शादी के बारे में पता चल गया” जब तीन भाई गुप्ता के रिश्तेदारों के घर गए और उन पर हमला किया, तो परिवार के 27 सदस्य उत्तर प्रदेश से भागने को मजबूर हो गए.

डर से रहते थे बंद कमरे में
लता सिंह के भाई अजय प्रताप सिंह, शशि प्रताप सिंह और आनंद प्रताप सिंह इस अंतर-जातीय विवाह से बेहद उग्र थे.विवाह की खबर के बाद ये सभी ब्रम्हा नंद गुप्ता के पैतृक निवास जाकर घर में मौजूद लोगो को जमकर पिटाई की.

लता सिंह कहती हैं “ जब हमें ये सब खबरे मिल रही थी तो हम बहुत डरे हुए थे. मुझे पता था कि अगर वे हमें मिल जाते हैं तो हम देखते ही मारे जाएंगे. इसलिए हमने खुद को एक कमरे में कई दिनों तक बंद रखा. अक्सर हम कमरे को बाहर से बंद रखते थे आस पड़ोस के लोग बाहर से ताला लगाकर चाबी अंदर फेक देते थे“

विवाह के दो दिन बाद लता सिंह के भाई ने उत्तर प्रदेश के लखनऊ के सरोजनी नगर पुलिस थाने में अपनी बहन की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई.जिसमें बाद में अपहरण के मामले में बदल दिया गया.

सिंह और गुप्ता हिमाचल प्रदेश में छिपे हुए थे जहां वे हर दो महीने में होटल बदलते रहते थे, जब तक कि उन्होंने यह नहीं सुना कि उनके परिवार के खिलाफ अपहरण का मामला दर्ज कर लिया है.

एफआईआर दर्ज करने के साथ ही पुलिस ने लता सिंह के प्रेमी ब्रम्हा नंद गुप्ता की दो बहनों और उसके चचेरे भाई को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

गिरफ्तार किए गए लोगों में ब्रम्हा नंद गुप्ता की बहन ममता गुप्ता भी शामिल थी जिसे पुलिस उसके एक माह के बच्चे के साथ जेल भेज दिया था.

यहां तक की लता सिंह के पति के एक भाई को कथित रूप से भोजन और पानी के बिना चार-पांच दिनों के लिए एक कमरे में बंद कर दिया गया. उसके पति के कृषि क्षेत्र की फसल की फसल काट ली और उसे बेचने के साथ ही खेत पर जबरन कब्जा भी कर लिया गया.उसके भाइयों ने अवैध रूप से उसके पति की दुकान को भी अपने कब्जे में ले लिया.

गुप्ता की दो बहनों जिसमे से एक अविवाहित थी उसे गिरफ्तार कर लिया गया,गिरफ्तारी के बाद कुछ दिनों तक उन्हें कहां रखा गया ये तक नहीं बताया गया,बाद में दो और रिश्तेदारों को जेल में डाल दिया गया, इस तरह लता सिंह के भाई और पुलिस लगातार गुप्ता परिवार को टॉर्चर करते रहे,यहां तक कि स्थानीय प्रशासन भी जैसे मूक बनकर समर्थन कर रहा था.

पुलिस पूरी तरह से लता सिंह के भाइयों के प्रभाव में थी और एक समय ऐसा लगा जब ये मामला उत्तर प्रदेश में दो समाज के लिये प्रतिष्ठा की बात बन गयी हो.

पुलिस और प्रशासन के लगातार बढ़ते दबाव के चलते लतासिंह के भाईयों के डर से जहां गुप्ता परिवार के सदस्यों ने लखनऊ छोड़ दिया. वही लतासिंह और गुप्ता खुद भी शहर शहर छुपते हुए घूमने लगे.

तीन राज्यों की खाक छानने के बाद वे आखिरकार राजस्थान की राजधानी जयपुर में पनाह ली. ये वक्त था जब लता सिंह ने पति और उनके रिश्तेदारों को उत्पीड़न से बचाने के लिए लड़ने का प्रण किया.

लता सिंह ने सबसे पहले राजस्थान महिला आयोग के सामने पेश होकर सुरक्षा की मांग की.

ब्रम्हा नंद गुप्ता गुप्ता कहते है

“हम जयपुर गए, और हम महिला आयोग गए. उन्होंने हमें मामले को यूपी महिला आयोग में ले जाने के लिए कहा, लेकिन मैंने समझाया कि हम राज्य में पैर तक नहीं रख सकते. उस समय आयोग चेयरमैन अपर्णा सहाय ने स्थिति की गंभीरता को समझा और लखनऊ एसएसपी को पत्र लिखा, जो बाद में लता सिंह का बयान लेने के लिए जयपुर आए थे.

राजस्थान महिला आयोग ने 13 मार्च 2001 को लता सिंह का बयान दर्ज किया और मामले की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भी सूचित किया.

महिला आयोग की अध्यक्ष ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को एक पत्र लिखकर आयोग और उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव से इस मामले में हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के हस्तक्षेप के चलते मामले में सभी आरोपी व्यक्तियों को उत्तर प्रदेश जेल से 17 मई, 2001 को जमानत पर रिहा कर दिया गया.

लता सिंह का मामला देश के तीन राज्यों में फैल चुका था, इस केस की आंच अब उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली में फैल गई.

मामला राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पास जाने के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस भी दबाव में थी. ऐसे में 28 मई, 2001 लखनऊ केस के जांच अधिकारी ने लता सिंह का जयपुर में बयान दर्ज करने के साथ ही पुलिस सुरक्षा भी प्रदान की.

पुलिस सुरक्षा में ही लता सिंह को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, लखनऊ के समक्ष पेश किया गया, जहां धारा 164[1] के तहत उनके बयान दर्ज किए गए. लता सिंह ने अपने बयान में स्पष्ट कहा कि उसने अपनी मर्जी से ब्रम्हा नंद गुप्ता से शादी की है.

लता सिंह अपना बयान दर्ज करने के लिए लखनऊ में अदालत जाने के समय को याद करती है. जब वह घर लौट रही थी, उसके भाईयों ने उसे कानपुर में पकड़ लिया.

“मैं सात महीने की गर्भवती थी, लेकिन मैं कानपुर बस स्टैंड की बाउंड्री वॉल पर चढ़ गई और बिना पीछे देखे मैं तब तक दौड़ती रही जब तक मैं एक बेकरी में नहीं पहुंच गई. बारिश हो रही थी और मैं भीग रही थी, बेकरी चलाने वाले बूढ़े व्यक्ति ने मुझे ओवन के सामने बैठा दिया और मेरी मदद की.“

5 अक्टूबर, 2001 को लता सिंह के बयान के बावजूद मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, लखनऊ ने इस तथ्य की अनदेखी करते हुए कि पुलिस एफआर लगा चुकी है, मुकदमा आगे चलने का आदेश जारी कर दिया.

पुलिस की अंतिम रिपोर्ट के खिलाफ एक विरोध याचिका दायर की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया कि लता सिंह की मानसिक स्थिति ठीक नहीं.

विरोध याचिका के चलते मनोरोग केंद्र, जयपुर में तीन चिकित्सकों के एक बोर्ड द्वारा लता सिंह की मानसिक स्थिति की जांच की गई. बोर्ड ने भी लता सिंह को एक स्वस्थ महिला बताते हुए कहा कि वह किसी भी प्रकार की मानसिक बीमारी से पीड़ित नहीं है.

लता सिंह कहती है शादी उनकी पसंद थी, लेकिन उनके भाइयों ने अदालत में उनके बयान को चुनौती दी और दावा किया कि उनकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है

“मुझे मानसिक अस्पताल में एक पूरे बोर्ड का सामना करना पड़ा, और उन्होंने मुझसे सभी तरह के सवाल पूछे, जैसे कि प्रधान मंत्री कौन है. मैंने कहा कि वे मुझसे बेहतर सवाल पूछ सकते हैं, ”सिंह कहती है कि यह प्रक्रिया एक महीने तक चली.

इसी बीच लखनऊ की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने लता सिंह के पति के चार रिश्तेदारों जिनके खिलाफ मामला लंबित था, के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया.

फास्ट ट्रैक कोर्ट के आदेश के खिलाफ आरोपियों की ओर से एफआईआर रद्द करने की मांग करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई.

लता सिंह ने यूपी में अपने केस की पैरवी के लिये वकील करने का प्रयास किया, लेकिन वकील पाने की किसी भी कोशिश को उसके भाईयों ने नाकाम कर दिया था, जिनकी स्थानीय राजनीति और प्रशासन में पकड़ थी,वकील खुद भी इस केस से दूरी बना देते थे, तो दूसरी तरफ मीडिया ने भी इस केस से जैसे आंखे मूंद ली.

सिंह कहती हैं, “एक वकील मेरे भाइयों को हमारे मामले की जानकारी भी दे रहा था, एक मौके पर, मेरे परिवार ने मुझे अदालत में घेर लिया, लेकिन एक स्थानीय एनजीओ एसोसिएशन फॉर एडवोकेसी एंड लीगल इनिशिएटिव्स ने पुलिस को बुलाया और हम किसी तरह बाहर निकले”

अंत में लता सिंह ने राजस्थान राज्य महिला आयोग और फिर राष्ट्रीय महिला आयोग की मदद से अपनी ननदो को को जेल से बाहर निकालने में कामयाब रही और फिर स्थायी रूप से सभी जयपुर चले आए.

“यह अविश्वसनीय रूप से कठिन हो गया था. हम एक नए शहर जयपुर में कुल 27 लोग थे. बस परिवार का भरण-पोषण कठिन था, अकेले ही मामले को आगे बढ़ाने के लिए लखनऊ वापस जाने का खर्च उठाने के साथ शारीरिक खतरा भी था.

महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग और अब हाईकोर्ट के दरवाजों पर दस्तक देने के बावजूद मुकदमों का अंत नहीं हो रहा था और ना ही लता सिंह और उसके पति शांति से रह पा रहे थे.

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी एफआईआर रद्द करने से इंकार करते हुए इस मामले में सभी आरोपियों को सत्र न्यायाधीश के समक्ष उपस्थित होने का आदेश दिया.

ऐसे में लता सिंह ने उत्तर प्रदेश के अधिवक्ता की सलाह पर संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर करना तय किया.

2004 तक सिंह ने अपने जीवन के कठिन चार साल बिताए, इसी बीच लतासिंह ने एक बच्चे को जन्म दिया था, जिसे वह अक्सर अदालत जाते समय साथ ले जाती थी.भाइयों की बढ़ती नफरत, पुलिस और सरकार के बढ़ते दबाव के बाद अंत में, वकील साकेश कुमार की मदद से वे इस मामले को 2006 में सुप्रीम कोर्ट ले जाने में कामयाब रही.

लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश सरकार

सुप्रीम कोर्ट से 2006 में ऐतिहासिक फैसला आया, जो ना केवल लता सिंह के पक्ष में था. बल्कि देश में आने वाले समय मे युवा-युवतियों के लिए एक नज़ीर बन गया.

सुप्रीम कोर्ट ने लतासिंह बनाम उत्तरप्रदेश सरकार के इस फैसले में कहा कि हमारा देश एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक देश है,,,जहां कोई लड़का या लड़की एक बार बालिग होने की उम्र को पार कर लेता है तो वो स्वतंत्र है कि वह जिसे भी पसंद करता है उससे शादी कर सकता है.

सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के जरिए देश में बालिग लड़का या लड़की को अपनी अपनी मर्जी से अपना साथी चुनने का अधिकार दिया.

कोर्ट ने कहा वे अपनी मर्जी से अपना साथी चुन सकते है और साथ रह सकते है,उनके खिलाफ दोनों ही परिवारों के कोई भी परिजन कोई कानूनी कार्यवाही नहीं कर सकते.

अदालत ने अपने फैसले में ऐसे मामलों में पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर भी निर्देश दिये साथ ही ऐसे प्रेमी जोड़ों को सुरक्षा देने के भी निर्देश दिये.

आज भी देशभर में प्यार करने वाले जोड़े इसी फैसले के जरिये सुरक्षा हासिल करते है. और देशभर के 25 हाईकोर्ट प्रतिदिन इस फैसले की नजीर में सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों आदेश पारित करते हैं.

प्रेम विवाह से जुड़े हर दूसरे केस में आज इस फैसले को नज़ीर के तौर पर पेश किया जाता है.

इस फैसले को देते समय जस्टिस मार्कंडेय काट्जू ने कहा था अंतरजातीय विवाह देश की राष्ट्रीय एकता के लिये बहुत आवश्यक है,,,

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद लता सिंह का अपने प्यार को पाने के संघर्ष को तो एक मुकाम मिल गया है लेकिन फिर भी अपनी शादी के दो दशक बाद भी, वह अदालत की लड़ाई से मुक्त नहीं हो सकी है.

लतासिंह के सबसे बड़े भाई जो कि लतासिंह के प्रति नरम थे उनका 5 साल पहले निधन हो गया. उनके निधन के साथ उन्होंने उम्मीद छोड़ दी थी कि चीजें कभी भी सामान्य होगी और वे फिर से अपने परिवार के पास जा सकेगी.

लतासिंह अपने पति की सम्पति के लिए भी कानूनी लड़ाई जारी रखे हुए है जो उनके जाने के बाद स्थानीय लोगो द्वारा कब्जा कर ली गई.

लतासिंह पिछले दो दशक से भी ज्यादा समय से जयपुर में अपने परिवार के साथ रहती है और कई युवक—युवतियों को अलग अलग अदालतों से जीने की सुरक्षा दिलाने के प्रयास करती हैं.

लतासिंह अब राजस्थान में एक बाल अधिकार कार्यकर्ता के रूप में कार्य करती हैं, सैकड़ो बच्चों को बालश्रम, देह व्यापार से लेकर मुश्किल स्थितियों से आज़ाद करा चुकी है, कितने ही बच्चों को अपराध की दुनिया से बाहर लाने में कामयाब रही.

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