जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले बालिग युवक-युवतियों के अधिकारों को लेकर अहम फैसला सुनाया है।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि दो बालिग अपनी मर्जी से साथ रहने का फैसला करते हैं, तो समाज, परिवार या कोई अन्य व्यक्ति यह तय नहीं कर सकता कि वे अपना जीवन कैसे जिएंगे। यदि ऐसे जोड़े को परिवार या अन्य लोगों से जान का खतरा हो, तो पुलिस का कर्तव्य है कि वह उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करे।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि-
किसी रिश्ते को समाज नैतिक या अनैतिक मानता है, इससे संविधान के तहत मिलने वाले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार पर कोई असर नहीं पड़ता। संविधान का अनुच्छेद 21 हर बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद से जीवन जीने का अधिकार देता है और राज्य का दायित्व है कि वह इस अधिकार की रक्षा करे। साथ ही राजस्थान पुलिस अधिनियम के तहत भी पुलिस का कर्तव्य है कि नागरिकों के जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा सुनिश्चित करे।
जस्टिस अनुरूप सिंघी की एकल पीठ ने भरतपुर के रहने वाले 19 वर्षीय युवक और 19 वर्षीय युवती की याचिका पर यह आदेश पारित किया।
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लिव-इन में रहने पर परिवार से मिलने लगी धमकियां
यह मामला भरतपुर जिले के रहने वाले 19 वर्षीय युवक लवेश कुमार और 19 वर्षीय युवती सोनिया से जुड़ा है।
दोनों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर बताया कि वे अपनी इच्छा से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं। इस संबंध में उन्होंने 9 जून 2026 को एक समझौता भी किया था।
याचिका में कहा गया कि उनके परिवार के कई सदस्य और रिश्तेदार इस रिश्ते का विरोध कर रहे हैं। उन्हें लगातार धमकियां दी जा रही हैं और उन्हें डर है कि उनके साथ कोई अप्रिय घटना हो सकती है।
इसी वजह से दोनों ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट में याचिका दायर कर अपनी जान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा की मांग की।
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हाईकोर्ट ने दोनों की उम्र और पहचान की जांच की
सुनवाई के समय दोनों युवक-युवती खुद हाईकोर्ट में मौजूद थे। कोर्ट ने सबसे पहले उनके दस्तावेज देखकर यह सुनिश्चित किया कि दोनों बालिग हैं और अपने जीवन से जुड़े फैसले खुद लेने के लिए कानूनी रूप से सक्षम हैं।
दोनों ने अपनी 10वीं की मार्कशीट कोर्ट में पेश की, जिससे यह पुष्टि हुई कि दोनों बालिग हैं। उनके वकील ने भी उनकी पहचान की पुष्टि की।
याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि दोनों ने अपनी इच्छा और जिम्मेदारी के साथ एक-दूसरे के साथ रहने का फैसला किया है। ऐसे में किसी को भी उन्हें धमकाने, परेशान करने या कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है।
उन्होंने कोर्ट से कहा कि उन्हें लगातार जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं, इसलिए पुलिस सुरक्षा दी जाए।
बालिगों के अधिकार पर हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि दो बालिग अपनी पसंद से जीवन जीने और अपने फैसले खुद लेने का पूरा अधिकार रखते हैं।
कोर्ट ने कहा कि यदि दो बालिग अपनी इच्छा से साथ रहना चाहते हैं, तो केवल इसलिए उनके अधिकार नहीं छीने जा सकते कि समाज या परिवार उनके फैसले से सहमत नहीं है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के लता सिंह, एस. खुशबू, इंद्रा शर्मा और शफीन जहां जैसे महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि समाज यह तय नहीं कर सकता कि कोई व्यक्ति अपना जीवन किस तरह जिएगा। किसी रिश्ते को सामाजिक या नैतिक दृष्टि से स्वीकार या अस्वीकार किया जाना अलग बात है, लेकिन इससे संविधान के तहत मिलने वाले अधिकार खत्म नहीं हो जाते।
हाईकोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 21 हर नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। जब किसी व्यक्ति को अपनी जान का खतरा महसूस हो, तो राज्य और पुलिस दोनों की जिम्मेदारी है कि उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करें।
पुलिस की जिम्मेदारी भी स्पष्ट की
हाईकोर्ट ने कहा कि राजस्थान पुलिस अधिनियम, 2007 की धारा 29 के तहत हर पुलिस अधिकारी का दायित्व है कि वह नागरिकों के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करे।
कोर्ट ने कहा कि यदि कोई बालिग जोड़ा अपनी जान को खतरा बताकर पुलिस से सुरक्षा मांगता है, तो पुलिस उसकी शिकायत को नजरअंदाज नहीं कर सकती। पुलिस की जिम्मेदारी है कि वह उसकी शिकायत पर गंभीरता से कार्रवाई करे।
पुलिस पहले यह जांच करे कि खतरा कितना गंभीर है। यदि खतरे की आशंका सही मिले, तो सुरक्षा के लिए तुरंत जरूरी कदम उठाए जाएं।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने उच्चैन थाना प्रभारी को निर्देश दिया कि आवेदन मिलने के बाद दोनों की शिकायत पर विचार करें, खतरे का आकलन करें और जरूरत पड़ने पर उनकी सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठाएं।
हाईकोर्ट का अंतिम फैसला
राजस्थान हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए दोनों याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे अपनी सुरक्षा के लिए संबंधित थाना प्रभारी के सामने आवेदन दें।
कोर्ट ने भरतपुर जिले के उच्चैन थाना प्रभारी को आदेश दिया कि आवेदन मिलने के बाद दोनों की शिकायत पर गंभीरता से विचार किया जाए। यदि जांच में यह लगे कि उन्हें वास्तव में जान या स्वतंत्रता का खतरा है, तो पुलिस उनकी सुरक्षा के लिए सभी जरूरी कदम उठाए और यह सुनिश्चित करे कि उन्हें किसी प्रकार का नुकसान न पहुंचे।
हालांकि हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस आदेश का असर किसी अन्य दीवानी या आपराधिक मामले पर नहीं पड़ेगा। यदि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कोई अन्य कानूनी कार्यवाही लंबित है या भविष्य में शुरू होती है, तो इस आदेश का उस पर कोई प्रभाव नहीं माना जाएगा।
हाईकोर्ट ने आदेश की सीमा भी तय की
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि यह फैसला केवल सुरक्षा की मांग से जुड़ा है।
कोर्ट ने कहा कि इस आदेश को किसी अन्य विवाद या मुकदमे में याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला नहीं माना जाएगा।
यदि उनके खिलाफ कोई दीवानी या आपराधिक मामला लंबित है या आगे दर्ज होता है, तो उस पर कानून के अनुसार स्वतंत्र रूप से कार्रवाई होगी। इस आदेश का उन मामलों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
फैसले का असर क्या होगा?
राजस्थान हाईकोर्ट का यह फैसला उन हजारों बालिग युवक-युवतियों के लिए अहम है, जो अपनी इच्छा से विवाह या लिव-इन रिलेशनशिप में रहने का फैसला करते हैं और परिवार या समाज के विरोध का सामना करते हैं।
कोर्ट ने साफ कर दिया है कि दो बालिग यदि अपनी मर्जी से साथ रह रहे हैं, तो केवल सामाजिक असहमति, पारिवारिक नाराजगी या रिश्तेदारों के दबाव के आधार पर उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता में दखल नहीं दिया जा सकता।
यह फैसला पुलिस की जिम्मेदारी भी स्पष्ट करता है। यदि किसी बालिग जोड़े को अपनी जान या स्वतंत्रता पर खतरे की आशंका हो, तो पुलिस का दायित्व है कि वह शिकायत को गंभीरता से ले, खतरे का आकलन करे और जरूरत पड़ने पर समय रहते सुरक्षा उपलब्ध कराए।
इस फैसले के जरिए राजस्थान हाईकोर्ट ने एक बार फिर दोहराया है कि संविधान हर बालिग नागरिक को अपनी पसंद से जीवन जीने का अधिकार देता है। जब तक किसी व्यक्ति का फैसला कानून का उल्लंघन नहीं करता, तब तक समाज या परिवार उसके निजी जीवन के फैसले नहीं ले सकते। संविधान के तहत मिलने वाले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करना राज्य और पुलिस दोनों की कानूनी जिम्मेदारी है।