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सिर्फ ‘झूठा फंसाने’ का दावा काफी नहीं: साइबर अपराध के मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने जमानत से किया इनकार, कई राज्यों में नेटवर्क और बड़ी रकम के लेनदेन को माना गंभीर

Rajasthan High Court Refuses Bail In Cyber Fraud Case, Says Mere Claim Of False Implication Is Insufficient

जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने संगठित साइबर अपराध के एक मामले में सख्त रुख अपनाते हुए दो आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी हैं। यह मामला ऐसे अपराध से जुड़ा है, जिसमें देश के कई राज्यों में फैले आर्थिक लेन-देन और ठगी के नेटवर्क का आरोप सामने आया है।

मामले में हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि जब रिकॉर्ड से यह पता चलता हो कि मामला गंभीर है, बड़ी रकम के लेनदेन से जुड़ा है और कई राज्यों तक फैले नेटवर्क की आशंका है, तो ऐसे आरोपियों को जमानत नहीं दी जा सकती।

हाईकोर्ट ने कहा कि जमानत पर फैसला करते समय केवल आरोपी की दलील नहीं देखी जाती, बल्कि केस की पूरी परिस्थितियां, पुलिस जांच में सामने आए सबूत और अपराध की गंभीरता भी अहम होती है। कोर्ट ने कहा कि अगर रिकॉर्ड से यह पता चलता है कि साइबर ठगी किसी गिरोह ने की है और इसमें बड़ी रकम शामिल है, तो आरोपी को जमानत देने का आधार नहीं बनता।

जस्टिस रवि चिरानिया की एकल पीठ ने साइबर पुलिस थाना, एटीएस और एसओजी में दर्ज एक मामले में गिरफ्तार दो आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज करते हुए यह आदेश दिया।

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मामला हाईकोर्ट तक कैसे पहुंचा?

यह मामला राजस्थान एटीएस और एसओजी के साइबर पुलिस थाने में दर्ज एफआईआर संख्या 12/2024 से जुड़ा है।

याचिकाकर्ता रईस और विकास भांकाल, जो वर्तमान में जयपुर की सेंट्रल जेल में बंद हैं, ने जमानत के लिए हाईकोर्ट में आवेदन किया था। दोनों को पुलिस ने वर्ष 2024 में दर्ज एक एफआईआर के तहत गिरफ्तार किया था, जो साइबर पुलिस स्टेशन, एटीएस और एसओजी से जुड़ा मामला है।

एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की कई धाराओं के साथ-साथ आईटी एक्ट 2000 की धारा 66D के तहत अपराध दर्ज किए गए हैं। यह धाराएं मुख्य रूप से धोखाधड़ी, साजिश और साइबर अपराध से संबंधित हैं।

दोनों आरोपियों ने राजस्थान हाईकोर्ट में जमानत की अलग-अलग याचिकाएं दायर की थीं। बाद में दोनों याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि उन्हें इस मामले में झूठा फंसाया गया है और उन्होंने कोई अपराध नहीं किया है। इसी आधार पर हाईकोर्ट से जमानत देने की मांग की गई।

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आरोपियों की ओर से दी गई दलील

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील ने कोर्ट में तर्क दिया कि दोनों आरोपियों को इस मामले में झूठा फंसाया गया है और उन्होंने कोई अपराध नहीं किया है।

वकील ने यह भी बताया कि आरोपियों को गिरफ्तार हुए काफी समय हो चुका है और वे लंबे समय से जेल में बंद हैं। इस आधार पर उन्होंने कोर्ट से अनुरोध किया कि आरोपियों को जमानत पर रिहा किया जाए।

बचाव पक्ष ने यह भी संकेत दिया कि मामले में उनके खिलाफ ठोस सबूत नहीं हैं और जांच के दौरान उन्हें अनावश्यक रूप से आरोपी बनाया गया है।

सरकारी पक्ष ने किया जमानत का विरोध

राज्य सरकार की ओर से लोक अभियोजक ने जमानत का कड़ा विरोध किया।

सरकारी वकील ने कोर्ट को बताया कि पुलिस की 13 मई 2026 की स्थिति रिपोर्ट में कई गंभीर तथ्य सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार मामले में बड़ी रकम के लेनदेन का पूरा सिलसिला सामने आया है। जांच में यह भी पता चला है कि धन कई अलग-अलग स्तरों से होकर गुजरा है।

सरकारी वकील ने यह भी कहा कि इस मामले का संबंध केवल राजस्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि कई राज्यों में हुए लेनदेन और गतिविधियों से जुड़ा है।

सरकारी वकील ने यह भी दलील दी कि आरोपियों ने मिलकर एक गिरोह बनाया हुआ है, जो संगठित तरीके से साइबर अपराध को अंजाम देता है। पुलिस के अनुसार उपलब्ध रिकॉर्ड से यह भी संकेत मिलता है कि आरोपी संगठित तरीके से साइबर अपराध करने वाले एक गिरोह का हिस्सा हो सकते हैं।

इस प्रकार के अपराध न सिर्फ आर्थिक नुकसान पहुंचाते हैं, बल्कि समाज में असुरक्षा का माहौल भी पैदा करते हैं। इसलिए ऐसे मामलों में सख्ती बरतना आवश्यक है।

हाईकोर्ट ने क्यों माना मामला गंभीर?

हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पुलिस की स्टेटस रिपोर्ट और रिकॉर्ड की जांच की।

कोर्ट ने माना कि मामले की गंभीरता और बड़ी रकम के लेनदेन के आरोपों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में बड़ी रकम के लेनदेन और कई स्तरों पर धन के प्रवाह का उल्लेख है, जिसे इस चरण में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी माना कि जांच के दौरान सामने आए रिकॉर्ड्स से ऐसा लगता है कि मामला केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि संगठित साइबर अपराध से जुड़ा हो सकता है।

हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ यह कह देने से जमानत नहीं मिल सकती कि आरोपी निर्दोष है। कोर्ट को यह भी देखना होता है कि रिकॉर्ड में क्या सबूत हैं और मामला कितना गंभीर है।

कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से पता चलता है कि मामला गंभीर है। जांच में कई राज्यों तक फैले नेटवर्क और गैंग बनाकर साइबर अपराध करने की बात सामने आई है। इन सभी बातों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि फिलहाल आरोपियों को जमानत नहीं दी जा सकती।

हाईकोर्ट का अंतिम फैसला

सभी तथ्यों और दलीलों पर विचार करने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने दोनों आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं।

कोर्ट ने कहा कि एफआईआर, रिकॉर्ड में मौजूद सबूत और पूरे मामले को देखते हुए फिलहाल आरोपियों को जमानत नहीं दी जा सकती।

हाईकोर्ट ने कहा कि मामले में गंभीर अपराध शामिल हैं, बड़ी रकम का लेन-देन हुआ है और आरोपियों की गतिविधियां संगठित अपराध की ओर इशारा करती हैं।

इसी कारण हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाओं को खारिज करते हुए आरोपियों को कोई राहत देने से इनकार कर दिया।

फैसले का असर

राजस्थान हाईकोर्ट का यह फैसला साइबर अपराध से जुड़े मामलों में अहम है। कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया है कि यदि जांच के दौरान रिकॉर्ड में बड़े पैमाने पर धन के लेनदेन, कई राज्यों तक फैले नेटवर्क और संगठित अपराध के संकेत मिलते हैं, तो केवल निर्दोष होने का दावा जमानत पाने के लिए पर्याप्त नहीं होगा।

यह फैसला बताता है कि साइबर अपराध के मामलों में कोर्ट जमानत पर फैसला करते समय पुलिस जांच, रिकॉर्ड में मौजूद सबूत और मामले की गंभीरता को अहम मानती है।

साथ ही हाईकोर्ट ने साफ किया कि अगर शुरुआती जांच में गैंग बनाकर साइबर ठगी करने, कई राज्यों में फैले नेटवर्क और बड़ी रकम के लेनदेन की बात सामने आती है, तो जमानत देने में जल्दबाजी नहीं की जाएगी।

इस फैसले से साफ है कि अगर साइबर ठगी के पीछे गैंग, कई राज्यों में फैला नेटवर्क और बड़ी रकम के लेनदेन के संकेत मिलते हैं, तो ऐसे मामलों में कोर्ट आसानी से जमानत नहीं देगी।

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