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बयाना विधायक डॉ. रितु बनावत का चुनाव बरकरार-याचिका खारिज, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया को लंबा खिचने पर लगा 1 लाख का जुर्माना

Rajasthan High Court Upholds Bayana MLA Ritu Banawat's Election, Dismisses Petition; Imposes ₹1 Lakh Cost for Evading Summons

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने भरतपुर के बयाना विधानसभा क्षेत्र से वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में निर्वाचित विधायक डॉ. रितु बनावत के निर्वाचन को चुनौती देने वाली चुनाव याचिका के मामले में बनावत को बड़ी राहत देते हुए याचिका को खारिज कर दिया है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में पूरी तरह असफल रहा कि प्रत्याशी ने नामांकन के समय अपनी संपत्ति, देनदारियों अथवा अन्य आवश्यक जानकारियों को इस प्रकार छिपाया था, जिससे चुनाव परिणाम प्रभावित हुआ हो या जिसे भ्रष्ट आचरण (Corrupt Practice) माना जा सके।

हालांकि, राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी पाया कि निर्वाचित विधायक ने चुनाव याचिका के समन की तामील से लंबे समय तक बचने का प्रयास किया, जिससे न्यायिक प्रक्रिया अनावश्यक रूप से लगभग दस महीने तक प्रभावित हुई।

जनप्रतिनिधियों को सख्त संदेश

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले के जरिए सार्वजनिक पदों पर आसीन जनप्रतिनिधियों के लिए कड़ा संदेश देते हुए स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया से बचने या उसे अनावश्यक रूप से विलंबित करने का प्रयास स्वीकार नहीं किया जाएगा।

भले ही चुनाव वैध पाया जाए, लेकिन न्यायालय ऐसे आचरण पर आर्थिक दंड लगाने से भी पीछे नहीं हटेगा।

हाईकोर्ट ने विधायक के इस आचरण को गंभीर मानते हुए विधायक डॉ. रितु बनावत पर ₹1 लाख की लागत (Cost) लगाते हुए यह राशि याचिकाकर्ता को 30 दिनों के भीतर अदा करने का आदेश दिया है।

न्यायमूर्ति सुदेश बंसल की एकलपीठ ने रिपोर्टेबल निर्णय के जरिए यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

चुनाव याचिका में क्या था विवाद?

याचिकाकर्ता पुरुषोत्तम लाल, जो स्वयं भी बयाना विधानसभा चुनाव के उम्मीदवार थे, ने सीधे जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 80 एवं 81 के तहत राजस्थान हाईकोर्ट में चुनाव याचिका दायर की थी।

याचिका में आरोप लगाया गया कि विजयी प्रत्याशी डॉ. रितु बनावत ने नामांकन पत्र के साथ प्रस्तुत फॉर्म-26 में अपनी संपत्तियों, बैंक खातों, देनदारियों और अन्य आवश्यक जानकारियों का पूर्ण एवं सही खुलासा नहीं किया।

याचिका में कहा गया कि कई कॉलम रिक्त छोड़े गए और कुछ जानकारियां जानबूझकर छिपाई गईं, जिससे मतदाताओं के सूचना के अधिकार का उल्लंघन हुआ।

याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि केवल विजयी प्रत्याशी ही नहीं, बल्कि अन्य उम्मीदवारों के नामांकन भी विभिन्न कारणों से दोषपूर्ण थे और उन्हें भी निरस्त किया जाना चाहिए था।

स्वयं को निर्वाचित घोषित करने की मांग

मामले की सबसे रोचक बात यह रही कि याचिकाकर्ता ने अदालत से यह भी प्रार्थना की कि यदि अन्य सभी उम्मीदवारों के नामांकन निरस्त कर दिए जाएं तो वे अकेले वैध उम्मीदवार बचेंगे और उन्हें निर्विरोध निर्वाचित विधायक घोषित किया जाए।

चुनाव परिणाम क्या था?

रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में डॉ. रितु बनावत को 1,05,748 मत प्राप्त हुए, जबकि याचिकाकर्ता पुरुषोत्तम लाल को मात्र 689 मत मिले।

अन्य सभी उम्मीदवारों को मिलाकर भी प्राप्त मत विजयी उम्मीदवार के मतों से कम रहे। इसी तथ्य को अदालत ने अपने निर्णय में महत्वपूर्ण माना।

याचिकाकर्ता का पक्ष

याचिका में दावा किया गया कि प्रत्याशी ने अपने कुछ बैंक खातों का उल्लेख नहीं किया। बैंक खातों में जमा राशि का सही विवरण नहीं दिया। साथ ही, फॉर्म-26 में अधूरी एवं गलत जानकारी देकर चुनाव आयोग और मतदाताओं को गुमराह किया गया।

याचिकाकर्ता का कहना था कि सुप्रीम कोर्ट के Association for Democratic Reforms, PUCL, Resurgence India, Krishnamoorthy तथा अन्य मामलों में यह स्पष्ट किया जा चुका है कि उम्मीदवार के लिए सभी आवश्यक जानकारियों का पूर्ण खुलासा करना अनिवार्य है और यदि कोई कॉलम खाली छोड़ा जाता है अथवा महत्वपूर्ण जानकारी छिपाई जाती है तो नामांकन निरस्त किया जा सकता है।

याचिका में यह भी दलील दी गई कि मतदाताओं का यह मौलिक अधिकार है कि वे प्रत्याशी की वास्तविक आर्थिक स्थिति, संपत्तियों और अन्य विवरणों की सही जानकारी प्राप्त करें।

यदि जानकारी छिपाई जाती है तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करती है तथा इसे भ्रष्ट आचरण (Corrupt Practice) माना जाना चाहिए।

प्रतिवादी डॉ. रितु बनावत का पक्ष

विधायक डॉ. रितु बनावत की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने चुनाव याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याचिका तथ्यों और कानून दोनों के स्तर पर निराधार है तथा इसे केवल चुनाव परिणाम को चुनौती देने के उद्देश्य से दायर किया गया है।

विधायक की ओर से कहा गया कि नामांकन पत्र के साथ आवश्यक सभी मूल सूचनाएं विधिवत प्रस्तुत की गई थीं। किसी भी महत्वपूर्ण संपत्ति अथवा देनदारी को जानबूझकर नहीं छिपाया गया।

विधायक ने कहा कि जिन बैंक खातों का उल्लेख नहीं होने का आरोप लगाया गया है, उनमें नगण्य राशि थी और उनकी कुल चल संपत्ति का मूल्य पहले ही फॉर्म-26 में दर्शाया जा चुका था।

जवाब में कहा गया कि पति की संपत्तियों और बैंक खातों का विवरण भी उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार सही था तथा कोई वास्तविक तथ्य छिपाया नहीं गया।

आरोपों का जवाब देते हुए विधायक की ओर से कहा गया कि जिस संपत्ति को छिपाने का आरोप लगाया गया, वह नामांकन से पूर्व विक्रय अनुबंध (Agreement to Sell) के अधीन थी या फिर उस पर अलग स्वामित्व संबंधी स्थिति थी।

सोशल मीडिया अकाउंट का जवाब

विधायक की ओर से सोशल मीडिया को लेकर कहा गया कि सोशल मीडिया अकाउंट का पृथक उल्लेख न होने से किसी मतदाता को भ्रमित नहीं किया गया, क्योंकि मोबाइल नंबर, ई-मेल और अन्य पहचान संबंधी जानकारी पहले से सार्वजनिक थी।

चुनाव व्यय के लिए खोले गए बैंक खाते की पृथक जानकारी देना कानूनन अनिवार्य नहीं था।

विधायक की ओर से कहा गया कि गृहिणी होने के बावजूद कृषि आय होना कानून के विरुद्ध नहीं है और इसे लेकर लगाए गए आरोप तथ्यहीन हैं।

यह भी कहा गया कि चुनाव याचिका में लगाए गए अधिकांश आरोप तकनीकी प्रकृति के हैं और उनसे न तो चुनाव परिणाम प्रभावित हुआ और न ही किसी मतदाता को गुमराह किया गया।

अदालत ने किन आरोपों पर विचार किया?

याचिका में अनेक आरोप लगाए गए थे, जिनमें प्रमुख रूप से सोशल मीडिया अकाउंट का खुलासा नहीं करना, कुछ बैंक खातों का उल्लेख नहीं करना, पति के बैंक खातों की जानकारी में कथित त्रुटियां, कुछ संपत्तियों का उल्लेख नहीं करना, चल एवं अचल संपत्तियों के विवरण में विसंगतियां तथा फॉर्म-26 में अपूर्ण जानकारी देना शामिल था।

इन सभी आरोपों पर अदालत ने विस्तार से साक्ष्यों और दस्तावेजों की जांच की।

सोशल मीडिया अकाउंट छिपाने का आरोप क्यों नहीं माना?

याचिकाकर्ता का कहना था कि प्रत्याशी ने अपने फेसबुक और ट्विटर (अब एक्स) अकाउंट का खुलासा नहीं किया।

लेकिन अदालत ने कहा कि प्रत्याशी ने अपना मोबाइल नंबर और ई-मेल पता पहले ही घोषित किया था।

उन्हीं के आधार पर सोशल मीडिया अकाउंट आसानी से खोजे जा सकते थे। स्वयं याचिकाकर्ता ने भी स्वीकार किया कि उसने इन्हीं जानकारियों के आधार पर अकाउंट खोज लिए थे।

अदालत ने कहा कि इससे किसी मतदाता या अन्य प्रत्याशी को गुमराह किए जाने का कोई प्रमाण नहीं है और इसे महत्वपूर्ण जानकारी छिपाना नहीं माना जा सकता।

बैंक खातों पर हाईकोर्ट की टिप्पणी

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि प्रत्याशी ने अपने कुछ बैंक खातों का उल्लेख नहीं किया।

हाईकोर्ट ने पाया कि जिन खातों का उल्लेख नहीं किया गया, उनमें नगण्य राशि थी तथा कुल चल संपत्ति का मूल्य पहले ही घोषित किया जा चुका था।

हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे यह सिद्ध हो कि प्रत्याशी ने अपनी वास्तविक संपत्ति छिपाई या मतदाताओं को भ्रमित करने का प्रयास किया।

पति की संपत्तियों को लेकर

याचिका में यह भी आरोप था कि प्रत्याशी ने अपने पति की कुछ संपत्तियों और बैंक खातों का सही विवरण नहीं दिया।

लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध बैंक रिकॉर्ड, आयकर विवरण और अन्य दस्तावेजों से यह साबित नहीं होता कि किसी महत्वपूर्ण संपत्ति को जानबूझकर छिपाया गया था।

इसलिए भ्रष्ट आचरण का आरोप सिद्ध नहीं हुआ।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में चुनावी पारदर्शिता और मतदाताओं के सूचना के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट के Association for Democratic Reforms, PUCL बनाम Union of India, Resurgence India, Krishnamoorthy, Public Interest Foundation तथा Ajmera Shyam सहित अनेक ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि फॉर्म-26 में सही जानकारी देना लोकतांत्रिक व्यवस्था की महत्वपूर्ण आवश्यकता है, क्योंकि मतदाता को उम्मीदवार के बारे में जानकारी प्राप्त करने का मौलिक अधिकार है।

केवल तकनीकी त्रुटि से चुनाव रद्द नहीं होगा

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक त्रुटि या अपूर्णता चुनाव निरस्त करने का आधार नहीं बन सकती।

यदि यह साबित नहीं होता कि महत्वपूर्ण जानकारी जानबूझकर छिपाई गई, मतदाता गुमराह हुए, चुनाव परिणाम प्रभावित हुआ या भ्रष्ट आचरण किया गया, तो चुनाव रद्द नहीं किया जा सकता।

वोटों का भारी अंतर-महत्वपूर्ण आधार

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि विजयी प्रत्याशी को एक लाख से अधिक मत मिले, जबकि याचिकाकर्ता को केवल 689 मत प्राप्त हुए।

अन्य सभी उम्मीदवारों के मत जोड़ देने पर भी परिणाम नहीं बदलता।

ऐसी स्थिति में यह कहना कि अन्य उम्मीदवारों के नामांकन निरस्त होने पर याचिकाकर्ता निर्वाचित घोषित हो जाए, विधिक रूप से स्वीकार्य नहीं है।

फिर भी ₹1 लाख की लागत?

यद्यपि राजस्थान हाईकोर्ट ने चुनाव को वैध माना, लेकिन उसने विधायक के आचरण पर कड़ी टिप्पणी की।

रिकॉर्ड के अनुसार चुनाव याचिका दायर होने के बाद काफी समय तक समन की विधिवत तामील नहीं हो सकी। बाद में विधानसभा सचिवालय के माध्यम से समन की सेवा हुई।

हाईकोर्ट ने कहा कि एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करे।

यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर समन से बचता है और मुकदमे की सुनवाई को लंबा खींचने का प्रयास करता है, तो यह न्यायिक प्रक्रिया के विपरीत है।

इसलिए राजस्थान हाईकोर्ट ने इसे विधायक का अनुचित आचरण मानते हुए ₹1,00,000 की लागत लगाई।

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने अंतिम निष्कर्ष में कहा कि याचिकाकर्ता किसी भी आरोप को कानूनी रूप से सिद्ध नहीं कर पाया।

प्रत्याशी का नामांकन रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता। चुनाव परिणाम को शून्य घोषित करने का भी कोई कारण नहीं है।

हाईकोर्ट ने चुनाव याचिका को पूर्णतः खारिज करने का आदेश दिया। हालांकि, न्यायिक प्रक्रिया से बचने के कारण विधायक पर ₹1 लाख की लागत लगाने का भी आदेश दिया।

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