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समझौता डिक्री पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: क्लाइंट की मंजूरी के बिना वकील नहीं कर सकता समझौता, सभी पक्षों के हस्ताक्षर जरूरी, 28 साल पुरानी समझौता डिक्री रद्द

Supreme Court Restricts Banks From Blacklisting Advocates Over Professional Negligence

नई दिल्ली: सिविल मामलों में समझौता डिक्री (कॉम्प्रोमाइज डिक्री) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है।

कोर्ट ने कहा कि किसी मुकदमे में केवल वकील के हस्ताक्षर के आधार पर समझौते को वैध नहीं माना जा सकता। जब तक पक्षकार की स्पष्ट मंजूरी न हो, वकील उसकी ओर से समझौता नहीं कर सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कोई भी वकील अपने क्लाइंट की स्पष्ट मंजूरी के बिना उसकी ओर से किसी मुकदमे में समझौता नहीं कर सकता।

कोर्ट ने कहा कि यदि किसी समझौते पर संबंधित पक्ष की सहमति और हस्ताक्षर नहीं हैं, तो ऐसा समझौता कानून के मुताबिक मान्य नहीं माना जाएगा।

इसी सिद्धांत के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने करीब 28 साल पहले पारित एक समझौता डिक्री को रद्द करने के पटना हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमैकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा कि:

वकील वही कर सकता है, जिसकी मंजूरी उसका क्लाइंट देता है। वह अपनी मर्जी से ऐसा कोई समझौता नहीं कर सकता, जिससे क्लाइंट के कानूनी अधिकार प्रभावित हों। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि समझौता तभी मान्य होगा, जब वह लिखित हो और उस पर सभी पक्षों के हस्ताक्षर हों।

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क्या था विवाद: सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा मामला ?

यह मामला 1989 में दायर पुश्तैनी संपत्ति के बंटवारे के मुकदमे से जुड़ा था। परिवार के एक सदस्य ने अपने हिस्से की मांग करते हुए सिविल कोर्ट में केस दायर किया था।

मुकदमे की सुनवाई के दौरान साल 1994 में यह कहा गया कि सभी पक्षों के बीच समझौता हो गया है। इसके आधार पर ट्रायल कोर्ट ने 22 फरवरी 1994 को समझौता डिक्री पारित कर दी और बाद में 1997 में अंतिम डिक्री भी जारी हो गई। लगभग 28 वर्षों तक इस समझौते पर कोई विवाद सामने नहीं आया।

लेकिन यहीं से असली समस्या शुरू हुई। बाद में एक पक्ष ने कहा कि उसे इस समझौते के बारे में कोई जानकारी ही नहीं थी। उसने न तो किसी कागज पर साइन किए और न ही उसे कोर्ट में क्या चल रहा है, इसका पता था।

यानी जिस व्यक्ति के हक का फैसला हो गया, उसे खुद ही पता नहीं था कि उसके नाम पर क्या तय हो रहा है। यही बात आगे चलकर इस पूरे केस की जड़ बन गई।

2022 में प्रतिवादी संख्या-5 के कानूनी उत्तराधिकारियों ने इस कॉम्प्रोमाइज डिक्री को चुनौती दे दी। उनका कहना था कि उनके पूर्वज ने न तो इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे और न ही किसी वकील को उनकी ओर से समझौता करने की मंजूरी दी थी।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि वकालतनामा और लिखित बयान पर किए गए हस्ताक्षर जाली थे और पूरे मामले में धोखाधड़ी की गई थी।

ट्रायल कोर्ट ने शुरुआती सुनवाई में इन दलीलों को गंभीर माना और समझौता डिक्री रद्द कर दी। पटना हाईकोर्ट ने भी इस आदेश को सही ठहराया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

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सालों बाद मामला फिर कैसे खुला?

यह मामला करीब दो दशक तक शांत रहा। कोई बड़ा विवाद सामने नहीं आया। लेकिन करीब 22 साल बाद जब दूसरे पक्ष ने उस जमीन से लोगों को हटाने की कोशिश की, तब जाकर मामला फिर से सामने आया।

तब प्रभावित लोगों को पता चला कि उनके नाम पर पहले ही एक समझौता हो चुका है और उसी के आधार पर उन्हें हटाया जा रहा है। इसके बाद उन्होंने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और कहा कि उनके साथ धोखा हुआ है।

उन्होंने साफ कहा कि उन्हें कभी भी इस केस या समझौते की जानकारी नहीं दी गई।

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को गंभीरता से लिया और कहा कि अगर किसी को उसके हक से बिना बताए दूर किया गया है, तो सिर्फ देरी के कारण उसकी बात को नहीं ठुकराया जा सकता।

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समझौते पर उठे बड़े सवाल?

जब मामला कोर्ट में आया, तो समझौते को लेकर कई सवाल खड़े हो गए।

सबसे बड़ा सवाल यह था कि जिस व्यक्ति के नाम पर समझौता दिखाया गया, क्या वह सच में उस परिवार का हिस्सा था या नहीं। एक पक्ष कह रहा था कि वह परिवार का सदस्य ही नहीं था, जबकि दूसरा पक्ष कह रहा था कि उसका पूरा हक बनता है।

इसके अलावा यह भी कहा गया कि उसका नाम जमीन के रिकॉर्ड में गलती से चढ़ गया था। वहीं दूसरी तरफ यह दावा किया गया कि उसका नाम सही था और उसे संपत्ति में हिस्सा मिलना चाहिए।

एक और बड़ी बात यह सामने आई कि जिस वकील ने उसकी तरफ से कोर्ट में बात रखी, क्या उसे ऐसा करने की इजाजत थी या नहीं। यानी यह भी साफ नहीं था कि वह वकील सच में उस व्यक्ति की तरफ से पेश हो रहा था या नहीं।

इन सब बातों से यह साफ हो गया कि मामला सीधा नहीं है। इसमें कई ऐसी बातें हैं जिनकी ठीक से जांच जरूरी है। कोर्ट ने भी माना कि बिना पूरी सुनवाई और सबूत देखे इस मामले का फैसला नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या 1994 का समझौता सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के ऑर्डर 23 रूल-3 के अनुसार हुआ था। रिकॉर्ड देखने के बाद कोर्ट ने साफ कहा कि इस नियम की जरूरी शर्तों का पालन नहीं किया गया था। इसलिए समझौता कानून के अनुरूप नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि किसी भी समझौते को कानूनन मान्यता तभी मिलेगी, जब वह लिखित हो, सभी पक्ष उसकी सहमति दें और उस पर उनके हस्ताक्षर हों। अगर इनमें से कोई भी शर्त पूरी नहीं होती, तो उस आधार पर दी गई कॉम्प्रोमाइज डिक्री मान्य नहीं होगी।

‘पक्षकार की मंजूरी के बिना वकील समझौता नहीं कर सकता’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी वकील को केवल इसलिए समझौते पर हस्ताक्षर करने का अधिकार नहीं मिल जाता कि वह मुकदमे में किसी पक्ष की ओर से पेश हो रहा है। यदि वह क्लाइंट की ओर से समझौता करना चाहता है, तो उसके पास स्पष्ट और विशेष अनुमति होना जरूरी है। केवल बहुत असाधारण परिस्थितियों में ही बिना पूर्व अनुमति ऐसा कदम उठाया जा सकता है और उसका सही कारण भी रिकॉर्ड पर होना चाहिए।

कोर्ट ने पाया कि इस मामले में ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं था जिससे साबित हो कि प्रतिवादी संख्या-5 ने अपने वकील को समझौता करने की मंजूरी दी थी। न ही ऐसी कोई आपात स्थिति थी, जिसके कारण वकील को अपने स्तर पर समझौता करना पड़ता। इसलिए यह नहीं माना जा सकता कि समझौता संबंधित पक्ष की स्वेच्छा से हुआ था।

कोर्ट ने कहा कि वकील का काम अपने क्लाइंट के निर्देशों का पालन करना है। वह अपनी ओर से ऐसा कोई फैसला नहीं ले सकता, जिससे क्लाइंट के कानूनी अधिकार प्रभावित हों। ऐसे मामलों में क्लाइंट की साफ मंजूरी जरूरी है।

समझौता डिक्री पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कानून

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने समझौता डिक्री से जुड़े पुराने फैसलों का भी हवाला दिया और पूरे देश के लिए कानून स्पष्ट किया।

कोर्ट ने कहा कि 1976 से पहले मौखिक समझौते को भी मान्यता दी जा सकती थी। लेकिन कानून में बदलाव के बाद अब समझौता लिखित होना और उस पर सभी पक्षों के हस्ताक्षर होना जरूरी है। ऐसा नियम इसलिए बनाया गया, ताकि फर्जी या मनगढ़ंत समझौतों के आधार पर मामलों का निपटारा न हो सके।

कोर्ट ने कहा कि समझौता दोनों पक्षों की अपनी इच्छा से होना चाहिए। सिर्फ समझौता पेश कर देने से काम नहीं चल जाएगा। कोर्ट की जिम्मेदारी यह भी है कि वह जांच करे कि समझौता कानून के मुताबिक है या नहीं। अगर उसमें कोई कानूनी कमी है, तो उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर किसी को कॉम्प्रोमाइज डिक्री पर आपत्ति है, तो उसे उसी कोर्ट में रिकॉल आवेदन देना होगा, जिसने वह डिक्री पारित की थी। इसके लिए अलग से नया मुकदमा या सामान्य अपील दायर नहीं की जा सकती।

28 साल बाद चुनौती और देरी पर कोर्ट का रुख

इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह था कि करीब 28 साल बाद कॉम्प्रोमाइज डिक्री को चुनौती दी गई। अपीलकर्ताओं का कहना था कि 1994 में पारित कॉम्प्रोमाइज डिक्री को करीब 28 साल बाद चुनौती दी गई। इसलिए इतने लंबे समय बाद इस मामले की सुनवाई नहीं होनी चाहिए।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह दलील स्वीकार नहीं की। कोर्ट ने कहा कि यदि केवल देरी के आधार पर याचिका खारिज कर दी जाए, तो एक ऐसा समझौता कायम रहेगा जो पहली नजर में ही कानून के मुताबिक नहीं है और ऐसा नहीं होने दिया जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि इस मामले में अभी कई अहम तथ्यों की जांच होना बाकी है। एक पक्ष का कहना है कि समझौता फर्जी था, जबकि दूसरा उसे सही बता रहा है। ऐसे विवादों का फैसला बिना पूरी सुनवाई और सबूतों की जांच के नहीं किया जा सकता। इसलिए इस मामले में सिर्फ देरी के आधार पर राहत देने से इनकार नहीं किया जा सकता।

हालांकि कोर्ट ने यह भी साफ किया कि हर मामले में लंबे समय बाद दायर याचिका स्वीकार नहीं की जाएगी। इसका फैसला हर मामले के तथ्यों के आधार पर होगा।

अंतिम फैसला: समझौता डिक्री रद्द, अपील खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए अपील खारिज कर दी। इसके साथ ही 1994 की समझौता डिक्री रद्द करने का आदेश बरकरार रखा गया।

कोर्ट ने माना कि समझौता डिक्री को रद्द करने का फैसला सही था, क्योंकि मामले में कई ऐसी बातें थीं जिनकी जांच जरूरी थी।

कोर्ट ने कहा कि अब पुश्तैनी संपत्ति के बंटवारे का पूरा मुकदमा दोबारा नियमित सुनवाई के जरिए तय किया जाएगा। भले ही इस मुकदमे को शुरू हुए 37 साल हो चुके हैं, लेकिन पक्षकारों के अधिकारों का फैसला बिना सबूतों की पूरी जांच किए नहीं किया जा सकता। इसलिए मामले की सुनवाई ट्रायल के जरिए ही आगे बढ़ेगी।

इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस केस में किसी भी पक्ष पर कोई अतिरिक्त खर्च या जुर्माना नहीं लगाया जाएगा।

देर से ही सही, लेकिन न्याय जरूरी: सुप्रीम कोर्ट

इस फैसले से यह साफ है कि अगर किसी के साथ अन्याय हुआ है, तो वह देर से भी न्याय मांग सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर दिखाया कि कोर्ट का सबसे बड़ा उद्देश्य न्याय सुनिश्चित करना है, न कि केवल समयसीमा के आधार पर मामलों को खत्म करना। यानी न्याय में देरी हो सकती है, लेकिन सही मामला हो तो न्याय मिलकर ही रहेगा।

फैसले का असर क्या होगा ?

यह फैसला सिर्फ इस एक मामले तक सीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इसके जरिए कॉम्प्रोमाइज डिक्री से जुड़े कानून को भी स्पष्ट कर दिया है, जिसका असर देशभर में ऐसे मामलों पर पड़ेगा।

इस फैसले के बाद यह साफ हो गया है कि वकील अपने क्लाइंट की मंजूरी के बिना उसकी ओर से समझौता नहीं कर सकता। साथ ही किसी भी कॉम्प्रोमाइज डिक्री को मान्यता देने से पहले कोर्ट को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि समझौता सभी पक्षों की सहमति से हुआ है और कानून की सभी शर्तें पूरी हुई हैं। इससे भविष्य में फर्जी या विवादित समझौतों पर रोक लगाने में मदद मिलेगी।

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