नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने किरायेदारी कानून और बैंक मर्जर को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि किसी किरायेदार संस्था का दूसरी संस्था में विलय हो जाता है और बिना मकान मालिक की लिखित अनुमति के किरायेदारी अधिकार किसी दूसरी इकाई को ट्रांसफर हो जाते हैं, तो यह ‘पजेशन ट्रांसफर’ (कब्जे का हस्तांतरण) माना जाएगा और मकान मालिक को बेदखली का अधिकार मिल जाएगा।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर किसी बैंक का दूसरे बैंक में विलय हो जाता है और उसके साथ किरायेदारी का अधिकार भी नए बैंक के पास चला जाता है, तो यह नहीं माना जा सकता कि मकान मालिक के अधिकार खत्म हो गए।
यदि मकान मालिक की लिखित मंजूरी के बिना किरायेदारी दूसरे बैंक को चली जाती है, तो दिल्ली किराया नियंत्रण कानून के तहत बेदखली की कार्रवाई की जा सकती है।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) के खिलाफ बेदखली का आदेश बहाल कर दिया।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने कहा कि कानून यह नहीं देखता कि किरायेदारी का हस्तांतरण स्वेच्छा से हुआ या किसी योजना के तहत।
अगर किरायेदार बदल गया और मकान मालिक की लिखित सहमति नहीं ली गई, तो दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम की धारा 14(1)(b) लागू होगी।
79 साल पुराने किराये से शुरू हुआ विवाद
यह मामला नई दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित प्रताप बिल्डिंग का है। वर्ष 1947 में ब्रिटिश मोटर कार कंपनी ने अपनी व्यावसायिक संपत्ति हिंदुस्तान कमर्शियल बैंक को किराये पर दी थी। कई दशक तक बैंक वहीं से काम करता रहा।
बाद में वर्ष 1986 में केंद्र सरकार ने बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट के तहत हिंदुस्तान कमर्शियल बैंक का पंजाब नेशनल बैंक में विलय कर दिया। विलय के बाद उसी परिसर से पीएनबी ने काम शुरू कर दिया।
मकान मालिक का कहना था कि उनकी लिखित मंजूरी के बिना किरायेदारी दूसरे बैंक को सौंप दी गई, इसलिए पीएनबी वहां किरायेदार के रूप में नहीं रह सकता। इसी आधार पर बेदखली की मांग की गई।
तीन अलग फैसलों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सुलझाया विवाद
सबसे पहले अतिरिक्त रेंट कंट्रोलर ने मकान मालिक की याचिका खारिज कर दी। इसके बाद रेंट कंट्रोल ट्रिब्यूनल ने यह फैसला पलटते हुए पीएनबी को परिसर खाली करने का आदेश दिया।
बाद में पीएनबी ने इस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल का फैसला रद्द कर दिया और कहा कि बैंक का विलय कानून के तहत हुआ था, इसलिए इसे अवैध किरायेदारी नहीं माना जा सकता।
इसके बाद मकान मालिक सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। जहां सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए रेंट कंट्रोल ट्रिब्यूनल का आदेश फिर से बहाल कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला पलटा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम की धारा 14(1)(b) बहुत स्पष्ट है। इसके तहत अगर किरायेदार मकान मालिक की लिखित मंजूरी के बिना किरायेदारी किसी दूसरे व्यक्ति या संस्था को सौंप देता है या कब्जा छोड़ देता है, तो बेदखली का आधार बन जाता है।
कोर्ट ने कहा कि इस धारा में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि सिर्फ स्वेच्छा से किया गया किरायेदारी का हस्तांतरण ही बेदखली का आधार बनेगा।
अगर किसी भी वजह से किरायेदारी और परिसर का कब्जा दूसरे व्यक्ति या संस्था के पास चला जाता है और इसके लिए मकान मालिक की लिखित मंजूरी नहीं ली गई है, तब भी दिल्ली किराया नियंत्रण कानून की धारा 14(1)(b) लागू होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में धारा 14(1)(b) लागू होने की दोनों शर्तें पूरी हो गई थीं।
- पहला, हिंदुस्तान कमर्शियल बैंक का पीएनबी में विलय होने के बाद उसकी किरायेदारी और परिसर का कब्जा पीएनबी के पास चला गया।
- दूसरा, इसके लिए मकान मालिक की लिखित मंजूरी नहीं ली गई। इसलिए बेदखली का आधार पूरी तरह बनता है।
‘बैंक मर्जर से मकान मालिक के अधिकार खत्म नहीं होते’
पीएनबी की ओर से दलील दी गई कि बैंक का विलय कानून के तहत लागू योजना के मुताबिक हुआ था। इसलिए इसे सामान्य किरायेदारी ट्रांसफर मानकर बेदखली का आधार नहीं बनाया जा सकता।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह दलील स्वीकार नहीं की। कोर्ट ने कहा कि बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट के तहत बनी विलय योजना प्रशासनिक प्रकृति की होती है, उसे ऐसा कानून नहीं माना जा सकता जो दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम के प्रावधानों को खत्म कर दे।
कोर्ट ने कहा कि किसी बैंक का विलय होने से मकान मालिक के कानूनी अधिकार अपने-आप समाप्त नहीं हो जाते। अगर किरायेदारी नए बैंक को चली जाती है, तब भी मकान मालिक की लिखित मंजूरी जरूरी रहेगी।
‘किरायेदारी बदलने का कारण नहीं, मालिक की सहमति अहम’
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि धारा 14(1)(b) लागू करने के लिए यह देखना जरूरी नहीं है कि किरायेदारी स्वेच्छा से बदली गई या किसी कानूनी प्रक्रिया के कारण।
अहम बात सिर्फ यह है कि क्या मूल किरायेदार की जगह किसी दूसरे व्यक्ति या संस्था ने परिसर का कब्जा ले लिया और क्या इसके लिए मकान मालिक की लिखित मंजूरी ली गई थी।
कोर्ट ने कहा कि जब मूल किरायेदार का अस्तित्व ही समाप्त हो गया और उसकी जगह दूसरा बैंक परिसर का उपयोग करने लगा, तो इसे किरायेदारी के हस्तांतरण से अलग नहीं माना जा सकता।
बेदखली बरकरार, पीएनबी को परिसर खाली करने की दी मोहलत
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और रेंट कंट्रोल ट्रिब्यूनल द्वारा दिया गया बेदखली का आदेश बहाल कर दिया।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी ध्यान रखा कि पीएनबी कई वर्षों से इस परिसर में काम कर रहा है। इसलिए कोर्ट ने पीएनबी को तुरंत परिसर खाली करने का आदेश नहीं दिया।
कोर्ट ने बैंक को 31 जनवरी 2027 तक का समय दिया है। साथ ही कहा कि पीएनबी चार सप्ताह के भीतर लिखित आश्वासन दे कि वह तय समय तक परिसर खाली कर देगा। तब तक बैंक पहले की तरह किराया देता रहेगा। अगर तय शर्तों का पालन नहीं किया गया, तो मकान मालिक कानून के मुताबिक परिसर का कब्जा लेने की कार्रवाई कर सकेगा।
मकान मालिकों और किरायेदारों के लिए अहम फैसला
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सिर्फ बैंकों तक सीमित नहीं है। कोर्ट ने साफ कर दिया कि किसी भी संस्था के विलय या पुनर्गठन से मकान मालिक के अधिकार खत्म नहीं होते।
अगर विलय के कारण किरायेदारी किसी दूसरी संस्था के पास चली जाती है और कानून के तहत मकान मालिक की लिखित मंजूरी जरूरी है, तो उस शर्त का पालन करना होगा।
यह फैसला बैंक मर्जर, कंपनी विलय और संस्थागत पुनर्गठन से जुड़े उन सभी मामलों में अहम है, जहां किराये की संपत्ति का अधिकार एक संस्था से दूसरी संस्था को चला जाता है। साथ ही, यह भी स्पष्ट करता है कि विशेष कानून होने के बावजूद किरायेदारी से जुड़े अधिकार अपने-आप खत्म नहीं होते और मकान मालिक की सहमति की एहमियत बनी रहती है।
साथ ही, यह भी स्पष्ट करता है कि बैंक का विलय होने भर से मकान मालिक के अधिकार खत्म नहीं हो जाते और जहां कानून लिखित मंजूरी जरूरी मानता है, वहां उसका पालन करना होगा।
यह फैसला साफ करता है कि बैंक मर्जर के बाद भी किरायेदारी से जुड़े कानूनी नियम पहले की तरह लागू रहेंगे और मकान मालिक की लिखित मंजूरी की शर्त को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।