नई दिल्ली: जेलों में बंद बुजुर्ग और गंभीर बीमार कैदियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम आदेश जारी किया है।
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान समेत सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को तीन महीने के भीतर ऐसे कैदियों की समय से रिहाई के लिए स्पष्ट नीति बनाने का निर्देश दिया है।
साथ ही हर आवेदन की डिजिटल ट्रैकिंग, मेडिकल बोर्ड से जांच और तय समय में फैसला करने की व्यवस्था लागू करने को कहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि :
‘किसी कैदी के जेल में होने का मतलब यह नहीं है कि उसके संविधान से मिले सम्मान और गरिमा के अधिकार खत्म हो जाते हैं। कोर्ट ने कहा कि महज जेल में होने से किसी व्यक्ति के संवैधानिक अधिकार खत्म नहीं होता। उम्र या गंभीर बीमारी की वजह से जेल में अनावश्यक पीड़ा झेल रहे कैदियों के मामलों में संवेदनशील और समयबद्ध फैसला होना चाहिए।’
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि बुजुर्ग और गंभीर बीमार कैदियों की रिहाई के लिए पूरे देश में एक समान व्यवस्था लागू होनी चाहिए।
ऐसी प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए कि आवेदन लंबित रहने की वजह से कोई कैदी अपने जीवन के आखिरी दिन भी जेल में ही बिताने को मजबूर हो जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को निर्देश दिया कि वे मेडिकल जांच, आवेदन की सुनवाई और फैसला लेने की पूरी प्रक्रिया तय समय में पूरी करें। हर फैसले का रिकॉर्ड डिजिटल रूप से रखा जाए, ताकि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी रहे।
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से स्पष्ट है कि अब राज्यों को ऐसे मामलों में स्पष्ट नियम, तय समय सीमा और जवाबदेही तय करनी होगी।
इससे बुजुर्ग और गंभीर बीमार कैदियों की रिहाई से जुड़े मामलों में अनावश्यक देरी कम होगी और पूरी प्रक्रिया पहले से ज्यादा पारदर्शी बनेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि बुजुर्ग और गंभीर बीमार कैदियों के मामलों को सामान्य कैदियों की तरह नहीं देखा जा सकता। उनकी उम्र और स्वास्थ्य भी फैसला लेने में महत्वपूर्ण आधार होंगे।
सुप्रीम कोर्ट को दखल क्यों देना पड़ा?
यह मामला राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। नालसा ने देशभर में विशेष अभियान चलाकर बुजुर्ग और गंभीर बीमार कैदियों की स्थिति का अध्ययन किया था।
अभियान के दौरान देशभर में ऐसे 5,393 कैदियों की पहचान हुई, जो या तो बुजुर्ग हैं या गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं।
इनमें 70 साल से अधिक उम्र के कई दोषी कैदी और गंभीर बीमारी से पीड़ित कैदी शामिल हैं।
नालसा ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि कई जेलों में ऐसे कैदी अब भी बंद हैं, जबकि उनकी उम्र और स्वास्थ्य को देखते हुए उनके मामलों पर मानवीय आधार पर विचार किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि पहले से बनी व्यवस्थाएं होने के बावजूद कई राज्यों में उनका सही तरीके से पालन नहीं हो रहा है। इसी को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दखल देते हुए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए।
जेल में कैदियों के अधिकार खत्म नहीं हो जाते: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जेल सजा देने की जगह है, लेकिन वहां भी संविधान लागू रहता है। किसी व्यक्ति को जेल भेजने का मतलब यह नहीं है कि उसके सम्मान के साथ जीने का अधिकार खत्म हो जाए।
सुप्रीम ने कहा कि अगर कोई कैदी गंभीर बीमारी से जूझ रहा है या बहुत अधिक उम्र का हो चुका है, तो उसके मामले में मानवीय दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है। सजा कभी भी अमानवीय व्यवहार में नहीं बदलनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जेलों में हर जगह गंभीर बीमार कैदियों के इलाज और देखभाल की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होती। ऐसे में जरूरत पड़ने पर समय से रिहाई जैसे विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिए।
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रिहाई की प्रक्रिया कैसे चलेगी ?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में बुजुर्ग और गंभीर बीमार कैदियों की समय से रिहाई के लिए पूरी प्रक्रिया भी तय की है। कोर्ट ने कहा कि सबसे पहले अंडरट्रायल रिव्यू कमेटी (यूटीआरसी) ऐसे मामलों की समीक्षा करेगी और पात्र कैदियों की पहचान करेगी।
इसके बाद जेल अधीक्षक के माध्यम से संबंधित कैदियों का मामला राज्य सरकार के पास भेजा जाएगा।
गंभीर बीमारी के मामलों में मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट भी साथ भेजी जाएगी, ताकि राज्य सरकार पूरी जानकारी के आधार पर फैसला ले सके।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह पूरी प्रक्रिया तय समय के भीतर पूरी होनी चाहिए। हर चरण का रिकॉर्ड ई-प्रिज़न्स पोर्टल पर दर्ज किया जाएगा, ताकि अनावश्यक देरी न हो और पूरी प्रक्रिया पारदर्शी बनी रहे।
अगर रिहाई नहीं हुई तो क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर राज्य सरकार किसी कैदी की समय से रिहाई की सिफारिश स्वीकार नहीं करती है, तो मामला वहीं खत्म नहीं माना जाएगा। ऐसे मामलों में भी आगे कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि ऐसी स्थिति में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (डीएलएसए) संबंधित कोर्ट के सामने उचित आवेदन दाखिल करेगा।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी पात्र कैदी का मामला सिर्फ प्रशासनिक फैसले की वजह से लंबित न रह जाए।
रिहाई के बाद इलाज और मदद की भी व्यवस्था होगी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नीति सिर्फ रिहाई तक सीमित नहीं होनी चाहिए। राज्यों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि रिहा होने वाले कैदियों को इलाज, कानूनी सहायता और दूसरी जरूरी सरकारी सेवाएं समय पर मिलें।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को सामाजिक कल्याण विभाग, स्वास्थ्य सेवाओं और विधिक सेवा प्राधिकरणों के साथ मिलकर काम करने के निर्देश दिए हैं, ताकि रिहा होने के बाद भी ऐसे लोगों को जरूरी मदद मिलती रहे।
अब राज्यों को क्या-क्या करना होगा ?
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान समेत सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को तीन महीने के भीतर बुजुर्ग और गंभीर बीमार कैदियों की समय से रिहाई के लिए नई नीति बनाने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि इस नीति में पूरी प्रक्रिया साफ और समयबद्ध होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को ये प्रमुख निर्देश दिए हैं:
- तीन महीने के भीतर नई नीति बनानी होगी, जिसमें बुजुर्ग और गंभीर बीमार कैदियों की समय से रिहाई के नियम तय होंगे।
- हर राज्य में स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड बनाया जाएगा, जो यह तय करेगा कि कैदी गंभीर बीमारी से पीड़ित है या नहीं और उसकी स्वास्थ्य स्थिति क्या है।
- रिहाई के हर आवेदन पर तय समय में फैसला लेना होगा। बिना वजह देरी नहीं की जा सकती और हर आदेश का कारण भी दर्ज करना होगा।
- हर आवेदन की डिजिटल ट्रैकिंग होगी। आवेदन से लेकर मेडिकल रिपोर्ट, समिति की सिफारिश और अंतिम फैसले तक पूरी प्रक्रिया ई-प्रिज़न्स पोर्टल पर दर्ज की जाएगी।
- अंडर ट्रायल रिव्यू कमेटी नियमित रूप से ऐसे कैदियों के मामलों की समीक्षा करेगी और जरूरत होने पर जमानत, पैरोल, सजा में राहत या रिहाई की सिफारिश करेगी।
- रिहाई के बाद इलाज और दूसरी जरूरी मदद की व्यवस्था भी करनी होगी, ताकि ऐसे कैदियों को स्वास्थ्य सेवाएं और कानूनी सहायता मिलती रहे।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार हर मामले को अलग-अलग आधार पर तय करेगी और अगर किसी को रिहाई नहीं दी जाती है, तो डीएलएसए आवश्यक कानूनी कार्रवाई कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया को प्रभावी तरीके से लागू करने पर जोर देते हुए सभी संबंधित संस्थाओं को सक्रिय भूमिका निभाने के निर्देश दिए।
