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JJ Act पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: ’16-18 साल के नाबालिगों पर सीधे वयस्क की तरह मुकदमा नहीं चलाया जा सकता’, चिल्ड्रन्स कोर्ट्स को दिए अहम निर्देश; कहा-तय प्रक्रिया का पालन जरूरी

Supreme Court Sets Aside Conviction, Says Children’s Courts Cannot Automatically Try Juveniles as Adults

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट (JJ Act) के तहत 16 से 18 साल के नाबालिगों पर जघन्य अपराध के मामलों में मुकदमा चलाने की प्रक्रिया को लेकर अहम फैसला सुनाया है।

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कहा कि16 से 18 साल के किसी नाबालिग पर जघन्य अपराध के मामले में सीधे वयस्क की तरह मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि किसी नाबालिग को वयस्क की तरह ट्रायल के लिए चिल्ड्रन्स कोर्ट भेजा जाता है, तो केवल जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड की सिफारिश पर्याप्त नहीं है।

जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड द्वारा मामला चिल्ड्रन्स कोर्ट भेजे जाने के बाद भी चिल्ड्रन्स कोर्ट को पहले यह तय करना होगा कि आरोपी पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाने की जरूरत है या नहीं।

अगर यह कानूनी प्रक्रिया पूरी किए बिना ट्रायल चलाया जाता है, तो पूरी सुनवाई और उसके आधार पर हुई दोषसिद्धि कानून में टिक नहीं सकती और पूरा ट्रायल अमान्य हो सकता है।

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने हरियाणा के हत्या के एक मामले में यह फैसला सुनाते हुए आरोपी की दोषसिद्धि रद्द कर दी। कोर्ट ने कहा कि चिल्ड्रन्स कोर्ट ने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा 19(1) के तहत जरूरी आदेश दिए बिना सीधे ट्रायल चलाया, जो कानून का उल्लंघन है।

इसी आधार पर सेशन कोर्ट का फैसला और पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का आदेश दोनों रद्द कर दिए गए।

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क्या था पूरा मामला?

मामला हरियाणा के कैथल जिले का है। 21 अक्टूबर 2018 को मेले से लौट रहे एक युवक की कुछ लोगों ने घेरकर लोहे की पाइप, चाकू और डंडों से हमला कर दिया। गंभीर रूप से घायल युवक की अस्पताल में मौत हो गई।

पुलिस ने हत्या समेत कई धाराओं में मामला दर्ज कर जांच शुरू की। जांच के दौरान पुलिस ने कई आरोपियों को गिरफ्तार किया और आरोप लगाया कि उन्होंने पहले से साजिश रचकर इस वारदात को अंजाम दिया था।

वारदात के समय अपीलकर्ता की उम्र करीब 16 साल 6 महीने थी। इसलिए उसे पहले जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के सामने पेश किया गया।

बोर्ड ने शुरुआती जांच के बाद माना कि आरोपी मानसिक और शारीरिक रूप से अपराध को समझने और उसके नतीजों का अंदाजा लगाने में सक्षम है। इसके आधार पर बोर्ड ने मामला चिल्ड्रन्स कोर्ट को भेज दिया, ताकि उस पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाया जा सके।

चिल्ड्रन्स कोर्ट ने हत्या के मामले में नाबालिग को दोषी ठहराते हुए 14 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। साथ ही आदेश दिया कि 21 वर्ष की उम्र पूरी होने तक उसे ‘प्लेस ऑफ सेफ्टी’ में रखा जाए और उसके बाद जेल भेजा जाए। बाद में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा।

इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। याचिका में दलील दी गई कि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा 19(1) में तय अनिवार्य प्रक्रिया का पालन किए बिना उस पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाया गया, इसलिए पूरी सुनवाई कानून के अनुरूप नहीं थी

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चिल्ड्रन्स कोर्ट की भी अलग जिम्मेदारी: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड की प्रारंभिक जांच के बाद मामला चिल्ड्रन्स कोर्ट में पहुंचने पर उसकी भूमिका केवल ट्रायल शुरू करने तक सीमित नहीं रहती।

कानून के मुताबिक चिल्ड्रन्स कोर्ट को पहले यह तय करना होता है कि नाबालिग पर वास्तव में वयस्क की तरह मुकदमा चलाने की जरूरत है या नहीं। यह फैसला कारणों के साथ लिखित आदेश में होना चाहिए। इसके बाद ही आगे की कार्रवाई की जा सकती है।

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‘धारा 19(1) का पालन करना अनिवार्य’

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा 19(1) केवल औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह कानून की अनिवार्य शर्त है।

कहा कि धारा 19(1) का पालन करना अनिवार्य है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून में भले ही “मे” शब्द लिखा हो, लेकिन इस मामले में उसका मतलब “करना होगा” यानी अनिवार्य माना जाएगा। इसलिए चिल्ड्रन्स कोर्ट इस प्रक्रिया का पालन किए बिना सीधे ट्रायल शुरू नहीं कर सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चिल्ड्रन्स कोर्ट को पहले यह फैसला करना होगा कि नाबालिग का ट्रायल किस तरह होगा। अगर चिल्ड्रन्स कोर्ट यह मानती है कि नाबालिग पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाने की जरूरत नहीं है, तो वही कोर्ट जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड की तरह मामले की सुनवाई करेगी। लेकिन अगर कोर्ट यह तय करती है कि वयस्क की तरह ट्रायल जरूरी है, तभी सेशन ट्रायल की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है।

‘तय प्रक्रिया नहीं अपनाई तो पूरा ट्रायल अमान्य’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने शुरुआती जांच के बाद मामला चिल्ड्रन्स कोर्ट भेज दिया था। लेकिन चिल्ड्रन्स कोर्ट ने पहले यह तय ही नहीं किया कि नाबालिग पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाया जाए या नहीं। इसके बावजूद सीधे ट्रायल चलाकर उसे हत्या के मामले में दोषी ठहरा दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले में कानून में तय यह जरूरी प्रक्रिया नहीं अपनाई गई, इसलिए पूरा ट्रायल कानून के मुताबिक नहीं माना जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अब आरोपी अब 24 साल का हो चुका है और 6 साल से अधिक समय जेल में बिता चुका है। इतने लंबे समय बाद उसके अपराध के समय की मानसिक स्थिति का दोबारा सही आकलन करना संभव नहीं है। इसलिए मामले को दोबारा चिल्ड्रन्स कोर्ट भेजने का भी कोई औचित्य नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा 19(1) में तय जरूरी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। इसलिए चिल्ड्रन्स कोर्ट का पूरा ट्रायल कानून के मुताबिक नहीं था।

इसी आधार पर कोर्ट ने सेशन कोर्ट की सजा और पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। साथ ही नाबालिग को बरी करते हुए कहा कि अगर वह किसी दूसरे मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तुरंत रिहा किया जाए।

चिल्ड्रन्स कोर्ट्स के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के अंत में देशभर की सभी चिल्ड्रन्स कोर्ट को अहम निर्देश भी दिए। कोर्ट ने कहा कि जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड से कोई मामला मिलने के बाद चिल्ड्रन्स कोर्ट सीधे ट्रायल शुरू नहीं कर सकती।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सबसे पहले धारा 19(1) के तहत यह तय करना होगा कि संबंधित नाबालिग पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाया जाए या नहीं। यह फैसला कारणों के साथ लिखित आदेश में दर्ज करना भी जरूरी होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस प्रक्रिया का पालन करने के बाद ही आगे की सुनवाई शुरू की जा सकती है। अगर चिल्ड्रन्स कोर्ट इस अनिवार्य प्रक्रिया को नजरअंदाज करती है, तो पूरा ट्रायल कानूनी चुनौती का सामना कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के जरिए साफ कर दिया कि 16 से 18 साल के नाबालिगों से जुड़े जघन्य अपराधों में केवल जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड की राय के आधार पर वयस्क की तरह ट्रायल शुरू नहीं किया जा सकता। चिल्ड्रन्स कोर्ट को भी स्वतंत्र रूप से कानून में तय प्रक्रिया का पालन करना होगा। यदि ऐसा नहीं होता, तो पूरी सुनवाई और दोषसिद्धि कानूनी रूप से टिक नहीं पाएगी।

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